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चम्बल नदी का धार्मिक महत्व, मध्य प्रदेश, राजस्थान के लोगो के लिए जीवनदायिनी नदी हैं। देखते हैं कैसे।

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चम्बल नदी का धार्मिक महत्व, मध्य प्रदेश, राजस्थान के लोगो के लिए जीवनदायिनी नदी हैं। देखते हैं कैसे।

चंबल नदी मध्य भारत में यमुना नदी की सहायक नदी है। यह नदी जानापाव पर्वत बाचू पाईट महू से निकलती है। इसका प्राचीन नाम चरमवाती है। इसकी सहायक नदिया शिप्रा, सिंध, काली सिन्ध, ओर कुनू नदी है। यह नदी भारत में उत्तर तथा उत्तर-मध्य भाग में राजस्थान के कोटा तथा धौलपुर, मध्य प्रदेश के धार, उज्जैन, रतलाम, मन्दसौर, भिंड, मुरैना आदि जिलो से होकर बहती है। यह नदी दक्षिण मुड़ कर उत्तर प्रदेश राज्य में यमुना में शामिल होने के पहले राजस्थान और मध्य प्रदेश के बीच सीमा बनाती है। इस नदी पर चार जल विधुत परियोजना -गांधी सागर, राणा सागर, जवाहर सागर और कोटा बैराज (कोटा)- चल रही है। प्रसिद्ध चूलीय जल प्रपातचंबल नदी (कोटा) मे है। कुल लंबाई 135।
यह एक बारहमासी नदी है। इसका उद्गम स्थल जानापाव की पहाडी (मध्य प्रदेश) है।यह दक्षिण में महू शहर के, इंदौर के पास, विंध्य रेंज में मध्य प्रदेश में दक्षिण ढलान से होकर गुजरती है। चंबल और उसकी सहायक नदियां उत्तर पश्चिमी मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र के नाले, जबकि इसकी सहायक नदी, बनास, जो अरावली पर्वतों से शुरू होती है इसमें मिल जाती है। चंबल, कावेरी, यमुना, सिन्धु, पहुज भरेह के पास पचनदा में, उत्तर प्रदेश राज्य में भिंड और इटावा जिले की सीमा पर शामिल पांच नदियों के संगम समाप्त होता है।

चंबल के अपवाह क्षेत्र में चितौड, कोटा, बूंदी, सवाई माधौपुर, करौली, धौलपुर इत्यादि इलाके शामिल हैं। तथा सवाई माधोपुर, करौली व धौलपुर से गुजरती हुई राजस्थान व मध्यप्रदेश की सीमा बनाती हुए चलती है जो कि 252 किलोमीटर की है।

बनास नदी, क्षिप्रा नदी,मेज , बामनी , सीप काली सिंध, पार्वती, छोटी कालीसिंध, कुनो, ब्राह्मणी, परवन नदी इत्यादि चम्बल की सहायक नदियाँ हैं।

महाभारत के अनुसार राजा रंतिदेव के यज्ञों में जो आर्द्र चर्म राशि इकट्ठा हो गई थी उसी से यह नदी उदभुत हुई थी-
महानदी चर्मराशेरूत्क्लेदात् ससृजेयतःततश्चर्मण्वतीत्येवं विख्याता स महानदी।
कालिदास ने भी मेघदूत-पूर्वमेघ 47 में चर्मण्वती नदी को रंतिदेव की कीर्ति का मूर्त स्वरूप कहा गया है-

आराध्यैनं शदवनभवं देवमुल्लघिताध्वा,
सिद्धद्वन्द्वैर्जलकण भयाद्वीणिभिदैत्त मार्गः।
व्यालम्बेथास्सुरभितनयालंभजां मानयिष्यन्,
स्रोतो मूत्यभुवि परिणतां रंतिदेवस्य कीर्तिः।
इन उल्लेखों से यह जान पड़ता है कि रंतिदेव ने चर्मवती के तट पर अनेक यज्ञ किए थे। महाभारत में भी चर्मवती का उल्लेख है -
ततश्चर्मणवती कूले जंभकस्यात्मजं नृपं ददर्श वासुदेवेन शेषितं पूर्ववैरिणा
अर्थात इसके पश्चात सहदेव ने (दक्षिण दिशा की विजय यात्रा के प्रसंग में) चर्मण्वती के तट पर जंभक के पुत्र को देखा जिसे उसके पूर्व शत्रु वासुदेव ने जीवित छोड़ दिया था। सहदेव इसे युद्ध में हराकर दक्षिण की ओर अग्रसर हुए थे।
चर्मण्वती नदी को वन पर्व के तीर्थ यात्रा अनु पर्व में पुण्य नदी माना गया है -
चर्मण्वती समासाद्य नियतों नियताशनः रंतिदेवाभ्यनुज्ञातमग्निष्टोमफलं लभेत्।
श्रीमदभागवत में चर्मवती का नर्मदा के साथ उल्लेख है-

सुरसानर्मदा चर्मण्वती सिंधुरंधः
इस नदी का उदगम जनपव की पहाड़ियों से हुआ है। यहीं से गंभीरा नदी भी निकलती है। यह यमुना की सहायक नदी है। महाभारत में अश्वनदी का चर्मण्वती में, चर्मण्वती का यमुना में और यमुना का गंगा नदी में मिलने का उल्लेख है –
मंजूषात्वश्वनद्याः सा ययौ चर्मण्वती नदीम्,
चर्मण्वत्याश्व यमुना ततो गंगा जगामह।
गंगायाः सूतविषये चंपामनुययौपुरीम्।

उत्तरप्रदेश में इटावा के बिठौली गांव में स्थित तातरपुर में यमुना, चम्बल, कावेरी, सिंधु और पहुज नदियों का संगम होता है। इस संगम को पचनदा अथवा पचनद भी कहा जाता है। यहां के प्राचीन मन्दिरों में लगे पत्थर आज भी दुनिया के इस आश्चर्य और भारत की श्रेष्ठ धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत का बखान करते नजर आते हैं।

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चंबल का बीहड़ कैसे बने उपजाऊ,लोगो का संघर्ष और जीवन (देखिये कैसे जीते हैं लोग) ।समस्या।

चंबल की घाटियां कभी डाकुओं के गिरोहों से त्रस्त थीं। डकैतों के समर्पण के गांधीवादी तरीकों के सफल प्रयासों के बाद चंबल क्षेत्र को डाकुओं के आतंक से तो राहत मिली, पर बीहड़ों की समस्या जस की तस बनी रही। नदियों द्वारा भूमि कटान से वहां बहुत-सी कृषि व चरागाह की भूमि बीहड़ों में परिवर्तित होती रही है, जिससे आम लोगों की आजीविका का संकट बढ़ता गया। मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में ही चंबल, क्वारी, आसन, सिंध जैसी नदियों के बहाव में भूमि के कटाव की प्रवृत्ति अधिक है। इससे न केवल ऊपर की उपजाऊ मिट्टी का कटाव होता है, बल्कि बीहड़ भी बनते चले जाते हैं। इसका सामना करने के लिए भी ‘महात्मा गांधी सेवा आश्रम, जौरा’ ने प्रयास किए हैं। वहां के प्रमुख प्रेरणा स्रोत विख्यात गांधीवादी कार्यकर्ता एसएन सुब्बराव ‘भाई जी’ रहे हैं, जिन्होंने ‘राष्ट्रीय सेवा योजना’ (एनएसएस) के कैंप आयोजित कर सैकड़ों युवाओं का श्रमदान बीहड़ों को समतल करने, .

अब इस काम को फिर से बड़े पैमाने पर आरंभ करने का समय आ गया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि क्षेत्र के युवाओं में बेरोजगारी से बढ़ती बेचैनी कम करने के लिए भी इस कार्य का उपयोग हो सकता है। बीहड़ प्रभावित भूमि को सुधार कर इसे युवाओं को रासायनिक खादों, कीटनाशकों और दवाओं से मुक्त जैविक या पर्यावरण की रक्षा करने वाली खेती के लिए दिया जा सकता है। वहां की एक अन्य समस्या यह है कि खेती में रासायनिक खाद व कीटनाशकों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है।
भारत में पानी से मृदा का कटाव, भूमि ह्रास के सबसे महत्त्वपूर्ण कारणों में से एक है। केवल भारत में लगभग 3.61 करोड़ हेक्टेयर भूमि पानी द्वारा कटाव से प्रभावित है। इस श्रेणी में सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश हैं। मध्य भारत में चम्बल घाटी देश के सबसे प्रभावित क्षेत्रों में से है। चम्बल मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में कटाव से प्रभावित क्षेत्र है, जिसे आमतौर पर घाटी के रूप में जाना जाता है। चम्बल यमुना नदी की एक महत्त्वपूर्ण सहायक नदी चम्बल नदी के किनारे स्थित है।

स्थानीय रूप से बीहड़ के नाम से प्रचलित चम्बल घाटी भारत का सबसे निम्नीकृत भूखण्ड है। चम्बल के बीहड़ में बड़े नाले और अत्यधिक विच्छेदित घाटी शामिल है। यह क्षेत्र अपने कमतर विकास और उच्च अपराध दर के लिये जाना जाता है।

चम्बल नदी घाटी का लगभग 4,800 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र इस बीहड़ के अन्तर्गत आता है जिसका विकास मुख्य रूप से चम्बल नदी के दोनों किनारों पर हुआ है, जो इस इलाके की जीवनरेखा है। चम्बल के किनारे पर घाटी का गठन काफी सघन है जिसका 5 से 6 किमी का क्षेत्र गहरे नालों के जा

50 हजार बीघा बीहड़ में अब हो रही है खेती
-मध्यप्रदेश में महू, उज्जैन, भिंड, मुरैना, श्योपुर से गुजरती है चंबल नदी।
-चंबल संभाग के करीब 50 हजार बीघा बीहड़ में अब हो रही है खेती।
-सरसों, बाजरा, तिल, अरहर और सब्जियों की खेती करते हैं किसान।
वैज्ञानिकों ने यहां खेती की संभावनाएं तलाशी
खेती की संभावना तलाशने के लिए मंगलवार को कृषि वैज्ञानिकों का एक दल ग्राम पावई क्षेत्र के बीहडों में पहुंचा। वैज्ञानिकों ने यहां खेती की संभावनाएं तलाशी। साथ ही, कहा कि बीहड़ की जमीन को उपजाऊ बनाया जा सकता है। यहां खेती की अपार संभावनाएं हैं। वैज्ञानिकों ने बीहड़ की भूमि में होने वाली फसल नींबू, बेर, संतरा, मौसम्मी, पपीता आदि की खेती का भी अध्ययन किया। उन्होंने कृषि वन, उद्यानिकी, पशु पालन के लिए किए जाने वाले प्रयोगों का आकलन किया। दल में जर्मनी के डाॅ ऐलरिच, स्विटजरलैंड के वैज्ञानिक डाॅ. एसके गुप्ता शामिल थे।
केंद्र 900 व प्रदेश 200 करोड़ देगा
इस दौरान सांसद डाॅ. भागीरथ प्रसाद ने कहा कि बीहड़ों के सुदृढ़ीकरण और फसलों की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए 1100 करोड़ रुपए स्वीकृत किए जाएंगे। इसमें 200 करोड़ रुपए मप्र सरकार और 900 करोड़ रुपए केन्द्र सरकार द्वारा वर्ल्ड बैंक के सहयोग से देगी।

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मध्य प्रदेश के श्योपुर और मुरैना के बीहड़ों को लैंडस्केप कन्जर्वेशन के मॉडल के तौर पर देखा जाता है। अब केंद्र सरकार के ग्रीन अग्रीकल्चर प्रॉजेक्ट के तहत इस इलाके को विकसित किया जाएगा।
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CHAMBAL RIVER # chambal nadi All information about chambal river

Namaskar Dosto aapka swagat Hai Meri YouTube channel Indian AK mai yeah video full Chambal nadi ke baare mein hi Humne aapko is video mein Chambal nadi ki puri Jankari Diya hai friends to aapko ye video acchi Lage toh iss video ko like kijiye aur comment kijiye Mere channel ko subscribe kijiye hum aapke liye aese hi video or Leke Aate Rahenge video dekhne ke liye dhanyavad
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राजस्थान के लोग कैसे बचा रहे अपने नदियों को, सूख चुकी नान्दूवाली नदी का फिर से बहने लगी । अलवर जिला।

यह कल्पना करना मुश्किल है कि यह नदी और जंगल कभी सूख चले थे। पेड़ों के साथ-साथ समाज और परम्पराओं का भी कटाव होने लगा था। कुओं में कटीली झाड़ियाँ उग आईं और बरसात से जो थोड़ी सी फसल होती उसमें गुजारा करना मुश्किल था। गाय-भैंस बेचकर कई परिवार बकरियाँ रखने लगे क्योंकि चारे को खरीदने और गाँव तक लाने में ही काफी पैसे खर्च हो जाते। जवान लोगों का रोजी-रोटी के लिये पलायन जरूरी हो गया। निम्न जाति के परिवारों की हालत बदतर थी। सूख चुकी नान्दूवाली नदी का फिर से बहना अकाल ग्रस्त भारत के लिये एक सुखद सन्देश है। ढाक के पेड़ों पर नई लाल पत्तियाँ आ रही हैं पर कदम, ढोंक और खेजड़ी की शाखाएँ लदी हुई हैं। एक दूसरे में मिलकर यह हमें कठोर धूप से बचा रहे हैं। जिस कच्चे रास्ते पर हम बढ़ रहे हैं वह धीरे-धीरे सख्त पत्थरों को पीछे छोड़ मुलायम हो चला है और कुछ ही दूरी पर नान्दूवाली नदी में विलीन हो जाता है। राजस्थान में अलवर जिले के राजगढ़ इलाके की यह मुख्य धारा कई गाँव के कुओं और खलिहानों को जीवन देती चलती है। इनमें न सिर्फ कई मन अनाज, बल्कि सब्जियों की बाड़ी और दुग्ध उत्पादन भी शामिल है। रायका समुदाय इस क्षेत्र की सबसे पिछड़ी जाति है। पारम्परिक तौर पर ऊँटों के व्यापारी रायका थोड़ी सी आमदनी से गुजारा करते। लेकिन आज इस इलाके के 15 रायका परिवारों के पास पक्के मकान और खेत हैं जिस पर सब्जियाँ, गेहूँ और सरसों की फसल उन्हें अच्छी आमदनी देती हैं। 30 वर्षीय जय सिंह रायका कहते हैं कि उनकी जमीन पर कोई सिंचाई सुविधा नहीं थी पर पास में एक जोहड़ के निर्माण से उनके भी कुएँ तर हो गए जिससे फसल अच्छी होने लगी।

अपने दम पर पानी और जंगल सहेज रहे हैं ग्रामीण

धीरे-धीरे जब खेती में सुधार हुआ तो समाज का योगदान 25 प्रतिशत से बढ़कर 100 प्रतिशत हो गया। पिछले तीन साल से संस्था ने कुछ भी खर्चा नहीं किया परन्तु जोहड़, एनीकट और मेड़बन्दी बनती चली जा रही है।

गाँव वाले निर्माण से लेकर मरम्मत और वनों का संरक्षण अपने दम पर कर रहें हैं। कुंज बिहारी एक तकनीकी सहायक की तरह जरूरत पड़ने पर हाजिर हो जाते हैं। वह बताते हैं कि हर कोई यहाँ एक इंजीनियर है। वह केवल पानी के सतही और धरातल के स्वभाव को ही नहीं, निर्माण के सभी पहलुओं की जानकारी रखते हैं।

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१) अजमेर - साबरमती, सरस्वती, खारी, ड़ाई, बनास
२) अलवर - साबी, रुपाढेल, काली, गौरी, सोटा
३) बाँसबाड़ा - माही, अन्नास, चैणी
४) बाड़मेर - लूनी, सूंकड़ी
५) भरतपुर - चम्बल, बराह, बाणगंगा, गंभीरी, पार्वती
६) भीलवाडा - बनास, कोठारी, बेडच, मेनाली, मानसी, खारी
७) बीकानेर - कोई नदी नही
८) बूंदी - कुराल
९) चुरु - कोई नदी नही
१०) धौलपुर - चंबल
११) डूंगरपुर - सोम, माही, सोनी
१२) श्रीगंगानगर - धग्धर
१३) जयपुर - बाणगंगा, बांड़ी, ढूंढ, मोरेल, साबी, सोटा, डाई, सखा, मासी
१४) जैसलमेर - काकनेय, चांघण, लाठी, धऊआ, धोगड़ी
१५) जालौर - लूनी, बांड़ी, जवाई, सूकड़ी
१६) झालावाड़ - काली सिन्ध, पर्वती, छौटी काली सिंध, निवाज
१७) झुंझुनू - काटली
१८) जोधपुर - लूनी, माठड़ी, जोजरी
१९) कोटा - चम्बल, काली सिंध, पार्वती, आऊ निवाज, परवन
२०) नागौर - लूनी
२१) पाली - लीलड़ी, बांडी, सूकड़ी जवाई
२२) सवाई माधोपुर - चंबल, बनास, मोरेल
२३) सीकर - काटली, मन्था, पावटा, कावंट
२४) सिरोही - प. बनास, सूकड़ी, पोसालिया, खाती, किशनावती, झूला, सुरवटा
२५) टोंक - बनास, मासी, बांडी
२६) उदयपुर - बनास, बेडच, बाकल, सोम, जाखम, साबरमती
२७) चित्तौडगढ़ - वनास, बेडच, बामणी, बागली, बागन, औराई, गंभीरी, सीवान, जाखम, माही।

The 22km long river which flows through the village Nandu situated 65km to the west of Alwar District in Rajasthan. It focuses on the methods used by the people in the village to revive the river. The process was initiated by Satish Sharma and Kunj Bihari. They are brothers and are natives of Nandu. They played a vital role in creating awareness among the people of Nandu.
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चंबल के बीहड़ के लोगो का जीवन और सँघर्ष, जिंदिगी की हकीकत । आइए जानते और देखते हैं ।

'सोन चिड़िया' से लेकर 'पान सिंह तोमर' और चंबल की क़सम' जैसी फ़िल्मों के ज़रिए आपने 'चंबल घाटी' के डकैतों की कहानियां तो ज़रूर देखीं-सुनी होंगी. लेकिन डकैतों के इस सिनेमाई ग्लैमर से परे, चंबल घाटी के रोज़मर्रा में जीवन के झांककर यहां के ज़मीनी चुनावी मुद्दों की पड़ताल करने की टीम चम्बल के कुख्यात बीहड़ों में पहुंची.
राजधानी दिल्ली से क़रीब 350 किलोमीटर दूर, हम मध्यप्रदेश के मुरैना ज़िले के बीहड़ों से गुज़र रहे हैं. लगभग दोमंज़िला इमारतों जितनी उंचाई वाले रेतीले पठारों के बीचे से होते हुए टेढ़े मेढ़े रास्ते. बीच बीच में कंटीली जंगली वनस्पतियों के बड़े-बड़े झाड़ जो गुजराती गाड़ियों के बंद शीशों पर 'स्क्रैच' के निशान छोड़ जाते हैं.
मुख्य शहर और बीहड़ों से एक घंटे की दूरी पर हमें चम्बल का साफ़ नीला पानी पहली बार नज़र आया. लेकिन मुरैना जिले से गुज़रने वाली यह नदी यहां तक एक लंबा रास्ता तय करके पहुंची है.
मूलतः यमुना की मुख्य सहायक नदियों के तौर पर पहचानी जाने वाली चम्बल की शुरुआत विंध्याचल की पहाड़ियों में मऊ शहर के पास से होती है. फिर वहां से मध्यप्रदेश, राजस्थान, और उत्तर प्रदेश की सीमाओं से होती हुई यह वापस मध्य प्रदेश आती है और अंत में उत्तर प्रदेश के जालौन में यमुना में मिल जाती है. लेकिन क़रीब 960 किलोमीटर लम्बी अपनी इस यात्रा में चंबल अपने आस-पास रेतीले कंटीले बीहड़ों का लंबा साम्राज्य खड़ा करते हुए जाती है. हर साल क़रीब 800 हेक्टेयर की दर से बढ़ रहे बीहड़ आज चम्बल घाटी की सबसे बड़ी समस्या है.
श्योपुर, मुरैना से लेकर भिंड ज़िले तक मध्यप्रदेश में चम्बल नदी के किनारे बसे अधिकांश गांव बढ़ते बीहड़ों की चपेट में आकर ख़त्म हो रहे हैं. उपजाऊ और रिहाइशी ज़मीनी रकबे लगातार रेतीले पठारों और पहाड़ी टीलों में बदल रहे हैं और स्थानीय निवासी को मजबूरन अपने घर छोड़कर पलयान करना पड़ रहा है.
बढ़ते बीहड़ों की वजह से विस्थापित हुए ऐसे गांवों को यहां 'बेचिराग गांव' कहा जाता है.

जब भी कभी डकैत (Dacoits) शब्द का जिक्र होता है, तो हमारे जेहन में चम्बल घाटी (Chambal Ghati) का नाम कौंध उठता है। चम्बल घाटी के अंधेरे बीहड़ एक समय डकैतों के लिए अभयारण्य हुआ करते थे, जहां से वे डकैती, अपहरण और हत्याओं का ‘कारोबार’ चलाया करते थे। चम्बल नदी का क्षेत्र डकैतों के मामले में ऊर्वर रहा है। इस नदी घाटी के क्षेत्रों में सामन्तवादी व्यवस्था से दमित और आजिज होकर कई लोगों ने बंदूक थाम कर खुद को बागी घोषित कर दिया। ये लोकप्रिय भी होते थे। कई मामलों में इन डकैतों को अपने जाति-समूहों और क्षेत्र के लोगों का समर्थन प्राप्त था।

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Mouth: Yamuna River
Length: 1,024 km (636 mi)

चम्बल नदी के आस पास के गांव, शहरो का जीवन, सँघर्ष, हकीकत । मुरैना की प्रसिद्ध गजक।आइए देखते हैं हम।

चम्बल के किनारे और आसपास के जलाशयों में स्तानीय एवं ग्रीष्म-पथ प्रवास वाले पक्षियों में सारस,टिकड़ी, नकटा, छोटी डूबडूबी, सींगपर, जाँघिल, घोंघिल, चमचा, लोहरजंग, हाजी लगलग, सफेद हवासील, गिर्री बतख, गुगलर बतख, छोटी सिलही बतख, सफेद बुज्जा, कौआरी बुज्जा, कला बुज्जा, सिलेटी अंजन, नरी अंजन, गजपाँव, बड़ा हँसावर, टिटहरी, जर्द टिटहरी, अंधा बगुला, करछीया बगुला, गाय बगुला, गुडेरा, यूरेशियाई करवान, बड़ा करवान, छोटा पनकोवा, जल कूकरी, जीरा बटन, मोर, हीरामन तोता, कांटीवाल तोता, टुईयां तोता, सामान्य पपीहा, हरा पतरंग, अबलक चातक, कबूतर, धवर फाखता, चितरोया फाखता, ईट कोहरी फाखता, टूटरुं, कुहार भटतीतर, कोयल, करेल उल्लू,हुदहुद, नीलकंठ, मैना, अबलकी मैना, गुलाबी मैना, अबाबील, रामगंगरा, सफेद भौंह खंजन, बैंगनी शक्कर खोरा, मुनिया, बयां, चित्रित तीतर, सफेद तीतर, सिलेटी दुम फुदकी, गौरैया आदि प्रजातियों के पक्षी पाये जाते हैं।

शीत ऋतु के दौरान अनेक प्रवासी पक्षी भी बड़ी संख्या में देखने को मिलते हैं। राजहंस, सरपट्टी सवन, नीलसर, छोटी मुर्गाबी, छोटी लालसिर बतख, तिधलरी बतख, पियासन बतख, अबलख बतख, सुर्खाब, गेड़वाल, जमुनी जलमुर्गी, जल पीपी, जलमुर्गी, पीहो, छोटी सुरमा चैबाहा, चुटकन्ना उल्लू, कला शिरशिरा एवं सफेद खंजन आदि प्रमुख प्रवासी पक्षी देखे जाते हैं। चम्बल नदी क्षेत्र में लगभग 150 प्रकार की पक्षी प्रजातियां पायी जाती हैं।

घड़ियाल अभयारण्य में पर्यटन के लिए अक्टूबर से मार्च तक का समय सर्वाधिक उपयुक्त है। राजस्थान में जवाहर सागर से कोटा बैराज तक या तो नदी में नाव के माध्यम से या फिर नदी के तट पर जीप के द्वारा यात्रा की जा सकती है। चम्बल घड़ियाल अभयारण्य को नजदीक से देखने के लिए अनेक स्थानों पर व्यू पॉइंट्स बनाये गए हैं। कई व्यू पॉइंट से गाइड के साथ जलचर, किनारे के पक्षी एवं लैंड्सकैप का आनन्द और फोटोग्राफी.

मुरैना मध्य प्रदेश राज्य का एक जिला है। इसका मुख्यालय मुरैना में है। जिले के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 50 प्रतिशत भाग खेती योग्य है। जिले का 42.94 प्रतिशत क्षेत्र सिंचित हैं। नहर इस क्षेत्र की सिंचाई का मुख्य साधन है। जिले की मुख्य फसल गेहूँ है। सरसों का उत्पादन भी जिले में प्रचुर मात्रा में होता है। खरीफ की मुख्य फसल बाजरा है। यह जिला कच्ची घानी के सरसों के तेल के लिये पूरे मध्य प्रदेश में जाना जाता है। इस जिले में पानी की आपूर्ति चम्बल, कुँवारी, आसन और शंक नदियों द्वारा होती है। चम्बल नदी का उद्गम इन्दौर जिले से हुआ है। यह नदी राजस्थानी इलाके से लगती हुई उत्तर-पश्चिमी सीमा में बहती है। .

मध्य प्रदेश भारत का एक राज्य है, इसकी राजधानी भोपाल है। मध्य प्रदेश १ नवंबर, २००० तक क्षेत्रफल के आधार पर भारत का सबसे बड़ा राज्य था। इस दिन एवं मध्यप्रदेश के कई नगर उस से हटा कर छत्तीसगढ़ की स्थापना हुई थी। मध्य प्रदेश की सीमाऐं पांच राज्यों की सीमाओं से मिलती है। इसके उत्तर में उत्तर प्रदेश, पूर्व में छत्तीसगढ़, दक्षिण में महाराष्ट्र, पश्चिम में गुजरात, तथा उत्तर-पश्चिम में राजस्थान है। हाल के वर्षों में राज्य के सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर राष्ट्रीय औसत से ऊपर हो गया है। खनिज संसाधनों से समृद्ध, मध्य प्रदेश हीरे और तांबे का सबसे बड़ा भंडार है। अपने क्षेत्र की 30% से अधिक वन क्षेत्र के अधीन है। इसके पर्यटन उद्योग में काफी वृद्धि हुई है। राज्य में वर्ष 2010-11 राष्ट्रीय पर्यटन पुरस्कार जीत लिया। .

चंबल नदी मध्य भारत में यमुना नदी की सहायक नदी है। यह नदी जानापाव पर्वत महू से निकलती है। इसका प्राचीन नाम चरमवाती है। इसकी सहायक नदिया शिप्रा, सिंध, कलिसिन्ध, ओर कुननों नदी है। यह नदी भारत में उत्तर तथा उत्तर-मध्य भाग में राजस्थान तथा मध्य प्रदेश के धार,उज्जैन,रतलाम, मन्दसौर भीँड मुरैनाआदि जिलो से होकर बहती है। यह नदी दक्षिण मोड़ को उत्तर प्रदेश राज्य में यमुना में शामिल होने के पहले राजस्थान और मध्य प्रदेश के बीच सीमा बनाती है। इस नदी पर चार जल विधुत परियोजना चल रही है। 01 गांधी सागर 02 राणा सागर 03 जवाहर सागर 04 कोटा वेराज (कोटा)। प्रसिद्ध चूलीय जल प्रपातचंबल नदी (कोटा) मे है। यह एक बारहमासी नदी है। इसका उद्गम स्थल जानापाव की पहाडी(मध्य प्रदेश) है। यह दक्षिण में महू शहर के, इंदौर के पास, विंध्य रेंज में मध्य प्रदेश में दक्षिण ढलान से होकर गुजरती है। चंबल और उसकी सहायक नदियां उत्तर पश्चिमी मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र के नाले, जबकि इसकी सहायक नदी, बनास, जो अरावली पर्वतों से शुरू होती है इसमें मिल जाती है। चंबल, कावेरी, यमुना, सिन्धु, पहुज भरेह के पास पचनदा में, उत्तर प्रदेश राज्य में भिंड और इटावा जिले की सीमा पर शामिल पांच नदियों के संगम समाप्त होता है। .

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नर्मदा भारत की नदी जो मध्य प्रदेश,गुजरात तथा राजस्थान के करोड़ो लोगो को जीवन देती हैं। आइए देखते हैं।

पुण्यसलिला मेकलसुता मां नर्मदा, जिनके पुण्य प्रताप से हर कोई परिचित है। वैसे तो आमतौर अनेक नदियों से कोई न कोई कथा जुड़ी हुई है, लेकिन मां नर्मदा इनमें सबसे भिन्न हैं।
-यह एकमात्र ऐसी नदी है जिसका पुराण है। यह एकमात्र ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है। बड़े-बड़े ऋषि मुनि नर्मदा के तटों पर गुप्त तप करते हैं।

-मान्यता है कि एक बार क्रोध में आकर इन्होंने अपनी दिशा परिवर्तित कर ली और चिरकाल तक अकेले ही बहने का निर्णय लिया। ये अन्य नदियों की तुलना में विपरीत दिशा में बहती हैं। इनके इस अखंड निर्णय की वजह से ही इन्हें चिरकुंआरी कहा जाता है। यहां हम आपको नर्मदा मैया से जुड़े कुछ ऐसे तथ्यों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनके बारे में साधारणतः जानना संभव नहीं होता।

-पुराणों में ऐसा बताया गया है कि इनका जन्म एक 12 वर्ष की कन्या के रूप में हुआ था। समुद्र मंथन के बाद भगवान शिव के पसीने की एक बूंद धरती पर गिरी जिससे मां नर्मदा प्रकट हो गईं। इसी वजह से इन्हें शिवसुता भी कहा जाता है।

-चिरकुंआरी मां नर्मदा के बारे में कहा जाता है कि चिरकाल तक मां नर्मदा को संसार में रहने का वरदान है। ऐसा उल्लेख मिलता है कि भगवान शिव ने मां रेवा को वरदान दिया था कि प्रलयकाल में भी तुम्हारा अंत नहीं होगा। अपने निर्मल जल से तुम युगों-युगों तक इस समस्त संसार का कल्याण करोगी।

-मध्य प्रदेश के खूबसूरत स्थल अमरकंटक अनूपपुर से मां नर्मदा का उद्गम स्थल है। यहां ये एक छोटी-सी धार से प्रारंभ होकर आगे बढ़ते हुए विशाल रूप धारण कर लेती हैं।

-यह स्थान अद्भुत दृश्यों के लिए भी जाना जाता है। इसी जगह पर मां रेवा का विवाह मंडप आज भी देखने मिलता है। पुराणों के अनुसार अपने प्रेमी सोनभद्र से क्रोधित होकर ही इन्होंने उल्टा बहने का निर्णय लिया और गुस्से में अपनी दिशा परिवर्तित कर ली।

-सोनभद्र और सखी जोहिला ने बाद में इनसे क्षमा भी मांगी, किंतु तब तक नर्मदा दूर तक बह चुकी थी। अपनी सखी के विश्वास को खंडित करने की वजह से ही जोहिला को पूज्यनीय नदियों में स्थान नहीं दिया गया है। सोन नदी या नद सोनभद्र का उद्गम स्थल भी अमरकंटक ही है।

-वैसे तो मां नर्मदा को लेकर अनेक मान्यताएं हैं लेकिन ऐसा बताया जाता है कि जो भी भक्त पूरी निष्ठा के साथ इनकी पूजा व दर्शन करते हैं उन्हें ये जीवनकाल में एक बार दर्शन अवश्य देती हैं।

-जिस प्रकार गंगा में स्नान का पुण्य है उसी प्रकार नर्मदा के दर्शन मात्र से मनुष्य के कष्टों का अंत हो जाता है।

-ऐसी पुरातन मान्यता है कि गंगा स्वयं प्रत्येक साल नर्मदा से भेंट एवं स्नान करने आती हैं। मां नर्मदा को मां गंगा से भी अधिक पवित्र माना गया है कहा जाता है कि इसी वजह से गंगा हर साल स्वयं को पवित्र करने नर्मदा के पास पहुंचती हैं। यह दिन गंगा दशहरा का माना जाता है।
नर्मदा नदी का उद्गम स्थल है 'अमरकंटक'
1. नर्मदा भारत के मध्यभाग में पूरब से पश्चिम की ओर बहने वाली मध्य प्रदेश और गुजरात राज्य में बहने वाली एक प्रमुख नदी है, जो गंगा के समान पूजनीय है। महाकाल पर्वत के अमरकण्टक शिखर से नर्मदा नदी की उत्पत्ति हुई है। नर्मदा सर्वत्र पुण्यमयी नदी बताई गई है तथा इसके उद्भव से लेकर संगम तक दस करोड़ तीर्थ हैं।

• पुण्या कनखले गंगा कुरुक्षेत्रे सरस्वती ।
ग्रामे वा यदि वारण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा ॥

• नर्मदा संगम यावद् यावच्चामरकण्टकम् ।
तत्रान्तरे महाराज तीर्थकोट्यो दश स्थिता: ॥

नर्मदा नदी को मध्यप्रदेश की जीवन-रेखा कहा जाता है। पर्वतराज मैखल की पुत्री नर्मदा को रेवा के नाम से भी जाना जाता है। नर्मदा भारतीय प्रायद्वीप की सबसे प्रमुख और भारत की पांचवी बड़ी नदी मानी जाती है। विंध्य की पहाड़ियों में बसा अमरकंटक एक वन प्रदेश है। अमरकंटक को ही नर्मदा का उद्गम स्थल माना गया है। यह समुद्र तल से 3500 फुट की ऊंचाई पर स्थित है।

नर्मदा नदी (Narmada River) का उद्गम स्थल अमरकण्टक शिखर से है
1. ग्रंथों में इस नदी को रेवा के नाम से भी जाना जाता है
2. यह नदी पश्चिम की तरफ खम्बात की खाड़ी में गिरती है
3. इस नदी की सहायक नदियाँ बुढनेर, बंजर, शर, तबा, आदि हैं
4. इस नदी पर बने बांध महेश्वर बाँध, इंदिरा सागर बाँध, .

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ताप्ती नदी के किनारे बसे भारत के प्रमुख शहरों की कहानियां, कुछ प्राचीन इतिहास और रोचक तथ्य। તાપ્તી ।

ताप्ती (संस्कृत : तापी, मराठी : तापी ; गुजराती : તાપ્તી) पश्चिमी भारत की प्रसिद्ध नदी है। यह मध्य प्रदेश राज्य के बैतूल जिले के मुलताई से निकलकर सतपुड़ा पर्वतप्रक्षेपों के मध्य से पश्चिम की ओर बहती हुई महाराष्ट्र के खानदेश के पठार एवं सूरत के मैदान को पार करती और अरब सागर में गिरती है। नदी का उद्गगम् स्थल मुल्ताई है।

ताप्ती (संस्कृत: तापी, मराठी: तापी; गुजराती: તાપ્તી) पश्चिमी भारत की प्रसिद्ध नदी है। यह मध्य प्रदेश राज्य के बैतूल जिले के मुलताई से निकलकर सतपुड़ा पर्वतप्रक्षेपों के मध्य से पश्चिम की ओर बहती हुई महाराष्ट्र के खानदेश के पठार एवं सूरत के मैदान को पार करती और अरब सागर में गिरती है। नदी का उद्गगम् स्थल मुल्ताई है। यह भारत की उन मुख्य नदियों में है जो पूर्व से पश्चिम की तरफ बहती हैं, अन्य दो हैं - नर्मदा नदी और माही नदी। यह नदी पूर्व से पश्चिम की ओर लगभग 740 किलोमीटर की दूरी तक बहती है और खम्बात की खाड़ी में जाकर मिलती है। सूरत बन्दरगाह इसी नदी के मुहाने पर स्थित है। इसकी प्रधान उपनदी का नाम पूर्णा है। इस नदी को सूर्यपुत्री भी कहा जाता है। समुद्र के समीप इसकी ३२ मील की लंबाई में ज्वार आता है, किंतु छोटे जहाज इसमें चल सकते हैं। पुर्तगालियों एवं अंग्रेजों के इतिहास में इसके मुहाने पर स्थित स्वाली बंदरगाह का बड़ा महत्व है। गाद जमने के कारण अब यह बंदरगाह उजाड़ हो गया है। .

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ताप्ती नदी
ताप्ती (संस्कृत: तापी, मराठी: तापी; गुजराती: તાપ્તી) पश्चिमी भारत की प्रसिद्ध नदी है। यह मध्य प्रदेश राज्य के बैतूल जिले के मुलताई से निकलकर सतपुड़ा पर्वतप्रक्षेपों के मध्य से पश्चिम की ओर बहती हुई महाराष्ट्र के खानदेश के पठार एवं सूरत के मैदान को पार करती और अरब सागर में गिरती है। नदी का उद्गगम् स्थल मुल्ताई है। यह भारत की उन मुख्य नदियों में है जो पूर्व से पश्चिम की तरफ बहती हैं, अन्य दो हैं - नर्मदा नदी और माही नदी। यह नदी पूर्व से पश्चिम की ओर लगभग 740 किलोमीटर की दूरी तक बहती है और खम्बात की खाड़ी में जाकर मिलती है। सूरत बन्दरगाह इसी नदी के मुहाने पर स्थित है। इसकी प्रधान उपनदी का नाम पूर्णा है। इस नदी को सूर्यपुत्री भी कहा जाता है। समुद्र के समीप इसकी ३२ मील की लंबाई में ज्वार आता है, किंतु छोटे जहाज इसमें चल सकते हैं। पुर्तगालियों एवं अंग्रेजों के इतिहास में इसके मुहाने पर स्थित स्वाली बंदरगाह का बड़ा महत्व है। गाद जमने के कारण अब यह बंदरगाह उजाड़ हो गया है। .

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ताप्ती नदी ke kinare base saher
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सूर्य पुत्री ताप्ती
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ताप्ती नदी कहाँ से निकली है

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ब्रह्मपुत्र नदी असम आस पास के गाँव कितना कठिन,संघर्षपूर्ण जीवन।प्राचीन इतिहास,अनछुई बातें देखते हैं।

ब्रह्मपुत्र नदी एक बहुत लम्बी (2900 किलोमीटर) नदी है। ब्रह्मपुत्र का नाम तिब्बत में सांपो, अरुणाचल में डिहं तथा असम में ब्रह्मपुत्र है। ब्रह्मपुत्र नदी बांग्लादेश की सीमा में जमुना के नाम से दक्षिण में बहती हुई गंगा की मूल शाखा पद्मा के साथ मिलकर बंगाल की खाड़ी में जाकर मिलती है।

कुछ विद्वानों का मानना है कि 'असम' शब्‍द संस्‍कृत के 'असोमा' शब्‍द से बना है, जिसका अर्थ है अनुपम अथवा अद्वितीय। लेकिन आज ज्‍यादातर विद्वानों का मानना है कि यह शब्‍द मूलरूप से 'अहोम' से बना है। ब्रिटिश शासन में इसके विलय से पूर्व लगभग छह सौ वर्षों तक इस भूमि पर अहोम राजाओं ने शासन किया।

• ब्रह्मपुत्र नदी (अंग्रेज़ी: Brahmaputra River) तिब्बत, भारत तथा बांग्लादेश में बहने वाली एक ऐतिहासिक नदी है। ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम तिब्बत के दक्षिण में मानसरोवर के निकट चेमायुंग दुंग नामक हिमवाह से हुआ है। अपने मार्ग में यह चीन के स्वशासी क्षेत्र तिब्बत, भारतीय राज्यों, अरुणाचल प्रदेश व असम और बांग्लादेश से होकर बहती है। अपनी लंबाई के अधिकतर हिस्से में नदी महत्त्वपूर्ण आंतरिक जलमार्ग का कार्य करती है; फिर भी तिब्बत के पहाड़ों और भारत के मैदानी इलाक़ों में यह नौका चालक के योग्य नहीं है। अपने निचले मार्ग में यह नदी सृजन और विनाश, दोनों ही करती है। साथ ही यह बड़ी मात्रा में उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी जमा करती है। परंतु अक्सर विनाशकारी बाढ़ लाने वाली सिद्ध होती है।
बांग्ला भाषा में जमुना के नाम से जानी जाती है।
• चीन में या-लू-त्सांग-पू चियांग या यरलुंग ज़ैगंबो जियांग कहते है।
• तिब्बत में त्सांग-पो या सांपो के नाम से जानी जाती है।
• मध्य और दक्षिण एशिया की प्रमुख नदी कहते हैं।
• अरुणाचल में डिहं के नाम से जानी जाती है।
• असम में ब्रह्मपुत्र कहते हैं।
असम की जीवन रेखा मानी जाने वाली और लोगों को रोज़गार मुहैया कराने वाली ब्रह्मपुत्र नदी पर एक नई किताब लिखी गई है।

ब्रह्मपुत्र का उदगम स्थल चेमायुंगडंग हिमनद है, जो दक्षिण-पश्चिमी तिब्बत में मा-फ़ा-मूं (मापाम) झील से लगभग 97 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में हिमालय की ढलानों को आच्छादित करता है। कूबी, आंगसी और चेमायुंगडंग वहाँ से उत्पन्न होने वाली तीन मुख्य धाराएँ हैं। नदी अपने उदगम स्थल से सामान्यतः पूर्वी दिशा में दक्षिण की ओर हिमालय की मुख्य पर्वत श्रेणी और उत्तर की ओर निएन-चिंग-तांग-कू-ला (न्येनचेन) पर्वतों के बीच क़रीब 1,126 किलोमीटर तक प्रवाहित होती है।

ब्रह्मपुत्र नदी हिमालय में अपने उद्गम से लगभग 2,900 किमी बहकर यमुना के नाम से दक्षिण में बहती हुई गंगा नदी की मूल शाखा पद्मा के साथ मिलती है और बाद में दोनों का मिश्रित जल बंगाल की खाड़ी में गिरता है।

कुल 78,438 वर्ग किलोमीटर भूमि वाला आज का यह असम 26 जिलों में बँटा हुआ है । निचले असम और ऊपरी असम नाम से यह दो मुख्य भागों में विभक्त है । इस राजनैतिक विभाजन (Political division) के बावजूद अनुपम प्राकृतिकसौंदर्य वाला सम्पूर्ण असम सभ्यता और संस्कृति (Civilisation and culture) की दृष्टि से एक समान है ।

असम में अनेक रंगारंग त्योहार मनाए जाते हैं। 'बिहू' असम का मुख्य पर्व है।
यह वर्ष में तीन बार मनाया जाता है- 'रंगाली बिहू' या 'बोहाग बिहू' फ़सल की बुआई की शुरुआत का प्रतीक है।
इसी से नए वर्ष का शुभारंभ भी होता है। 'भोगली बिहू' या 'माघ बिहू' फ़सल की कटाई का त्योहार है और 'काती बिहू' या 'कांगली बिहू' शरद ऋतु का एक मेला है।
लगभग सभी त्योहार धार्मिक कारणों से मनाए जाते हैं।
वैष्णव लोग प्रमुख वैष्णव संतों की जयंती तथा पुण्यतिथि पर भजन गाते हैं और परंपरागत नाट्य शैली में 'भावना' नामक नाटकों का मंचन करते हैं।
कामाख्या मंदिर में अंबुबाशी और उमानंदा तथा शिव मंदिरों के पास अन्य स्थानों पर शिवरात्रि मेला, दीपावली, अशोक अष्टमी मेला, पौष मेला, परशुराम मेला, अंबुकाशी मेला, दोल-जात्रा, ईद, क्रिसमस और दुर्गा पूजा, आदि धार्मिक त्योहार राज्य भर में श्रद्धा के साथ मनाए जाते हैं।

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गंगा बहती हो क्यों, भारत की इस सबसे पवित्र नदी का इतिहास, धार्मिक, पौराणिक,एवं ऐतिहासिक महत्व भी है।

यह नदी उत्तराखंड से शुरु होकर अंत में बंगाल की खा़ड़ी में जाकर मिलती है। देश की सबसे महत्वपूर्ण नदियों में से एक गंगा नदी दुनिया के सबसे उपजाऊ और घनी आबादी वाले क्षेत्रों से होकर बहती है। भारत की इस सबसे पवित्र गंगा नदी का उद्दगम उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में गंगोत्री हिमनद से हुआ है।

Ganga is the sacred river of India. Ganga originated from the Gangotri Glacier , which is located in the western Himalayas. It is one of the major rivers of India, which is approximately 1557 miles long. It flows into the eastward directions and empties into the Bay of Bengal.

गंगा नदी भारत की सबसे पवित्र नदी है जिससे करोड़ों लोगों की धार्मिक आस्था जुड़ी हुई है। यह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी नदी एवं भारत की चार सबसे लंबी नदियो में से एक है, जो कि भारत और बांग्लादेश में मिलकर करीब 2510 किलोमीटर की दूरी तय करती है।
यह नदी उत्तराखंड से शुरु होकर अंत में बंगाल की खा़ड़ी में जाकर मिलती है। देश की सबसे महत्वपूर्ण नदियों में से एक गंगा नदी दुनिया के सबसे उपजाऊ और घनी आबादी वाले क्षेत्रों से होकर बहती है।
भारत की इस सबसे पवित्र गंगा नदी का उद्दगम उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में गंगोत्री हिमनद से हुआ है। गंगोत्री, हिन्दुओं के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है, यहां गंगा जी को समर्पित एक अन्य मंदिर भी बना हुआ है।
आपको बता दें कि यह पूजनीय नदी गंगा हिमालय से यमुना, कोसी, गंडक और घाघरा जैसी कई नदियों से जुड़ती है। ऐसी मान्यता है कि गंगा नदी के पानी में बैक्टीरिया से लड़ने से खास शक्ति होती है, इसका पानी महीनों रखे रहने के बाद भी कभी खराब नहीं होता है।
इसलिए हिन्दू धर्म में किसी भी पवित्र काम में गंगा नदी के पानी को गंगाजल के रुप में इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा इसे स्वर्ग की नदी माना जाता है। हिन्दू मान्यताओ के अनुसार गंगा को स्वर्ग की नदी भी कहा गया है। लोगो का ऐसा मानना है की गंगा में स्नान करने से उनके सारे पाप धुल जाते है।

भारतीय संस्कृति की गंगा का जन्म कैसे भी हुआ हो, पर मनुष्य की पहली बस्ती उसकी तट पर आबाद हुई। पामीर के पठारों में गौरवर्णीय सुनहरे बालों वाली आर्य जाति का इष्ट देवता था वरुण। इस जाति की विशेषता थी अमूर्त का चिंतन और खोज। अग्निहोत्र के प्रचलन वाली इस जाति के अनुयायी नरबलि की पद्धति को अपनाते थे। उनके नेता राजा पुरूरवा ने गंगा संगम पर एक बस्ती बसायी जिसे प्रतिष्ठान का नाम दिया उसी के समय में एक और गंधर्व नामक दोनों शाखाएं मीलकर एक हो गई। तभी भारतीय संस्कृति की नींव पड़ी। एलों ने नरबलि छोड़कर अग्निहोत्र को अपना लिया। गंगा की पावन धारा में स्नान कर वह पवित्र हो गये। ब्रह्म ऋषि वशिष्ठ से संघर्ष करने वाले विश्वामित्र की पुत्री शकुन्तला का विवाह चन्द्रवंशी राजा दुष्यंत से हुआ और उनके पुत्र भरत ने पहली बार इस देश को भारत नाम देकर एक सूत्र में बांधा। सूर्यवंशी भगीरथ ने गंगा के आदि और अंत की खोज की थी। गंगा के तट काशी में जैन तीर्थकंर पार्श्वनाथ का प्रादुर्भाव हुआ तो वहीं सारनाथ में तथागत बुद्ध ने पहला उपदेश दिया। पाटलिपुत्र में नंद साम्राज्य का उदय हुआ तो चाणक्य ने अर्थशास्त्र की रचना एवं सम्राट चन्द्रगुप्त के साम्राज्य का निर्माण किया। सम्राट अशोक ने इसी पाटलिपुत्र में अहिंसा और प्रेम के आदेश प्रसारित किए। फिर मौर्यों के बाद आए शुंग तथा तब अश्वमेध यज्ञ होने लगे। शास्त्र और स्मृतियां रची गईं। रामायण और महाभारत इसी काल में पूर्ण हुए। महाभाष्यकार पतंजलि भी इसी समय हुए नागों के भारशिव राजवंश ने गंगा को अपना राज्य चिन्ह बनाया। दस अश्वमेध यज्ञ किये। दशाश्वमेध घाट इसकी स्मृति का ही प्रतीक है। समुद्रगुप्त की दिग्विजय और चन्द्रगुप्त के पराक्रम के साथ सम्राट हर्षवर्धन ने संस्कृति को एक नई दिशा प्रदान की। गंगा के तट पर ही राष्ट्रकूट वंश के ध्रुव ने फिर से इन प्रदेशों को जीत कर गंगा को अपना राज चिन्ह बनाया। अबुलफजल, इब्नेबतूता और बर्नियर महर्षि चरक, बाणभट्ट प्रभृति विशेषज्ञ विद्वजनों को भी गंगा तट पर रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। गंगा के अंचल में ही आयुर्वेद का जन्म हुआ। शेरशाह ने माल बंदोबस्त का क्रम गंगा के किनारे पर ही चलाया। महानगर कोलकाता गंगा के किनारे ही विकसित हुआ। राजा राममोहनराय से लेकर दयानंद सरस्वती तक के नए सुधार आंदोलन यहीं पर शुरू हुए।

उत्तर भारत के बड़े भाग को सिंचित करने वाली गंगा यदि न होती तो प्राकृतिक दृष्टि से यह प्रदेश एक विशाल मरूस्थल हुआ होता। राम की सरयू, कृष्ण की यमुना, रति देव की चम्बल, गजग्राह की सोन, नेपाल की कोसी, गण्डक तथा तिब्बत से आने वाली ब्रह्मपुत्र सभी को अपने में समेटती हुई और अलकनंदा, जाहन्वी, भागीरथी, हुगली, पदमा, मेघना आदि विभिन्न नामों से जानी जाने वाली गंगा अंत में सुंदरवन के पास बंगाल की खाड़ी में समा जाती हैं।
भारत की सर्वाधिक महिमामयी नदी ‘गंगा’ आकाश, धरती, पाताल तीनों लोकों में प्रवाहित होती है। आकाश गंगा या स्वर्ग गंगा, त्रिपथगा, पाताल गंगा, हेमवती, भागीरथी, जाहन्वी, मंदाकिनी, अलकनंदा आदि अनेकानेक नामों से पुकारी जाने वाली गंगा हिमालय के उत्तरी भाग गंगोत्री से निकलकर नारायण पर्वत के, Ganga river origin, Shiva, Himalaya, Ganges origin, Praktya, Bhagirathi, गंगा नदी उत्पत्ति, शिव, हिमालय, गंगा उद्गम, प्राकट्य, भागीरथी, ganga river history, ganges river facts,ganga river origin, ganges river pollut, ganges river map, ganga river history hindi
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सोन नदी - डेहरी, बिहार में गंगा मिलती हैं,मनेर के लड्डू, लोगो की ज़िन्दगी जमीनी हकीकत। आइए देखते हैं।

सोन नदी का उदगम मैकाल पर्वत के अमरकण्टक नामक पठारी भाग से है। इसे सोनभद्र के नाम से पुकारा जाता है। सोन नदी का एक अन्य नाम हिरण्यवाह भी है। यह नदी झारखण्ड के उत्तरी-पश्चिमी छोर पर सीमा का निर्माण करती है।

डेहरी आन सोन (Dehri on Sone), जिसे डेहरी (Dehri) भी कहा जाता है, भारत के बिहार राज्य के रोहतास ज़िले में स्थित एक नगर है। यह सोन नदी के बाएँ किनारे पर ग्रैंड ट्रंक रोड पर बसा हुआ है। राष्ट्रीय राजमार्ग ११९ का एक अन्त यहाँ स्थित है।
सोन नदी भारत के मध्य भाग में बहने वाली एक नदी है। यमुना के बाद यह गंगा नदी की दक्षिणी उपनदियों में सबसे बड़ी है। यह मध्य प्रदेश के अनूपपुर ज़िले में अमरकंटक के पास उत्पन्न होती है, जो विंध्याचल पहाड़ियों में नर्मदा नदी के स्रोतस्थल से पूर्व में स्थित है। यह उत्तर प्रदेश और झारखंड राज्यों से गुज़रकर बिहार के पटना ज़िले में गंगा नदी में विलय हो जाती है।
यह म.प्र. की एक प्रमुख नदी है। इस नदी का नाम सोन पड़ा क्योंकि इस नदी के बालू (रेत) पीले रंग के हैँ जो सोने कि तरह चमकते हैँ। इस नदी के रेत भवन निर्माण आदी के लिए बहुत उपयोगी हैं यह रेत पूरे बिहार शहडोल,सीधी, रीवा में भवन निर्माण के लिए उपयोग में लाया जाता है तथा यह रेत उत्तर प्रदेश के कुछ शहरों में अवि राठौड़ द्वारा भी निर्यात किया जाता है। सोन नदी का उल्लेख रामायण आदि पुराणो में आता है ।
गंगा नदी की सहायक नदियों में सोन का प्रमुख स्थान है। इसका पुराना नाम संभवत: 'सोहन' था जो पीछे बिगड़कर सोन बन गया। यह नदी मध्यप्रदेश के अमरकंटक नामक पहाड़ से निकलकर 350 मील का चक्कर काटती हुई पटना से पश्चिम गंगा में मिलती है।
Dehri, also known as Dehri on Sone, is a metropolitan city in Rohtas district in the state of Bihar, India.It is situated along the Son River. Dehri is also famous for sand mining and coal. It is the most important city in Rohtas District.

'मनेर का लड्डू' बनाता है दीवाना, देश-विदेश में सौगात के रूप में भेजा जाता है ऐतिहासिक लड्डू
वैसे तो भारत में कई प्रकार की मिठाईयां मशहूर हैं उनके स्वाद के दीवाने दुनिया के कोने-कोने में मौजूद हैं। भारत के सभी मिठाइयों में लड्डू एक ऐसा मिष्ठान है जिसे देखते ही लोगों के मुंह में पानी आ जाता है लेकिन बिहार के मनेर के लड्डू की बात ही निराली है। भारत में लड्डू का मकबूलियत इसलिए भी ज्यादा बढ़ जाती है क्योंकि इसका प्रयोग पूजा-अनुष्ठानों में अधिक होता है। घर में किसी तरह का शुभ कार्य हो वो लड्डू के बिना संपूर्ण नहीं होता है।
मनेर के लड्डू के इतिहास की बात करें तो यहां के स्थानीय बताते हैं कि पहली बार मुगल बादशाह शाह आलम इमली के पत्ते के दोने में अपने साथ 'नुक्ति के लड्डू' लेकर दिल्ली से मनेर आए थे। यहां के ख़ानक़ाह के गद्दीनशीं संत और अन्य लोगों को यह लड्डू बेहद पसंद आया जिसके बाद बादशाह शाह आलम दिल्ली के कारीगर साथ फिर से मनेर आए।

यहां पर जलेश्वर महादेव, सोनमुड़ा, भृगु कमंडल, धूनी पानी, दुग्धधारा, नर्मदा का उद्गम, नर्मदा मंदिर व कुंड, कपिलधारा, दुग्धधारा, माई की बगिया, सर्वोदय जैन मंदिर आदि स्थान देखने योग्य हैं

• सोन नदी का उदगम मैकाल पर्वत के अमरकण्टक नामक पठारी भाग से है। इसे सोनभद्र के नाम से पुकारा जाता है।
• सोन नदी का एक अन्य नाम हिरण्यवाह भी है।
• यह नदी झारखण्ड के उत्तरी-पश्चिमी छोर पर सीमा का निर्माण करती है।
• यह पलामू की उत्तरी सीमा बनाती हुई प्रवाहित होती है।
• सोन घाटी भौगर्भिक तौर पर दक्षिण-पश्चिम में नर्मदा नदी घाटी का लगभग अनवरत विस्तार है।
• यह गंगा की प्रमुख दक्षिणी सहायक नदी है। इसका उद्गम स्थल मध्य प्रदेश राज्य है।
• इसका ज़्यादातर हिस्सा वनाच्छादित है और जनसंख्या कम है।
• यह घाटी कैमूर पर्वतश्रेणी (उत्तर) और छोटा नागपुर (दक्षिण) से घिरी हुई है।
• मौसमी (बरसाती) नदी होने के कारण यह परिवहन की दृष्टि से महत्त्वहीन है।
• इसकी अनेक सहायक नदियाँ हैं, जिसमें दो मुख्य हैं।


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सोन नदी के किनारे के शहरो, गाँव का जीवन।धार्मिक महत्व। बिहार में गंगा नदी में मिलती है। देखते हैं।

अमरकंटक पहाड़ी से निकली सोन नदी मध्यप्रदेश तथा बिहार में बहती हुई पटना में गंगा में समाहित हो जाती है। इसे स्वर्ण नदी भी कहा जाता है। इसकी सहायक रिहन्दी नदी पर बना रिहन्द बांध काफी उपयोगी है। कुल 700 किलोमीटर बहकर यह गंगामय हो जाती है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश। झारखंड, बिहार

• सोन नदी का उदगम मैकाल पर्वत के अमरकण्टक नामक पठारी भाग से है। इसे सोनभद्र के नाम से पुकारा जाता है।
• सोन नदी का एक अन्य नाम हिरण्यवाह भी है।
• यह नदी झारखण्ड के उत्तरी-पश्चिमी छोर पर सीमा का निर्माण करती है।
• यह पलामू की उत्तरी सीमा बनाती हुई प्रवाहित होती है।
• सोन घाटी भौगर्भिक तौर पर दक्षिण-पश्चिम में नर्मदा नदी घाटी का लगभग अनवरत विस्तार है।
• यह गंगा की प्रमुख दक्षिणी सहायक नदी है। इसका उद्गम स्थल मध्य प्रदेश राज्य है।
• इसका ज़्यादातर हिस्सा वनाच्छादित है और जनसंख्या कम है।
• यह घाटी कैमूर पर्वतश्रेणी (उत्तर) और छोटा नागपुर (दक्षिण) से घिरी हुई है।
• मौसमी (बरसाती) नदी होने के कारण यह परिवहन की दृष्टि से महत्त्वहीन है।
• इसकी अनेक सहायक नदियाँ हैं, जिसमें दो मुख्य हैं।

1. रिहन्द
2. कुनहड
• यह मानपुर तक उत्तर की ओर बहने के बाद पूर्वोतर दिशा में मुड़ती है।
• यह नदी मिर्ज़ापुर ज़िले के दक्षिणी भाग से प्रवाहित होती है और पटना से पहले दीनापुर से 16 किमी. ऊपर गंगा नदी से मिल जाती है।
• इसकी कुल लम्बाई 780 किमी. है।
• सोन नदी की कुछ सहायक नदियों पर बांध बनाए गए है और उत्तर प्रदेश में 'डेहरी ऑन सोन नहर प्रणाली' के आरंभिक स्थल है।

सोन नदी भारत के मध्य प्रदेश राज्य से निकल कर उत्तर प्रदेश, झारखंड के पहाड़ियों से गुजरते हुए वैशाली जिले के सोनपुर में जाकर गंगा नदी में मिल जाती है। यह बिहार की एक प्रमुख नदी है। इस नदी का नाम सोन पड़ा क्योंकि इस नदी के बालू (रेत) पीले रंग के हैँ जो सोने कि तरह चमकते हैँ। इस नदी के रेत भवन निर्माण आदी के लिए बहुत उपयोगी हैं यह रेत पूरे बिहार में भवन निर्माण के लिए उपयोग में लाया जाता है तथा यह रेत उत्तर प्रदेश के कुछ शहरों में भी निर्यात किया जाता है। गंगा और सोन नदी के संगम स्थल सोनपुर में एशिया का सबसे बड़ा सोनपुर पशु मेला लगता है।

1. सोन नदी मध्यप्रदेश के अमरकंटक नामक पहाड़ से निकलती हैं।
2. सोन नदी गंगा नदी की प्रमुख सहायक नदी हैं।
3. सोन नदी मध्यप्रदेश से निकलकर उत्तरप्रदेश, झारखण्ड से गुजरते हुये बिहार में पटना के पास गंगा नदी में मिलती हैं।
4. इस नदी के रेत पीले रंग के हैं, जो सोने की तरह चमकते हैं, इस कारण इस नदी का नाम सोन नदी हैं।
5. यह नदी अमरकंटक से लेकर गंगा नदी तक 781 किलोमीलर लम्बी हैं।
6. सोन नदी से बहुत अधिक मात्रा में बालु निकाला जाता हैं, जो पूरे बिहार और उत्तरप्रदेश के शहरी इलाकों में भवन निर्माण में काम आता हैं।
7. अनेकों कवियों ने सोन नदी और इसके जल का वर्णन अपनी कविताओं में किया हैं।

8. इस नदी पर सबसे प्रमुख बांध डेहरी बांध हैं। डेहरी बांध सन् 1874 ईस्वी में बनाया गया था।

9. सोन नदी और गंगा नदी के संगम स्थल पर सोनपुर में एशिया का सबसे बड़ा सोनपुर पशु मेला लगता हैं।

10. इस नदी पर तीन पुल हैं, पहला पुल लगभग 3 मील लंबा हैं, जो डेहरी-ऑन-सोन पर बना हुआ हैं।

11. दूसरा प्रमुख पुल आरा - पटना के बीच में कोइलवर नामक स्थान पर हैं।

इस नदी का नाम सोन पड़ा क्योंकि इस नदी के बालू (रेत) पीले रंग के हैँ जो सोने कि तरह चमकते हैँ।
The Sone originates near Amarkantak in Anuppur district of Madhya Pradesh, just east of the headwater of the Narmada River, and flows north-northwest through Shahdol district in Madhya Pradesh state before turning sharply eastward where it encounters the southwest-northeast-Kaimur Range.
⁃ left: Ghaghar River, Johilla River, Chhoti MP
⁃ right: Gopad River, Rihand River, Kanhar Ri
State: Chhattisgarh, Madhya Pradesh, UP
Mouth: Ganges River

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नर्मदा के किनारे के स्थित तीर्थ ,शक्ति पीठ तथा धार्मिक स्थल।बहुत सारे प्रसिद्ध तीर्थस्थान हैं देखते।

नर्मदा के किनारे के स्थित तीर्थ ,शक्ति पीठ तथा धार्मिक स्थल।बहुत सारे प्रसिद्ध तीर्थस्थान हैं देखते।

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तेरह सौ किलोमिटर का सफर तय करके अमरकंटक से निकलकर नर्मदा विन्ध्य और सतपुड़ा के बीच से होकर भडूच (भरुच)के पास खम्भात की खाड़ी में अरब सागर से जा मिलती है।
ऐतिहासिक दृष्टि से नर्मदा के तट बहुत ही प्रचीन माने जाते हैं। पुरातत्व विभाग मानता है कि नर्मदा के तट के कई इलाकों में प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष पाएँ गए है। ये सभ्यताएँ सिंधु घाटी की सभ्यता से मेल खाती है साथी ही इनकी प्राचीनता सिंधु सभ्यता से भी पुरानी मानी जाती है। देश की सभी नदियों की अपेक्षा नर्मदा विपरित दिशा में बहती है। नर्मदा एक पहाड़ी नदी होने के कारण कई स्थानों पर इसकी धारा बहुत ऊँचाई से गिरती है। अनेक स्थानों पर यह प्राचीन और बड़ी-बड़ी चट्टानों के बीच से सिंहनाद करती हुई गुजरती हैं।
भारत की नदियों में नर्मदा का अपना महत्व है। न जाने कितनी भूमि को इसने हरा-भरा बनाया है। कितने ही तीर्थ आज भी प्राचीन इतिहास के गवाह है। नर्मदा के जल का राजा है मगरमच्छ जिसके बारे में कहा जाता है कि धरती पर उसका अस्तित्व 25 करोड़ साल पुराना है। माँ नर्मदा मगरमच्छ पर सवार होकर ही यात्रा करती हैं, तो आओ चलते हैं हम भी नर्मदा की यात्रा पर।
ॐकारेश्वर :
कहते हैं कि वराह कल्प में जब सारी पृथ्वी जल में मग्न हो गई थी तो उस वक्त भी मार्केंडेय ऋषि का आश्रम जल से अछूता था। यह आश्रम नर्मदा के तट पर ॐकारेश्वर में है। ॐकारेश्वर में ज्योर्तिलिंग होने के कारण यह प्रसिद्ध प्राचीन हिंदू तीर्थ है।

ॐकारेश्वर के आसपास दोनों तीरों पर बड़ा घना वन है, जिसे 'सीता वन' कहते हैं। वाल्मीकि ऋषि का आश्रम यहीं कहीं था।

मंडलेश्वर और महेश्वर :
ॐकारेश्वर से महेश्वर लगभग 64 किम.

महेश्वर से कोई 19 किमी पर खलघाट है। इस स्थान को 'कपिला तीर्थ' भी कहते हैं। कपिला तीर्थ से 12 किमी पश्चिम में धर्मपुरी के पास महर्षि दधीचि का आश्रम बताया गया है। स्कंद-पुराण और वायु पुराण में इसका उल्लेख मिलता है।

शुक्लेश्वर :
धर्मपुरी के बाद कुश ऋषि की तपोभूति शुक्लेश्वर से आगे नर्मदा माता चिरवलदा पहुँचती हैं। माना जाता है कि यहाँ विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्री वसिष्ठ और कश्यप ने तप किया था।

शूलपाणी :
बावन गजा के आगे वरुण भगवान की तपोभूमि हापेश्वर के दुर्गम जंगल के बाद शूलपाणी नामक तीर्थ है। यहाँ शूलपाणी के अलावा कमलेश्वर, राजराजेश्वर आदि और भी कई मन्दिर हैं।
अन्य तीर्थ :
शूलपाणी से आगे चलकर क्रमश: गरुड़ेश्वर, शुक्रतीर्थ, अंकतेश्वर, कर्नाली, चांदोद, शुकेश्वर, व्यासतीर्थ होते हुए नर्मदा अनसूयामाई के स्थान पहुँचती हैं, जहाँ अत्री -ऋषि की आज्ञा से देवी अनसूयाजी ने पुत्र प्राप्ति के लिए तप किया था

अंगारेश्वर :
सीनोर के बाद भडूच तक कई छोटे-बड़े गाँव के बाद अंगारेश्वर में मंगल ने तप करके अंगारेश्वर की स्थापना की थी। कहते हैं कि अंगारेश्वर से आगे निकोरा में पृथ्वी का उद्धार करने के बाद वराह भगवान ने इस तीर्थ की स्थापना की। फिर आगे क्रमश: लाडवाँ में कुसुमेश्वर तीर्थ है। कितने ही तीर्थ आज भी प्राचीन इतिहास के गवाह है। नर्मदा के जल का राजा है मगरमच्छ जिसके बारे में कहा जाता है कि धरती पर उसका अस्तित्व 25 करोड़ साल पुराना है। माँ नर्मदा मगरमच्छ पर सवार होकर ही यात्रा करती हैं, तो आओ चलते हैं हम भी नर्मदा की यात्रा पर।

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बंगाल की खाड़ी के पास सुंदरवन हैं कितना कठिन, संघर्षपूर्ण हैं जीना यहां। आइए देखते हैं लोगो का जीवन।

बंगाल के सुंदरवन का नाम भले ही सुहाना लगता है, लेकिन यहां के बाशिंदों के लिए ये एक डरावनी दास्तान बनकर रह गया है. आख़िर ऐसा क्यों है?

भारत के राज्य पश्चिम बंगाल में स्थित सुंदरवन 54 छोटे द्वीपों का समूह है. सुंदरवन आदमख़ोर बाघों की धरती है, जहां हर साल दर्जनों लोग बाघों का शिकार बनते हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि ये हमले लगातार बढ़ रहे हैं.

ये डेल्टा सदाबहार वनों और विशाल खारे दलदल से भरे हैं. इस दलदली जंगल में ऊंची-नीची संकरी खाड़ी हैं. इस तस्वीर में एक नाविक अपनी नाव चला रहा है.

विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण यहां मनुष्यों और बाघों के नज़दीक आने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. ऐसे में लोगों पर बाघों के हमले बढ़ रहे हैं.
मछुआरे, शहद बटोरने वाले और शिकारी जो अकसर जंगल में भीतर तक चले जाते हैं.
शहद बटोरने वालों को जंगल में जाने से पहले वन विभाग मुखौटा देता है. वन अधिकारियों का कहना है कि बाघ अक्सर पीछे से हमला करता है और मुखौटे के जरिए उसे मूर्ख बनाया जा सकता है.
एक बांस पर फहराता हुए झंडा- जिसे झामती कहा जाता है, इसे ऐसी जगहों पर लगाया जाता है जहां बाघ के हमले की आशंका काफी अधिक होती है.
सुंदरवन में वन विभाग ने गांव वालों को रोज़गार दिया है. इसका काम गांव में बाघों को आने से रोकने के लिए जाल लगाना है.

रीता मंडल के पति श्रीनाथ को अप्रैल 2011 में बाघ ने मार दिया. आज उनके तीन बच्चों की पूरी जिम्मेदारी रीता के ऊपर ही है.
पूरे क्षेत्र में सभी गांवों की यही कहानी है. युवा विधवाएं, जिनके पतियों को इस बड़ी बिल्ली ने मार डाला. यहां ऐसी ही एक विधवा महिला खड़ी है.
स्थानीय रीति-रिवाज के मुताबिक़ पत्नियां संदूर लगाती हैं. ये एक विवाहित हिंदू महिला का चिन्ह है. यहां नर्मल ग्यान की पत्नी अंजना अपने पति के जंगल से लौट आने पर संदूर लगा रही हैं.

आधिकारिक आंकडों के मुताबिक़ सुंदरवन के जंगलों में सैकड़ों बाघ रहते हैं.
मछुआरे और शहद जमा करने वाले रॉबिन मजूमदार पर घने जंगल में बाघ ने हमला किया. वो मौत के मुंह से बचकर तो आ गए लेकिन दोबारा जंगल में जाने की हिम्मत नहीं हुई.
प. बंगाल सरकार द्वारा हर साल 40 हजार से ज्यादा लोगो को जंगल से शहद व वनोपज एकत्र करने, मछली पकड़ने का परमिट दिया जाता है, पर पैसा कमाने के लालच में हजारों लोग अवैध रूप से इन जंगलों और तटों पर वनोपज इकट्ठा करने व मछली पकड़ने जाते हैं
सुंदरवन या सुंदरबोन भारत तथा बांग्लादेश में स्थित विश्व का सबसे बड़ा नदी डेल्टा है। बहुत सी प्रसिद्ध वनस्पतियों और प्रसिद्ध बंगाल टाईगर का निवास स्थान है। यह डेल्टा धीरे धीरे सागर की ओर बढ़ रहा है। कुछ समय पहले कोलकाता सागर तट पर ही स्थित था और सागर का विस्तार राजमहल तथा सिलहट तक था, परन्तु अब यह तट से 15-20 मील (24-32 किलोमीटर) दूर स्थित लगभग 1,80,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। यहाँ बड़ी तादाद में सुंदरी पेड़ मिलते हैं जिनके नाम पर ही इन वनों का नाम सुंदरवन पड़ा है। इसके अलावा यहाँ पर देवा, केवड़ा, तर्मजा, आमलोपी और गोरान वृक्षों की ऐसी प्रजातियाँ हैं, जो सुंदरवन में पाई जाती हैं। यहाँ के वनों की एक ख़ास बात यह है कि यहाँ वही पेड़ पनपते या बच सकते हैं, जो मीठे और खारे पानी के मिश्रण में रह सकते हों।

सुंदरवन राष्ट्रीय अभयारण्य, पश्चिम बंगाल (1987) : सुंदरवन अभयारण्य पश्चिम बंगाल (भारत) में खानपान जिले में स्थित है। इसकी सीमा बांग्लादेश के अंदर तक है। सुंदरवन भारत के 14 बायोस्फीयर रिजर्व में से एक बाघ संरक्षित क्षेत्र है। इस उद्यान को भी विश्‍व धरोहर में शामिल किया गया है। कई दुर्लभ और प्रसिद्ध वनस्पतियों और बंगाल टाइगर के निवास स्थान सुंदरवन को 'सुंदरबोन' भी कहा जाता है, जो भारत तथा बांग्लादेश में स्थित विश्व का सबसे बड़ा नदी डेल्टा भी है। बंगाल की खाड़ी में हुगली नदी के मुहाने (शरत) से मेघना नदी के मुहाने (बांग्लादेश) तक 260 किमी तक विस्तृत एक व्यापक जंगली एवं लवणीय दलदली क्षेत्र, जो गंगा डेल्टा का निचला हिस्सा बनाता है, यह 100-130 किमी में फैला अंतर्स्थलीय क्षेत्र है। भारत तथा बांग्लादेश में यह जंगल 1,80,000 वर्ग किलोमीटर तक फैला है। सुंदरवन नाम संभवत: ‘सुंदरी का वन’ से लिया गया है जिसका यहां पाए जाने वाले मूल्यवान विशालकाय मैंग्रोव से है। यहां बड़ी तादाद में सुंदरी पेड़ मिलते हैं जिनके नाम पर ही इन वनों का नाम सुंदर वन पड़ा है।

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Chambal - A riverine journey | The Best of India

Chambal - A riverine journey and adventure, Madhya Pradesh, India.

The very name of the valley – ‘Chambal’ – brings to mind images of the dreaded, notorious dacoits of the seventies. It is, therefore, quite difficult to consider Chambal to be a tourist destination; meant for recreation. It is only when one actually comes to the Chambal region does one realize that all that is left of that bygone era- is just the adventure! As safe as any other wilderness area in the country, Chambal promises to thrill even before one actually begins the magnificent journey of exploring its many wonders.

The Chambal river originates in Madhya Pradesh. Flowing through Rajasthan, it ends as a tributary of the Yamuna River in Etawah district of the neighbouring state of Uttar Pradesh. The river is a lifeline for this region, considering the rich flora and fauna it supports. But this unique wilderness at the heartland of the country – is both untamed and unexplored.

The people seen here are experts on tourism and conservation, who have dedicated years of study to conserve the natural treasures of this region. And now, with a mission to open a world of opportunities for the area, these people take on the Chambal in an expedition, with the sole aim of exploring its countless natural and cultural wonders.

The expedition starts with great cheer and enthusiasm. Jointly organized by the Madhya Pradesh Eco-tourism Development Board and the Madhya Pradesh Forest Dept; it is an adventure worth experiencing!

As the expedition begins, it feels like one is traversing through a different world. As the boat moves along on the calm river, the sense of thrill becomes almost palpable when one comes across an island covered with lazy, sunbathing crocodiles.

This is where the adventure lover’s dreams come true. Witness all the excitement – with crocodiles, ghadiyals, turtles, gangetic dolphins – all close at hand!

Apart from these wonderful creatures, the banks of the Chambal are also home to many resident and migratory waterfowl.

A truly remarkable effort of the state has been the conservation of its natural treasures. A visit to the Eco Centre at Deori leaves one in complete awe of what is silently but significantly being achieved here. The Crocodile centre is the only one of its kind in the entire state of Madhya Pradesh and has recently been opened to public. The centre helps breed and rehabilitate Crocodiles and Gharials in the Chambal. Due to this initiative, the river now boasts of a population of nearly 2, 000 crocodillians. Active efforts are now on to protect the Gangetic River Dolphins.

The members of the expedition, camp alongside the river, completely in sync with nature and their beautiful surroundings. A highly commendable feat of this mission in boosting ecotourism – has been the active involvement of the local residents of the valley. They are involved in the decision-making process and their inputs are treated with utmost importance. Discussions are held at all levels, awareness created about the many vistas that will open up for the valley and its people through the promotion of tourism. All aspects of trade and empowerment through creation of jobs are discussed, keeping in mind the basic aim of nature conservation. The work is carried out through cooperation from both sides – the real reason behind the success of this project.

Besides the magnificent wildlife on and along the Chambal, one can also explore the many ancient caves that date as far back as 2, 000 BC. Explore these mysterious caves and the paintings, sculptures and temples housed therein.

The exploration does not end here. One can experience a camel safari up to Ater Fort.

Situated on the periphery of the National Chambal Sanctuary, the Fort stands majestically along the riverbank. It can be accessed through a pontoon bridge, and the excitement is just beginning... What one witnesses and experiences on the journey up to the fort is captivating. In an ancient land full of ravines, wildlife, legend and folklore, the fort in itself is a marvel – a glorious jewel in the valley.

History, culture, nature, wildlife – the Chambal region is blessed with many wonders – wonders that are best explored and experienced in person…

This footage is part of the professionally-shot broadcast stock footage archive of Wilderness Films India Ltd., the largest collection of HD imagery from South Asia. The Wilderness Films India collection comprises of tens of thousands of hours of high quality broadcast imagery, mostly shot on HDCAM 1080i High Definition, HDV and XDCAM. Write to us for licensing this footage on a broadcast format, for use in your production! We are happy to be commissioned to film for you or else provide you with broadcast crewing and production solutions across South Asia. We pride ourselves in bringing the best of India and South Asia to the world... Reach us at wfi @ vsnl.com and admin@wildfilmsindia.com.

Madhya Pradesh- Lecture 12 Rivers Of MP(Chambal River)

In the series of rivers of MP here is all about Chambal river.

For Notes- 9098676936

Chambal Nadi चंबल नदी, Mp ki nadiya, yamuna ki sahayak nadi, #MPPSC

चंबल नदी मध्यप्रदेश की प्रमुख नदियों में से एक हैं। यमुना की प्रमुख सहायक नदी में से एक है।

चौमहला शिपावरा चंबल शिप्रा नदी के संगम स्थल पर दीपेश्वर महादेव मंदिर

चौमहला झालावाड़।
शिव रात्रि पर शिप्रा चम्बल संगम बने दीपेश्वर महादेव मंदिर पर भक्तों की रही धूम

झालावाड़ जिले के गंगधार उपखंड के सीमावर्ती गाँव सिंधला ओर मध्यप्रदेश के आलोट जिला रतलाम मध्यप्रदेश के गाँव शिपावरा में दो नदियों शिप्रा ओर चम्बल नदी के संगम स्थल पर बने अति प्राचीन शिव मंदिर दीपेश्वर महादेव मंदिर पर आज शिवरात्रि के अवसर पर श्रद्घालुओं का तांता लगा रहा मध्यप्रदेश और राजस्थान के श्रद्धालुओं की इस मंदिर पर बड़ी आस्था है मंदिर के इतिहास की जानकारी देते हुए पुजारीरमेश पूरी ने बताया कि भस्मासुर नामक दैत्य से बचने के लिए भगवान शिव यहाँ छिप गए थे तब उनको ढूंढने के लिए देवतागण रात्रि में दीपक लेकर निकले तब उन्हें भगवान महादेव इस स्थान पर मिले तो देवताओं ने दीपक बुझाकर उल्टा रखकर उस पर शिव लिंग की स्थापना कर दी इसलिए इस मंदिर का नाम दीपेश्वर महादेव पड़ गया एवं शिपावरा गांव के पास होने के कारण लोक भाषा मे शिपावरा महादेव कहते है सावन महीने एवँ शिवरात्रि में यहां मेले जैसा माहौल रहता है कहते है कि ऋषि को रास्ता नही देने के कारण शिप्रा नदी को श्राप दे दिया कि तुम नाग लोक चली जाओ तब से यहाँ के बाद शिप्रा नाग लोक चली गई शिप्रा नदी में सूर्य कुंड भी बना हुआ है जो वर्तमान में टूट फुट गया यह स्थान पुलस्त्य ऋषि की तपोभूमि भी है श्रवण सिह ने बताया कि शिव रात्रि के अवसर पर यहाँ कालाखेड़ी ग्रामीणों की ओर से आने वाले भक्तों के लिए भोजन प्रसादी की व्यवस्था की गई पुजारी जी ने बताया कि जब कभी यहाँ खुदाई करते हैं तो पुराने दीपक निकलते हैं संजय राठौर #भगवान शिव #शिवरात्रि #शिवालय शिवलिंग दर्शन

मध्य प्रदेश की नदियां सोन नदी । River Of MP Son River.

Hello Friends ????
Hm is video me apke liye son Nadi se sambandhit jankari lekar aay h ..
Badsagar bandh or ghadiyal abhyran ki jankari ko समावेश किया है और मध्य प्रदेश की अन्य नदियों की जानकारी हमारे दूसरे videos me mil jaygi
Uska link me niche dal Raha hu......

चंबल नदी ????


नर्मदा नदी ????



????Thank You So Much

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