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चित्तौड़गढ़(Chittorgarh) राजस्थान, कल्लनई बांध (तमिलनाडू) कुछ अन्य प्राचीन जल इंजीनियरिंग को देखेंगे

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चित्तौड़गढ़(Chittorgarh) राजस्थान, कल्लनई बांध (तमिलनाडू) कुछ अन्य प्राचीन जल इंजीनियरिंग को देखेंगे

चित्तौड़गढ़ (Chittorgarh) राजस्थान, कल्लनई बांध (तमिलनाडू) कुछ अन्य प्राचीन जल इंजीनियरिंग को देखेंगे।

अनेक प्रतिक्रियाओं में अधिकाँश लोगों का यह कहना था कि, हमें ऐसे अदभुत मंदिरों के बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी। इसमें उनकी भी गलती नहीं। हम सभी का यह दुर्भाग्य है कि भारत की वैज्ञानिक, वैभवशाली, सांस्कृतिक विरासत हमें मालूम ही नहीं है। अनेक मामलों में हमें ऐसा प्रतीत होता है। वर्तमान में पड़ रहे सूखे के कारण यह बात प्रमुख रूप से सभी के सामने उभरकर आई है।

तो, भारत में कितने लोग यह बात जानते हैं कि विश्व का पहला ज्ञात और आज भी उपयोग किया जाने वाला बाँध भारत में है? ईस्वी सन दूसरी शताब्दी में चोल राजा करिकलन द्वारा बनाया गया ‘अनईकट्टू’ अथवा अंग्रेजी भाषा में ‘ग्रांड एनीकट’ (Grand Anicut) अथवा आधुनिक भाषा में कहें तो ‘कलानाई बाँध’, ही वह बाँध है, जिसका पिछले अठारह सौ वर्षों से लगातार उपयोग किया जा रहा है। आज के जमाने में, जब बनाए जाने वाले बाँधों में तीस-पैंतीस वर्ष के बाद ही दरारें पड़ने लगती हैं, वहाँ लगातार अठारह सौ वर्षों तक कोई बाँध उपयोग में रहे, क्या यह अदभुत आश्चर्य नहीं है…?

दक्षिण भारत में कावेरी नदी पर बना यह कल्लनई बांध वर्तमान में तमिलनाडू के तिरूचिरापल्ली जिले में है. इसका निमार्ण चोल राजवंश के शासन काल में हुआ था. राज्य में पड़ने वाले सूखे और बाढ़ से निपटने के लिए कावेरी नदी को डायवर्ट कर बनाया गया यह बांध प्राचीन भारतीयों की इंजीनियरिंग का उत्तम उदाहरण है
भारत में आज भी सही सलामत है विश्व का सबसे प्राचीन और आधुनिक डैम !

विश्व का सबसे प्राचीन बांध भारत में बना था.
…और इसे बनाने वाले भी भारतीय ही थे. सुनने में आपको थोड़ा अटपटा जरूर लग सकता है लेकिन यह ऐतिहासिक सत्य है.

आज से करीब 2 हजार वर्ष पूर्व भारत में कावेरी नदी पर कल्लनई बांध का निमार्ण कराया गया था, जो आज भी न केवल सही सलामत है बल्कि सिंचाई का एक बहुत बड़ा साधन भी है.

भारत के इस गौरवशाली इतिहास को पहले अंग्रेज और बाद में वामपंथी इतिहासकारों ने जानबूझकर लोगों से इस तथ्य को छुपाया. दक्षिण भारत में कावेरी नदी पर बना यह कल्लनई बांध वर्तमान में तमिलनाडू के तिरूचिरापल्ली जिले में है. इसका निमार्ण चोल राजवंश के शासन काल में हुआ था.राज्य में पड़ने वाले सूखे और बाढ़ से निपटने के लिए कावेरी नदी को डायवर्ट कर बनाया गया यह बांध प्राचीन भारतीयों की इंजीनियरिंग का उत्तम उदाहरण है.
कल्लनई बांध को चोल शासक करिकाल ने बनवाया था.यह बांध करीब एक हजार फीट लंबा और 60 फीट चौड़ा है.
आपको जानकर हैरानी होगी कि इस बांध में जिस तकनीक का उपयोग किया गया है वह वर्तमान विश्व की आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक है, जिसकी भारतीयों को आज से करीब 2 हजार वर्ष पहले ही जानकारी थी.

कावेरी नदी की जलधारा बहुत तीव्र गति से बहती है, जिससे बरसात के मौसम में यह डेल्टाई क्षेत्र में भयंकर बाढ़ से तबाही मचाती है.
पानी की तेज धार के कारण इस नदी पर किसी निर्माण या बांध का टिक पाना बहुत ही मुश्किल काम था. उस समय के भारतीय वैज्ञानिकों ने इस चुनौती को स्वीकार किया और और नदी की तेज धारा पर बांध बना दिया जो 2 हजार वर्ष बीत जाने के बाद आज भी ज्यों का त्यों खड़ा है.
इस बांध को आप कभी देखेंगे तो पाएंगे यह जिग जैग आकार का है. यह जिग जैग आकार का इस लिए बनाया गया था ताकि पानी के तेज बहाव से बांध की दीवारों पर पड़ने वाली फोर्स को डायवर्ट कर उस पर दवाब को कम कर सके. देश ही नहीं दुनिया में बनने वाले सभी आधुनिक बांधों के लिए यह बांध आज प्रेरणा का स्रोत है.
यह कल्लनई बांध तमिलनाडू में सिंचाई का महत्वपूर्ण स्रोत है.
• आज भी इससे करीब 10 लाख एकड़ जमीन की सिंचाई होती है.

चित्तौड़गढ़ दुर्ग इस दुर्ग का निर्माण 7वीं शताब्दी में चित्रांगद मौर्य के द्वारा करवाया गया

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गुजरात और राजस्थान के सीढ़ीदार कुआँ,कुछ इतिहास तथा अन्य प्राचीन जल इंजीनियरिंग को देखेंगे। (बावड़ी)

गुजरात और राजस्थान के सीढ़ीदार कुआँ,कुछ इतिहास तथा अन्य प्राचीन जल इंजीनियरिंग को देखेंगे। Stepwell (बावड़ी)

रानी की वाव भारत के गुजरात राज्य के पाटण में स्थित प्रसिद्ध बावड़ी (सीढ़ीदार कुआँ) है। ... कहते हैं कि रानी की वाव (बावड़ी) वर्ष 1063 में सोलंकी शासन के राजा भीमदेव प्रथम की प्रेमिल स्मृति में उनकी पत्नी रानी उदयामति ने बनवाया था।

जयपुर, राजस्थान के समीप आभानेरी गाँव में स्थित चाँद बावड़ी भारत की सबसे सुन्दर बावड़ी है। मैं तो इसे सर्वाधिक चित्रीकरण योग्य बावड़ी भी मानती हूँ।
चांद बावड़ी के नाम से मशहूर इस बावड़ी का निर्माण आज से करीब 1200 साल पहले यानि 9वीं शताब्दी के आसपास किया गया था। इस बावड़ी के अंदर 3,500 सीढ़ियां हैं जो नीचे की ओर जाती हैं। उस समय अगर किसी भी व्यक्ति को बावड़ी के भीतर से पानी निकालना होता था तो उसे पहले साढ़े तीन हजार सीढ़ियां नीचे जाना पड़ता था।

Rani ki vav) भारत के गुजरात राज्य के पाटण ज़िले में स्थित प्रसिद्ध बावड़ी (सीढ़ीदार कुआँ) है। 23 जून, 2014 को इसे यूनेस्को के विश्व विरासत स्थल में सम्मिलित किया गया।[1] बावड़ी में बनी बहुत-सी कलाकृतियों की मूर्तियों में ज्यादातर भगवान विष्णु से संबंधित हैं। भगवान विष्णु के दशावतार के रूप में ही बावड़ी में मूर्तियों का निर्माण किया गया है, जिनमे मुख्य रूप से कल्कि, राम, कृष्णा, नरसिम्हा, वामन, वाराही और दुसरे मुख्य अवतार भी शामिल हैं। इसके साथ-साथ बावड़ी में नागकन्या और योगिनी जैसी सुंदर अप्सराओं की कलाकृतियाँ भी बनायी गयी हैं। बावड़ी की कलाकृतियों को अद्भुत और आकर्षित रूप में बनाया गया है।

• 'रानी की वाव' एक भूमिगत संरचना है, जिसमें सीढ़ीयों की एक श्रृंखला, चौड़े चबूतरे, मंडप और दीवारों पर मूर्तियां बनी हैं। रानी की वाव को रानी उदयामती ने अपने पति राजा भीमदेव की याद में वर्ष 1063 ई. में बनवाया था। राजा भीमदेव गुजरात के सोलंकी राजवंश के संस्थापक थे। भूगर्भीय बदलावों के कारण आने वाली बाढ़ और लुप्त हुई सरस्वती नदी के कारण यह बहुमूल्य धरोहर तकरीबन 700 सालों तक गाद की परतों तले दबी रही। बाद में भारतीय पुरातत्व विभाग ने इसे खोजा। वाव के खंभे सोलंकी वंश और उसके आर्किटेक्चर के नायाब नमूने हैं। वाव की दीवारों और खंभों पर ज्यादातर नक्काशियां राम, वामन, महिषासुरमर्दिनी, कल्कि जैसे अवतारों के कई रूपों में भगवान विष्णु को समर्पित हैं। इस वाव में एक छोटा द्वार भी है, जहां से 30 किलोमीटर लम्बी सुरंग निकलती है। रानी की वाव ऐसी इकलौती बावड़ी है, जो विश्व धरोहर सूची में शामिल हुई है।

Stepwells are wells or ponds in which the water is reached by descending a set of steps to the water level. They may be multi-storied with a bullock turning a water wheel to raise the well water to the first or second floor.

यह बावड़ी एक भूमिगत संरचना है जिसमें सीढ़ीयों.

अपने प्रकार की यह इकलौती बावड़ी ”रानी की वाव” चारों तरफ से बेहद आर्कषक कलाकृतियों और मूर्तियों से घिरी हुई है। इस ऐतिहासिक बावड़ी का निर्माण 11वीं सदी में सोलंकी वंश के राजा भीमदेव की याद में उनकी पत्नी रानी उदयमती ने करवाया था। सरस्वती नदी के किनारे स्थित इस बावड़ी को इसकी अद्भुत एवं विशाल संरचना की वजह से यूनेस्को द्धारा साल 2014 में विश्व धरोहर की सूची में भी शामिल किया गया है।
यह अपने आप में इसकी अद्धितीय और अनूठी संरचना है, जो कि भूमिगत पानी के स्त्रोतों से थोड़ी अलग है। इस विशाल ऐतिहासिक संरचना के अंदर 500 से भी ज्यादा मूर्तिकलाओं का बेहद शानदार ढंग से प्रदर्शन किया गया है।

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गुजरात राज्य के कच्छ जिले में हैं Dholavira (धोलावीरा), सिंधु घाटी सभ्यता प्राचीन इतिहास देखते हैं ।

Dholavira – धोलावीरा शहर सिंधु घाटी सभ्यता के कुछ प्रमुख शहरों में से एक हुवा करता था। और इसी सभ्यता के गुजरात राज्य के कच्छ जिले में स्थित धोलावीरा पुरातत्वीय शहर के बारे में विस्तार से जानेंगे। तो आइये फ्रेंड्स शुरू करते है।

धोलावीरा भारत के पश्चिम में आए हुए गुजरात राज्य के कच्छ जिले के भचाऊ तालुका में आये हुवे गांव खदिरबेट में मिली हुई पुरातत्वीय जगह है। धोलावीरा शहर करीब 100 से 120 एकर में फैला हुवा है।

कच्छ के स्थानीय लोग इसे कोटड़ा टिम्बा (जिसका अर्थ है बड़ा किला) के नाम से जानते है। इस जगह में प्राचीन सिंधु सभ्यता के धोलावीरा शहर के खँडहर दबे पड़े है।
धोलावीरा की तुलना हड़प्पा संस्कृति के अन्य प्रमुख शहरों जैसे मोहनजोदड़ो (सिंध,पाकिस्तान), हड़प्पा(साहीवाल,पंजाब,पाकिस्तान), गनेरीवाला(बहावलपुर,पंजाब,पाकिस्तान), कालीबंगा ( राजस्थान, भारत ), राखीगढ़ी (हरियाणा,भारत), बनवाली (हरियाणा,भारत) और लोथल(गुजरात,भारत) से की जा सकती है।

यह सारे शहर सिंधु घाटी सभ्यता जिसे इंडस वेली सभ्यता से भी जाना जाता है उसके प्रमुख शहर हुवा करते थे जिसमे यह सभ्यता फूली फली थी।
सिंधु सभ्यता को अगर हम ईजिप्त की मिस्र या मेसोपोटेमिया की सभ्यता के साथ तुलना करें तो यह पता चलता है की यह सारी सभ्यता एक ही युग में फली फूली थी।
आज से 5000 वर्ष पहले भारत की इस सभ्यता ने अर्बन सविलाइज़ेशन का सबसे पहला मॉडल बनाया था।

इस समय जब बाकि की दुनिया खाना और पानी कैसे ढूंढे उसके बारे में सोच रही थी तब ये उन्नत सभ्यता खेती, पक्की इमारतें, व्यापर और साहित्य जैसी कई दिशाओं में आगे बढ़ चुकी थी।

यह सभ्यता गणित, विज्ञान, इंजीनरिंग, भूमिति, धातुविद्या और खेती के काम में भी माहिर थी।

यह बात सोचने लायक है की उस समय की सबसे उन्नत सभ्यता का पतन कैसे हो गया? तो आइये आज हम इसके इतिहास को थोड़ा और क़रीबसे जानने की कोशिश करते है।
Dholavira History - धोलावीरा हिस्ट्री..
धोलावीरा भारत के दो सबसे बड़े हड़प्पा स्थलों में से एक है, और उपमहाद्वीप में 5 वां सबसे बड़ा स्थान है।

लोथल की तरह धोलावीरा भी हड़प्पा संस्कृति के सभी दौरों (लगभग 2900 ईसा पूर्व से 1500 ईसा पूर्व तक) से गुजरा था। जबकि दूसरे शहरों ने शुरुआती या तो आखरी दौर ही देखा था।

1967 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा साइट का पता लगाया गया था, लेकिन केवल 1990 के बाद से व्यवस्थित रूप से खुदाई की गई है।
पुरातत्विदों के मत अनुसार धोलावीरा सिंधु सभ्यता के मुख्य शहर में से एक हुवा करता था। यह 47 हेक्टेयर चतुर्भुज शहर दो मौसमी धाराओं के बीच स्थित है। जब धोलावीरा शहर नया-नया बसा ही था तब वहाँ के लोग मिट्टी के पत्थर बनाते थे, पत्थर तोड़ते थे और शंख आदि के मनके बनाते थे।

धोलावीरा की नगर व्यस्था में एक किला (जहां शासक, उनके वंशज और उनके उच्च अधिकारी) रहते थे, मध्य शहर और निचले शहर (जिसमे आम जनता और बाजार) हुवा करते थे।

हमारी तरह सिंधु घाटी की सभ्यता भी पक्की गाणितिक वव्यस्थापन से रहती थी। आधुनिक तौर तरीकों से खेती और व्यापर किया करती थी।

इस सभ्यताओं को उन्नत इस लिए माना जाता है क्यूंकि जब बाकि की कई सभ्यताएं जंगल में ही रहा करती थी और खाने और पिने के लिए रास्ते तलाश रही थीं तब यह सभ्यता ने रहने के लिए पक्के घर बना लिए थे जिसमे कमरे, बाथरूम और टॉयलेट की भी व्यस्था थीं जिसके पानी के निकाल के लिए नाले और ड्रेनेज की भी एक पक्की संरचना मौजूद थीं।
जमीं के निचे दबी मिली सुद्रढ़ नगर रचना आज के इंजीनरिंग को भी मात देती है। क्यूंकि उस ज़माने में कोई आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल किए बिना सिर्फ मानव परिश्रम के द्वारा इतनी सुद्रढ़ संरचना बनाना उनकी गाणितिक सूज बूज की गवाही देती है।
हर घर में बाथरूम का इस्तेमाल होता था। इस पानी के निकाल के लिए.,

धोलावीरा में दो मौसमी नाले या धाराएँ थीं, उत्तर में मानसर और दक्षिण में मनहर। मतलब की धोलावीरा के निवासियों ने यह दो धाराओं के बीच अपना शहर बसाया हुवा था,जो मॉनसून में अपना पानी इकट्ठा करते थे और वर्ष के बाकी समय तक इसका उपयोग करते थे।

Dholavira, located around 250 km away from Bhuj is a famous ancient archaeological place that marks the existence of historical Harappa Sanskriti.

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राजस्थान बढ़ रहा भयानक भूजल संकट की ओर, खत्म हो सकता है पानी (देखिये कैसे जीते हैं लोग)।अकाल,सूखा।

झीलों के क्षेत्र के नाम प्रसिद्ध और खुद पीएचईडी मंत्री किरण माहेश्वरी के उदयपुर संभाग के गांव प्रदेश में सबसे ज्यादा प्यासे हैं। मंत्री का विधानसभा क्षेत्र राजसमंद कम्पलीट डार्क जोन घोषित हो चुका है, जबकि जहां उनका निवास स्थान है उस गृह जिले उदयपुर में 2498 गांव सूखे और जल संकट से जूझ रहे हैं। - संभाग के बांसवाड़ा के 1154 गांव, राजसमंद के 1063, डूंगरपुर के 988, प्रतापगढ़ के 827 और चित्तौडगढ के 94 गांवों में जल आपातकाल की स्थित बन गई है।
- हालात ये हैं कि मेवाड़ के कई गांवों में पीएचईडी विभाग पानी के टैंकर तक नहीं पहुंचा पाता है। - कई गांवों में तो पानी के लिए ग्रामीणों को 3 से 4 किमी दूर कुएं में उतरकर पानी लाना पड़ता है। - गर्मी बढ़ने के साथ इन गांवों में स्थिति और भयावह हो सकती है।
पानी के लिए 50 फीट गहरे कुओं में जोखिम में जान
- कातनवाड़ा पंचायत के सुमावत, मनावत, मेरावत, कनात, धयात, भाडला, निचला फला, वडाई और वातडा़ फलों में जलसंकट है।
- महिलाएं पचास फीट गहरे दो कुओं में जान जोखिम में डालकर पानी निकालती हैं।
- नीचे उतरने के लिए पत्थर लगे हैं, लेकिन इन पर पैर रखने जितनी जगह भी नहीं है।
- ऐसे हालात छह महीने से हैं। पंचायत में फ्लोराइडयुक्त पानी होने से जयसमंद से जोड़कर दो टंकियां बनवा रखी हैं।
- आठ साल पहले बनी एक टंकी अब तक एक बार भी नहीं भरी। दूसरी टंकी एक महीने से नाकारा पड़ी है।
सूखे नाले में वेरी, ये ही पानी पीते हैं इंसान और मवेशी
महाद पंचायत में पावटी फला (सूरा) में हैंडपंप तक नहीं है। ग्रामीणों ने नाले के पेटे में वेरी (गड्ढा) खोद रखा है। इंसान और मवेशी इसी से पानी पीते हैं। ऐसे हालात बरसों से हैं। ग्रामीण बताते हैं कि हैंडपंप के लिए कई बार जनप्रतिनिधियों से मिले, पर किसी ने पीड़ा नहीं सुनी। बेडाधर में कथौड़ी बस्ती के भी ये ही हाल हैं। हैंडपंप में जंग लगा पानी आता है। महिलाओं ने एक किमी दूर नदी पेटे में वेरी खोद रखी है। घंटों की मशक्कत के बाद एक घड़ा भरता है।
राज्य के 16 जिलों में राजसमंद-चित्तौड़गढ़ पूरी तरह डार्क जोन में
बाड़मेर, भीलवाड़ा, नागौर, भरतपुर, सवाई माधोपुर, धौलपुर, करौली, अलवर, दौसा, झुंझुनूं, जैसलमेर, जालौर, सिरोही, झालावाड़, चित्तौडगढ़, राजसमंद जिला कम्पलीट डार्क जोन घोषित हैं। उदयपुर जिले में बडग़ांव, भींडर, गोगुंदा, गिर्वा और मावली ब्लॉक डार्क जोन में हैं। डार्क जोन वे हैं, जहां 100 प्रतिशत से ज्यादा पानी तेजी से खपत हो रहा है। इसके अलावा लसाडिय़ा, झाड़ोल, खेरवाड़ा, कोटड़ा, सलूम्बर, सराड़ा ब्लॉक अतिसंवेदनशील श्रेणी में आ चुके हैं।
32 साल में यूं बढ़ी पानी की खपत
वर्ष 1984 में पूरे राजस्थान में भूजल विकास दर 35 प्रतिशत थी। जो आज बढ़कर 137 प्रतिशत गई है। 32 साल के दौरान खपत 132 प्रतिशत बढ़ गई है। 4500 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी निकलता था। आज 14 हजार 800 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी निकल रहा हैं।
यहां भयावह हालात
प्रतापगढ़ जिले के अरनोद कस्बे सहित उपखंड के दलोट, निनोर, सालमगढ़ में पेयजल के भयावह हालात है।

मौसम विभाग के आकड़ों के अनुसार प्रदेश के जयपुर, भीलवाड़ा, भरतपुर, धौलपुर, करौली, सवाई माधोपुर, अलवर, दौसा और प्रतापगढ़ में कम वर्षा होने के कारण इन जिलों में पानी की जबरदस्त किल्लत है।
किसानों की बर्बाद हुई फसलों में बाजरा, मूंग, मोठ, ग्वार और तिल प्रमुख हैं। बासनी हरिसिंह गांव एवं आसपास के सभी क्षेत्रों के किसान अपनी रही सही फसल काटने पर मजबूर हैं। किसानों का कहना है कि बारिश का इंतजार करते-करते फसलें सूख चुकी हैं। अब हम इन सूखी हुई फसलों को काटने को मजबूर हो रहे हैं।

किसानों का कहना है कि बारिश नहीं होने से अब ‘भागते भूत की लंगोटी भली’ के तहत सूखी फसलों की कटाई कर कुछ दिन पशुओं के चारे का इंतजाम किया जा रहा है। मारवाड़ में इस बार चारा, पानी और अनाज के नहीं होने से अकाल दस्तक दे चुका है। किसानों ने कहा कि यदि सरकार ने समय रहते किसानों की सहायता नहीं की तो स्थिति और भी विकट हो सकती है। कई गांवों में तालाब लगभग सूख चुके हैं और आने वाले समय में इन गांवों में पीने के पानी की भंयकर समस्या पैदा हो सकती है।
देश की एकमात्र मरूभूमि राजस्थान भूजल संकट के कगार पर है। राज्य में भूजल के 295 ब्लॉक में से 184 अतिदोहित श्रेणी में आ चुके हैं। मतलब आधे से ज्यादा राज्य में जमीनी पानी कभी भी समाप्त हो सकता है।

Rajasthan is facing a severe water crisis, with a decadal average study has inferring that there has been a decline in groundwater by 62.70% in the state with only 37.20% rise. ... The study was conducted by the Central Ground Water Board (CGWB) on 928 stations.

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राजस्थान के लोग कैसे बचा रहे अपने नदियों को, सूख चुकी नान्दूवाली नदी का फिर से बहने लगी । अलवर जिला।

यह कल्पना करना मुश्किल है कि यह नदी और जंगल कभी सूख चले थे। पेड़ों के साथ-साथ समाज और परम्पराओं का भी कटाव होने लगा था। कुओं में कटीली झाड़ियाँ उग आईं और बरसात से जो थोड़ी सी फसल होती उसमें गुजारा करना मुश्किल था। गाय-भैंस बेचकर कई परिवार बकरियाँ रखने लगे क्योंकि चारे को खरीदने और गाँव तक लाने में ही काफी पैसे खर्च हो जाते। जवान लोगों का रोजी-रोटी के लिये पलायन जरूरी हो गया। निम्न जाति के परिवारों की हालत बदतर थी। सूख चुकी नान्दूवाली नदी का फिर से बहना अकाल ग्रस्त भारत के लिये एक सुखद सन्देश है। ढाक के पेड़ों पर नई लाल पत्तियाँ आ रही हैं पर कदम, ढोंक और खेजड़ी की शाखाएँ लदी हुई हैं। एक दूसरे में मिलकर यह हमें कठोर धूप से बचा रहे हैं। जिस कच्चे रास्ते पर हम बढ़ रहे हैं वह धीरे-धीरे सख्त पत्थरों को पीछे छोड़ मुलायम हो चला है और कुछ ही दूरी पर नान्दूवाली नदी में विलीन हो जाता है। राजस्थान में अलवर जिले के राजगढ़ इलाके की यह मुख्य धारा कई गाँव के कुओं और खलिहानों को जीवन देती चलती है। इनमें न सिर्फ कई मन अनाज, बल्कि सब्जियों की बाड़ी और दुग्ध उत्पादन भी शामिल है। रायका समुदाय इस क्षेत्र की सबसे पिछड़ी जाति है। पारम्परिक तौर पर ऊँटों के व्यापारी रायका थोड़ी सी आमदनी से गुजारा करते। लेकिन आज इस इलाके के 15 रायका परिवारों के पास पक्के मकान और खेत हैं जिस पर सब्जियाँ, गेहूँ और सरसों की फसल उन्हें अच्छी आमदनी देती हैं। 30 वर्षीय जय सिंह रायका कहते हैं कि उनकी जमीन पर कोई सिंचाई सुविधा नहीं थी पर पास में एक जोहड़ के निर्माण से उनके भी कुएँ तर हो गए जिससे फसल अच्छी होने लगी।

अपने दम पर पानी और जंगल सहेज रहे हैं ग्रामीण

धीरे-धीरे जब खेती में सुधार हुआ तो समाज का योगदान 25 प्रतिशत से बढ़कर 100 प्रतिशत हो गया। पिछले तीन साल से संस्था ने कुछ भी खर्चा नहीं किया परन्तु जोहड़, एनीकट और मेड़बन्दी बनती चली जा रही है।

गाँव वाले निर्माण से लेकर मरम्मत और वनों का संरक्षण अपने दम पर कर रहें हैं। कुंज बिहारी एक तकनीकी सहायक की तरह जरूरत पड़ने पर हाजिर हो जाते हैं। वह बताते हैं कि हर कोई यहाँ एक इंजीनियर है। वह केवल पानी के सतही और धरातल के स्वभाव को ही नहीं, निर्माण के सभी पहलुओं की जानकारी रखते हैं।

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१) अजमेर - साबरमती, सरस्वती, खारी, ड़ाई, बनास
२) अलवर - साबी, रुपाढेल, काली, गौरी, सोटा
३) बाँसबाड़ा - माही, अन्नास, चैणी
४) बाड़मेर - लूनी, सूंकड़ी
५) भरतपुर - चम्बल, बराह, बाणगंगा, गंभीरी, पार्वती
६) भीलवाडा - बनास, कोठारी, बेडच, मेनाली, मानसी, खारी
७) बीकानेर - कोई नदी नही
८) बूंदी - कुराल
९) चुरु - कोई नदी नही
१०) धौलपुर - चंबल
११) डूंगरपुर - सोम, माही, सोनी
१२) श्रीगंगानगर - धग्धर
१३) जयपुर - बाणगंगा, बांड़ी, ढूंढ, मोरेल, साबी, सोटा, डाई, सखा, मासी
१४) जैसलमेर - काकनेय, चांघण, लाठी, धऊआ, धोगड़ी
१५) जालौर - लूनी, बांड़ी, जवाई, सूकड़ी
१६) झालावाड़ - काली सिन्ध, पर्वती, छौटी काली सिंध, निवाज
१७) झुंझुनू - काटली
१८) जोधपुर - लूनी, माठड़ी, जोजरी
१९) कोटा - चम्बल, काली सिंध, पार्वती, आऊ निवाज, परवन
२०) नागौर - लूनी
२१) पाली - लीलड़ी, बांडी, सूकड़ी जवाई
२२) सवाई माधोपुर - चंबल, बनास, मोरेल
२३) सीकर - काटली, मन्था, पावटा, कावंट
२४) सिरोही - प. बनास, सूकड़ी, पोसालिया, खाती, किशनावती, झूला, सुरवटा
२५) टोंक - बनास, मासी, बांडी
२६) उदयपुर - बनास, बेडच, बाकल, सोम, जाखम, साबरमती
२७) चित्तौडगढ़ - वनास, बेडच, बामणी, बागली, बागन, औराई, गंभीरी, सीवान, जाखम, माही।

The 22km long river which flows through the village Nandu situated 65km to the west of Alwar District in Rajasthan. It focuses on the methods used by the people in the village to revive the river. The process was initiated by Satish Sharma and Kunj Bihari. They are brothers and are natives of Nandu. They played a vital role in creating awareness among the people of Nandu.
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रेन-वाटर हार्वेस्टिंग - Hindi (Rainwater Harvesting in Hindi)

Why is Rain Water Harvesting Important?

वर्षा जल संचयन प्राकृतिक जलाशयों या टैंकों के लिए वर्षा जल के संचय और भंडारण या सतह जल की घुसपैठ को संदर्भित करता है ताकि बाद में इसका पुन: उपयोग करने के लिए सतह के जल को सतह पर लाया जा सके। वर्षा जल संचयन बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पानी की बर्बादी को रोकने और इसे कई तरीकों से उपयोग करने का अभ्यास है।

ऐसी कई विधियाँ हैं, जिनके माध्यम से यह किया जा सकता है जैसे सतही जल संग्रह प्रणाली, कटाई की छत की विधि, भूमिगत टैंक, बांध, ढलान, बैराज, जल संग्रह जलाशय, खाइयां आदि। कटाई का पानी भविष्य में पानी की सुचारू आपूर्ति सुनिश्चित करता है और रोकता है। पानी की कमी।

वर्षा जल संचयन का अर्थ है वर्षा जल को प्राकृतिक जलाशयों या मानव निर्मित टैंकों में एकत्रित करना। यह भविष्य में विभिन्न उद्देश्यों के लिए वर्षा जल को इकट्ठा करने और संग्रहीत करने की तकनीक है। वर्षा जल संचयन का सबसे आम और आसान तरीका छत की कटाई है।

इस तकनीक का उपयोग करके हम बरसात के मौसम में बहुत से स्वच्छ वर्षा जल एकत्र कर सकते हैं। इसे घरेलू प्रयोजनों जैसे बागवानी, पशुधन और सिंचाई आदि के लिए लंबे समय तक संग्रहीत किया जा सकता है, वर्षा जल संचयन के लाभ निम्नलिखित हैं:

यह जल आपूर्ति भार और नगरपालिका के बिजली के बिलों को कम करने में मदद करता है, ग्रामीण इलाकों में मुफ्त
पानी की आपूर्ति, फसल उत्पादन में सुधार करता है और इस तरह खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा मिलता है।
वर्षा जल संचयन प्रणाली ग्रामीण क्षेत्रों में घरों या व्यक्तियों की असुरक्षा को कम करने में मदद करती है।
यह जल क्षेत्रों की कमी में आसान और कम लागत वाली जल आपूर्ति प्रदान करता है जिससे खाद्य सुरक्षा और आय सृजन में मदद मिलती है।
तमिलनाडु भारत के राज्यों में से एक है और अब यह पहला भारतीय राज्य है जहाँ वर्षा जल संचयन अनिवार्य किया गया है।
तमिलनाडु राज्य सरकार ने चेन्नई में विभिन्न स्थानों पर लगभग 50,000 वर्षा जल संचयन संरचनाओं को स्थापित करने के लिए 30 मई 2014 को घोषित किया है। अब तक, तमिलनाडु के लगभग 4,000 मंदिरों में बारिश के पानी के टैंक हैं जो मंदिरों में विभिन्न अनुष्ठानों में सेवा करते हैं और भूजल को रिचार्ज करने में मदद करते हैं।

It is a more sustainable practice
Using harvested rainwater is a brilliant way of lessening your carbon footprint and living in a more environmentally friendly way. Wasting perfectly clean potable water to do things like water plants and flush toilets isn’t a sustainable practice, and it should be avoided if possible.

It is much more sustainable to use water from the tap for cooking and drinking, and use your harvested rainwater for everything else.

Rainwater harvesters are winning
There are endless reasons why collecting rainwater is essential, from doing your part for the environment and saving money on bills to having access to water all of the time.

Getting started takes no time at all and doesn’t cost much so why not start off 2018 on a really positive note? Your garden, your pocket and our environment will thank you for it!

पोंग डैम, हिमाचल प्रदेश (Wildlife Bird Sanctuary) विदेशी परिंदो का स्वर्ग हैं। जानते हैं अनछुई बाते।

पोंग डैम जिला काँगड़ा, हिमाचल प्रदेश (Wildlife Bird Sanctuary), विदेशी परिंदो का स्वर्ग हैं। जानते हैं अनछुई बाते।

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के शिवालिक पहाड़ियों के आर्द्र भूमि पर ब्यास नदी पर बाँध बनाकर एक जलाशय का निर्माण किया गया है जिसे महाराणा प्रताप सागर नाम दिया गया है। इसे पौंग जलाशय या पौंग बांध के नाम से भी जाना जाता है। यह बाँध 1975 में बनाया गया था। महाराणा प्रताप के सम्मान में नामित यह जलाशय या झील एक प्रसिद्ध वन्यजीव अभयारण्य है और रामसर सम्मेलन द्वारा भारत में घोषित 25 अंतरराष्ट्रीय आर्द्रभूमि साइटों में से एक है।जलाशय 24,529 हेक्टेयर (60,610 एकड़) के एक क्षेत्र तक फैला हुआ है, और झीलों का भाग 15,662 हेक्टेयर (38,700 एकड़) है।
पौंग जलाशय हिमाचल प्रदेश में हिमालय की तलहटी में सबसे महत्वपूर्ण मछली वाला जलाशय है। इस जलाशय में महासीर मछली अत्याधिकता मे पाई जाती है |

पोंग बांध नई दिल्ली से 466 किमी, चंडीगढ़ से 170 किलोमीटर, अमृतसर से 110 किलोमीटर, धर्मशाला से 55 किलोमीटर की दूरी पर है। आप दिल्ली के आईएसबीटी से कांगड़ा तक एचआरटीसी वोल्वो बस ले सकते हैं और कांगड़ा से आप स्थानीय बसों द्वारा पोंग बांध पहुँच सकते हैं या आप टैक्सी स्टैंड कांगडा से किराए पर टैक्सी भी ले सकते हैं| बस स्टैंड पठानकोट : 01862-226966

ब्यास नदी पर बनाए गए पौंग बांध स्थित महाराणा प्रताप सागर झील में सर्दी की शुरुआत होते ही प्रवासी पक्षियों की आमद शुरू हो गई है। हर साल यह पक्षी साईबेरिया, तिब्बत तथा मध्य एशिया मे
ब्यास नदी पर बनाए गए पौंग बांध स्थित महाराणा प्रताप सागर झील में सर्दी की शुरुआत होते ही प्रवासी पक्षियों की आमद शुरू हो गई है। हर साल यह पक्षी साईबेरिया, तिब्बत तथा मध्य एशिया में बर्फबारी तथा ठंड बढ़ने से यहां हजारों किमी की उड़ान के बाद पहुंचते हैं। मार्च के मध्य तक प्रवास करते हैं तथा फिर वतन वापसी करते हैं। वन्य जीव संरक्षण अधिकारी सेवा ¨सह के अनुसार अब तक 50 प्रजातियों के 14 हजार मेहमान प¨रदे यहां पधार चुके हैं। ये रंग बिरंगे पक्षी 301 वर्ग किमी इलाके में फैली विशाल झील की रौनक बढ़ा रहे हैं।

दिसंबर के आखिर तक इनकी संख्या डेढ़ लाख तक हो जाती है। जैसे जैसे ठंड बढ़ेगी इनकी संख्या भी बढ़ेगी। पौंग झील में इस समय आए इन पक्षियों में सर्वाधिक नार्थन पिनटेल 3300, कामन कूट्स 2050, लिटल कार्मोरेंट 1500, कामनटेल 1000, पोचार्ड 900, शैवलर 100, ब्लैक हैडिड गीज 150, स्पाट विल डक 160, कामन पोचार्ड 100, रूडी शैल्डेक 500, लिटिल इगरिट 200, लिटिल ग्रेप 100, रीवर किग 100 तथा अन्य प्रजातियों के पक्षी यहां डेरा जमा चुके हैं। हर साल इन प¨रदों की गणना जनवरी में की जात है। इन्हें तब कालर ¨रग तथा ट्रांसमीटर भी लगाए जाते हैं। इन प्रवासियों की सुरक्षा को यकीनी बनाए रखने के लिए 22 टीमों का गठन किया गया है। इनके शिकार पर कड़ी नजर रखी जाती है तथा कड़े दंड का प्रवाधान है।

देश में सर्दी का मौसम शुरू होते ही विदेशी पक्षियों का रूख इस तरह हो जाता है, जब साइबेरिया व अफगानिस्तान में ठंड ज्यादा हो जाती है। हजारों किलोमीटर की दूरी तय तक पहुंचने वाले पक्षियों में कई रंगों और प्रजातियों के पक्षी शामिल हाेते है।
आजकल पौंग डैम पर आने वाले लोग इन पक्षियों को देख कर खूब आनंदित हो रहे है। महाराणा प्रताप सागर पौंग डैम स्थित झील में प्रवासी पक्षियों की आमद निरंतर बढ़ती जा रही है। मार्च महीने तक यहां रहने वाले पक्षियों की लगभग 103 प्रजातियों के लाखों मेहमान आते है।
अब तक झील में 1,15,229 लाख प्रवासी पक्षी अपनी आमद दर्ज करवा चुके हैं। यह संख्या पिछले वर्ष की तुलना में 5026 अधिक है। वर्ष 2017-18 में 62 प्रजातियों के प्रवासी पक्षियों की संख्या 1,10203 लाख रही थी।

वर्ष 1975 में एशिया के सबसे बड़े मिट्टी की दीवार से बने महाराणा प्रताप सागर पौंग डैम पर रीझकर | Migrant Birds On Pong Dam

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में महाराणा प्रताप सागर झील (Maharana Pratap Sagar Lake) में 50 हजार से अधिक प्रवासी पक्षी (Migratory Bird) पहुंच चुके हैं. महाराणा प्रताप सागर झील को पोंग जलाशय (Pong Reservoir) के नाम से भी जाना जाता है.

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थार रेगिस्तान के जीव के बारे में जानकारी – पशुओं का जीवन अन्य रेगिस्तानो के विपरीत देखा जा सकता हैं।

रेगिस्तान का मतलब यह नही होता कि आप वहा कुछ कर नही सकते हैं। बल्कि एक रेगिस्तान में करने के लिए पर्यटकों को बहुत कुछ होता हैं। आइए थार रेगिस्तान से सम्बंधित कुछ दिलचस्प गतिविधियों को देखते हैं।

थार रेगिस्तान में खूबसूरत रेत और बजरी के मैदान देखने को मिलते हैं। विविध पारिस्थितिकी तंत्र, शुष्क वनस्पति क्षेत्र, मानव संस्कृति और पशुओं का जीवन अन्य रेगिस्तानो के विपरीत देखा जा सकता हैं। थार मरुस्थल में लगभग 23 प्रजातियों की छिपकली और 25 प्रजातियों के साँपों को देखा जा सकता हैं। कृष्णमृग, चिंकारा आदि को कच्छ के रण में देखने का अनुभव भी आप प्राप्त कर सकते हैं। मोर, ईगल, हैरियर, फाल्कन्स, बज़ार्ड, केस्टेल और गिद्ध यहाँ के आकर्षण हैं। साथ ही थार मरुस्थल में कुछ ऐसी वन्य प्रजातियाँ देखने को मिलती हैं जोकि धीरे धीरे विलुप्त कि कगार पर हैं। द ग्रेट इंडियन डेजर्ट मुख रूप से ब्लैकबक, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, भारतीय जंगली गधा, काराकल, गोल्डन फॉक्स आदि के लिए जाना जाता हैं।

थार रेगिस्तान में पाए जाने वाले फ़्लोरा में सुन्दर प्राकृतिक वनस्पतियों को देखा जा सकता हैं जोकि प्रकृति-प्रेमियों के लिए बेहद ही ख़ास हैं। थार डेजर्ट के पश्चिमोत्तर भाग को कांटेदार झाड़ीदार वन के रूप में वर्गीकृत किया गया हैं। यह वृक्ष छोटे छोटे झुरमुटों या बिखरे हुए भी हैं। थार रेगिस्तान में जड़ी-बूटियों की बेशकीमती प्रजातियों सहित कई प्रकार की वनस्पति पाई जाती है। थार मरुस्थल में पाए जाने वाले वनस्पतियाँ निम्न प्रकार से हैं।

बबूल जेकमोंटोनी, बालानाइट्स रोक्सबर्गी, कैलोट्रोपिस प्रोकेरा, लाय्सियम बर्बरम, लाइबेरन बर्बेरनिका, ज़िज़िफस, झरबेर, सुआडा फ्रेटिकोसा, क्रोटलारिया बुरहिया, ऐरवा लिप्टाडेनिया पाइरोटेक्निका, लिज़ैबर बार, लाइबेरन बर्बेरिनिया, छुई मुई हमता, ओक्टोचलोआ कोम्प्रेसा, जवनिका, भैंस मल्टीफ्लोरम, लसीसुरस सिंडीसस, डायकोन्थियम एनालाटस, डैक्टाइलोक्टेनियम स्काइंडिकम, सेनच्रस सेटिगरस, दूब घास, डेंटम टर्गिडम, कुटकी, सेन्क्रस बाइफ्लोरस, स्पोरोबोलस मार्जिनबुलस मार्जिन आदि हैं।

Some of the native species of the Thar Desert include the desert scorpion, the red fox, the mongoose, the chinkara, the falcon, the blackbuck, the Indian Bustard and the wild cat; of course, when it comes to desert animals, the camel - the ship of the desert - cannot be far behind either.

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भारत का इतिहास ,प्रमुख ऐतिहासिक स्थल और उनसे जुड़ी अनछुई कहानियां । आइए जानते और देखते हैं हम।

भारत का इतिहास ,प्रमुख ऐतिहासिक स्थल और उनसे जुड़ी अनछुई कहानियां । आइए जानते और देखते हैं हम।

भारत का इतिहास भारत का इतिहास कई हजार वर्ष पुराना माना जाता है। 65,000 साल पहले, पहले आधुनिक मनुष्य, या होमो सेपियन्स, अफ्रीका से भारतीय उपमहाद्वीप में पहुंचे थे, जहां वे पहले विकसित हुए थे। सबसे पुराना ज्ञात आधुनिक मानव आज से लगभग 30,000 साल पहले दक्षिण एशिया में रहता है।
भारतीय इतिहास इतना समृद्ध है कि देश के हर हिस्से में आपको एक से बढ़कर एक ऐतिहासिक स्थल, प्राचीन किले और भव्य महल दिख जाएंगे। इन ऐतिहासिक स्थलों के पीछे छिपी है प्यार, वीरता, ताकत और युद्ध की प्रसिद्ध कहानियां। हम आपको बता रहे हैं

प्रमुख ऐतिहासिक स्थल और उनसे जुड़ी कहानियों के बारे में...

भारत को एक सनातन राष्ट्र माना जाता है क्योंकि यह मानव सभ्यता का पहला राष्ट्र था। श्रीमद्भागवत के पंचम स्कन्ध में भारत राष्ट्र की स्थापना का वर्णन आता है। भारतीय दर्शन के अनुसार सृष्टि उत्पत्ति के पश्चात ब्रह्मा के मानस पुत्र स्वयंभु मनु ने व्यवस्था सम्भाली। इनके दो पुत्र, प्रियव्रत और उत्तानपाद थे।

प्राचीन भारत के इतिहास में वैदिक सभ्‍यता सबसे प्रारंभिक सभ्‍यता है। इसका नामकरण हिन्‍दुओं के प्रारम्भिक साहित्‍य वेदों के नाम पर किया गया है। वैदिक सभ्‍यता सरस्‍वती नदी के किनारे के क्षेत्र जिसमें आधुनिक भारत के पंजाब और हरियाणा राज्‍य आते हैं, में विकसित हुई। वैदिक हिन्‍दुओं का पर्यायवाची है, यह वेदों से निकले धार्मिक और आध्‍यात्मिक विचारों का दूसरा नाम है।

इस अवधि के दो महान ग्रंथ रामायण और महाभारत थे।

भगवान गौतम बुद्ध के जीवनकाल में, ईसा पूर्व 7 वीं और शुरूआती 6 वीं शताब्दि के दौरान सोलह बड़ी शक्तियां (महाजनपद) विद्यमान थे। अति महत्‍वपूर्ण गणराज्‍यों में कपिलवस्‍तु के शाक्‍य और वैशाली के लिच्‍छवी गणराज्‍य थे। गणराज्‍यों के अलावा राजतंत्रीय राज्‍य भी थे।

भारत का इतिहास और संस्‍कृति गतिशील है और यह मानव सभ्‍यता की शुरूआत तक जाती है। यह सिंधु घाटी की रहस्‍यमयी संस्‍कृति से शुरू होती है और भारत के दक्षिणी इलाकों में किसान समुदाय तक जाती है। भारत के इतिहास में भारत के आस पास स्थित अनेक संस्‍कृतियों से लोगों का निरंतर समेकन होता रहा है। उपलब्‍ध साक्ष्‍य सुझाते हैं कि लोहे, तांबे और अन्‍य धातुओं के उपयोग काफी शुरूआती समय में भी भारतीय उप महाद्वीप में प्रचलित थे, जो दुनिया के इस हिस्‍से द्वारा की गई प्रगति का संकेत है। चौंथी सहस्राब्दि बी. सी. के अंत तक भारत एक अत्‍यंत विकसित सभ्‍यता के क्षेत्र के रूप में उभर चुका था।

Hominins expansion from Africa is estimated to have reached the Indian subcontinent approximately two million years ago, and possibly as early as 2.2 million years before the present. The Bronze Age in the Indian subcontinent began around 3300 BCE. Along with Ancient Egypt and Mesopotamia, the Indus valley region was one of three early cradles of civilisation of the Old World. History of Hinduism, History of Buddhism, History of Jainism, Indian religions, and Indian philosophy
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राजस्थान का जीवन परिचय हिंदी में | Rajasthani Way of Life

राजस्थान का जीवन परिचय हिंदी में | Rajasthani Way of Life
राजस्थान के गांव बेहद सुंदर, यहां की लोक-संस्कृति व जनजीवन में सीखने के लिए बहुत कुछ । राजस्थान के गांव बेहद सुंदर हैं, खासकर राजस्थान यहां की गांवों की महिलाएं भी बहुत खूबसूरत हैं। यहां सीखने के लिए बहुत कुछ है। यहां के लोग आज भी संयुक्त परिवार की तरह रहते हैं, यह पश्चिम के लिए आज भी कौतूहल जैसा है।

खुशहाल जीवन के लिए शुरू हुआ ... म्हारो राजस्थान, समृद्ध राजस्थान

राजस्थान का इतिहास, किले, महल और यहां की संस्कृति दुनियाभर में मशहूर है. अगर आप भी यहां घूमने का प्लान बना रहे हैं तो इन शहरों को अपनी लिस्ट में जरूर शामिल कर लें... 11 शहर जहां दिखते हैं राजस्थान के खूबसूरत रंग...

1. जयपुर:
राजस्थान की राजधानी जयपुर इस राज्य का सबसे बड़ा शहर है. यह 18 नवंबर 1727 में महाराजा जय सिंह द्वितीय ने बसाया था. यहां घूमने लायक जगह हैं - आमेर का किला, बिरला मंदिर, जंतर-मंतर, हवा महल, जल महल, जयगढ़ किला.
2. जोधपुर:
राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा शहर है जोधपुर. यहां मेहरानगढ़ का किला, उम्मेद भवन पैलेस, जसवंत थडा, घंटा घर, कल्याण सागर झील देखने लायक जगहें हैं.
3. चित्तौड़गढ़:
बेराच नदी के किनारे बसा यह शहर राजपूतों का ऐसिहासिक गढ़ माना जाता है. रानी पद्मिनी महल, चित्तौड़गढ़ का किला, विजय स्तंभ, राणा कुम्भा का महल, सबसे बड़ा राजपूत मेला 'जौहर मेला', कालिका माता का मंदिर जो पहले 8वीं शताब्दी में सू्र्य मंदिर था. बाद में 14वीं शताब्दी में इसे मां काली के मंदिर में बदल दिया गया, चित्तौड़गढ़ में ये सभी जगह जरूर घूमें.
4. बीकानेर:
यह राजस्थान का चौथा सबसे बड़ा शहर है. बीकानेर 1486 में राव बीका ने खोजा था. यहां घूमने लायक है - जूनागढ़ का किला, बीकानेर ऊंट सफारी, लालगढ़ महल, गजनेर पैलेस, गंगा सिंह म्यूजियम, जैन मंदिर.
5. अजमेर:
राजस्थान का पांचवा सबसे बड़ा शहर है अजमेर. अरावली पहाड़ियों से घिरा यह शहर ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के लिए मशहूर है. इसके अलावा यहां सोनी जी की नसियां (दिगंबर जैन मंदिर), 14वीं शताब्दी में बना पुष्कर में ब्रम्हा जी का मंदिर, नागौर मेला, पुष्कर मेला, ब्लू लोटस फेस्टिवल (फरवरी) आकर्षण का केंद्र हैं.
6. सवाई माधोपुर:
इस शहर में रणथम्बोर नेशनल पार्क, रणथम्बोर का किला (UNESCO द्वारा विश्व पुरातात्विक धरोहर घोषित), ग्रामीण कला को दर्शाता शिल्पग्राम, राजीव गांधी म्यूजियम ऑफ नैचुरल हिस्ट्री घूमने लायक हैं.
7. जैसलमेर:
महारावल जैसल सिंह ने इस शहर को 1156 AD में बसाया था और उन्हीं के नाम पर इसे जैसलमेर बुलाया गया. इस शहर को 'द गोल्डन सिटी' भी कहते हैं. यह थार रेगिस्तान पर बसा है. यहां कैम्पिंग, ऊंट सफारी का मजा लिया जा सकता है. जैसलमेर में सोनार का किला, भूतिया जगह कुलधारा और हर साल जनवरी/फरवरी में होने वाला डेजर्ट फेस्टिवल देखने लायक हैं.
8. उदयपुर:
यह मेवाड़ साम्राज्य की ऐतिहासिक राजधानी है. महाराणा उदय सिंह ने 1553 में उदयपुर को खोजा था और बाद में चित्तौड़गढ़ से अपनी राजधानी बदलकर यहां बसा ली. यहां फतेह सागर झील, उदयपुर का सिटी पैलेस, बगोर की हवेली, एकलिंग जी मंदिर, श्रीनाथ मंदिर देखने लायक हैं.
9. माउंट आबू:
राजस्थान के रेगिस्थान से हटकर अरावली की पहाड़ियों में बसा यह शहर मशहूर हिल स्टेशन में से एक है. यहां नक्की झील, दिलवाड़ा जैन मंदिर, 14वीं शताब्दी में राणा कुम्भा द्वारा बनवाया गया अचलगढ़ किला आकर्षण का केंद्र हैं.
10. भीलवाड़ा:
राजस्थान के इस शहर में आधार शीला महादेव के मंदिर में बड़े-बड़े पत्थर छोटे पत्थरों पर टिके हुए ये नजारा चौंकाने वाला है, जो कि इस मंदिर की खासियत भी है. इसके अलावा भीलवाड़ा में 32 खंभों की छतरी, श्री बीड के बालाजी घूमने वाली जगहें हैं.
11. अलवर:
भानगढ़ किले में छुपे डर के बारे में तो सभी जानते हैं, जी हां ये किला राजस्थान के अलवर में ही है. यह शहर दिल्ली से करीब 160 km और जयपुर से 150 km दूर है. यहां दुनिया का सबसे पुराना इंजन 'फैरी क्वीन', बाला किला (अलवर किला) भी देखने लायक हैं.

राजस्थान का इतिहास पूरे देश में मशहूर है। कहा जाता है कि इसकी खूबसूरती इसे विरासत में मिली है। यहां के किले,संस्कृति और पहनावे को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।

जल महल पानी पर तैरता राजस्थान का आकर्षण
डेजर्ट नेशनल पार्क जैसलमेर राजस्थान की जानकारी
रणथंभौर नेशनल पार्क घूमने की जानकारी
भीमलत वॉटरफॉल की जानकरी
कोटा घूमने की सम्पूर्ण जानकारी
जयसमंद झील का इतिहास और घूमने की जानकारी
जगदीश मंदिर का इतिहास और घूमने की जानकारी
जयसमंद झील का इतिहास और घूमने की जानकारी
फतेह सागर झील का इतिहास और घूमने की जानकारी
सिटी पैलेस उदयपुर राजस्थान के बारे में जानकारी
पिछोला झील का इतिहास और घूमने की पूरी जानकारी

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राजस्थान जहा ज़मीन के पानी से निकलता हैं नमक। सुजानगढ़ नमक कैसे बनता है। इन बातों से अंजान होंगे आप ।

राजस्थान जहा ज़मीन के पानी से निकलता हैं नमक। सुजानगढ़ नमक कैसे बनता है। इन बातों से अंजान होंगे आप ।

राजस्थान, एक बेहद ही सभ्य और खूबसूरत राज्य है। अपनी महमान नवाज़ी के लिए जाना जाने वाला ये राज्य हमेशा सबको पधारो म्हारे देश के नारे के साथ अपनी खूबसूरती दिखाने के लिए न्यौता देता है। आदर-सत्कार और परंपराओं को मानने वाले इस राज्य को देखना दुनिया भर के पर्यटक आते हैं। यूं तो राजस्थान का नाम सुनते ही अक्सर हमारे मन में एक बीयाबान रेगिस्तान जहां सिर्फ चिलचिलाती धूप और ऊंट पर बैठे कुछ लोगों की छवी बनती है। लेकिन हकीकत में राजस्थान में और भी बहुत कुछ है जो एक बार आखों में बसने के बाद कभी ओझल नहीं होगा।

राजस्थान की खारे पानी की झीले, विश्वविख्यात कृष्ण मृग अभयारण्य की सीमा पर करीब 1000 एकड़ में फैले लवण उद्योग का अब दम टूटने लगा है. सरकार ने नमक उद्योग लगाकर इस उद्योग की कभी सुध नहीं ली.
अभयारण्य विस्तार में नमक उद्योग व्यवसाय जमीन छोड़ने को तैयार व्यवसायियों से जब इस विषय पर वार्ता हुई तो उन्होंने बताया कि सरकार यदि निश्चित मुआवजा दे तो अभयारण्य विस्तार के लिए हम भूमि छोड़ने को भी तैयार हैं क्योंकि नमक का उत्पादन अब ना के बराबर होता है कुछेक नमक प्लॉट ही बचे हैं जो वर्तमान में नमक उत्पादन कर रहे हैं.

Sujangarh (सुजानगढ़) is the name of a city and a tahsil in Churu district of Rajasthan. Its old name was Guleriyon Ki Dhani (गुलेरियों की ढ़ाणी).

मोहिल जाटवंश राज्य - मोहिल जाटवंश ने बीकानेर राज्य स्थापना से पूर्व छापर में जो बीकानेर से 70 मील पूर्व में है और सुजानगढ़ के उत्तर में द्रोणपुर में अपनी राजधानियां स्थापित कीं। इनकी ‘राणा’ पदवी थी। छापर नामक झील भी मोहिलों के राज्य में थी जहां काफी नमक बनता है। कर्नल जेम्स टॉड ने अपने इतिहास के पृ० 1126 खण्ड 2 में लिखा है कि “मोहिल वंश का 140 गांवों पर शासन था।

मोहिल वंश के अधीन 140 गांवों के जिले (परगने) - छापर (मोहिलों की राजधानी), हीरासर, गोपालपुर, चारवास, सांडण, बीदासर. लाडनू, मलसीसर, खरबूजाराकोट आदि। जोधा जी के पुत्र बीदा (बीका का भाई) ने मोहिलों पर आक्रमण किया और उनके राज्य को जीत लिया। मोहिल लोग बहुत प्राचीनकाल से अपने राज्य में रहा करते थे। पृ० 1123.

नमक उद्योग नमक उद्योग राजस्थान में बड़े पैमाने के ... और पंचभद्रा में स्थित हैं, जबकि अनेक लघु सुजानगढ़ में स्थित हैं।

यह झील चुरु जिले में है तथा इससे लगभग 24000 टन वार्षिक नमक बनाया जाता है। कुचामन, फलौदी व सुजानगढ़ में कुओं से भी नमक बनाया जाता है।

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सांभर झील जयपुर से 60 किमी और अजमेर से 82 किमी की दूरी पर स्थित है। यहाँ के लिए नियमित बसें उपलब्ध हैं और सांभर का रेलवे जंक्शन भी है।
सांभर झील
राजस्थान के सांभर झील को राजस्थान की साल्ट लेक भी कहा जाता है जो भारत की सबसे बड़ी अंतर्देशीय नमक की झील है। जो 22.5 किमी क्षेत्र में फैली, यह भारत की सबसे बड़ी अंतर्देशीय नमक झील है जिसको 'थार रेगिस्तान का उपहार भी' माना जाता है। इस खारी झील 5.1 किमी लम्बी बांध में विभाजित की गयी है जो नमक को बनाने में मदद करता है।

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नर्मदा के किनारे के स्थित तीर्थ ,शक्ति पीठ तथा धार्मिक स्थल।बहुत सारे प्रसिद्ध तीर्थस्थान हैं देखते।

नर्मदा के किनारे के स्थित तीर्थ ,शक्ति पीठ तथा धार्मिक स्थल।बहुत सारे प्रसिद्ध तीर्थस्थान हैं देखते।

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तेरह सौ किलोमिटर का सफर तय करके अमरकंटक से निकलकर नर्मदा विन्ध्य और सतपुड़ा के बीच से होकर भडूच (भरुच)के पास खम्भात की खाड़ी में अरब सागर से जा मिलती है।
ऐतिहासिक दृष्टि से नर्मदा के तट बहुत ही प्रचीन माने जाते हैं। पुरातत्व विभाग मानता है कि नर्मदा के तट के कई इलाकों में प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष पाएँ गए है। ये सभ्यताएँ सिंधु घाटी की सभ्यता से मेल खाती है साथी ही इनकी प्राचीनता सिंधु सभ्यता से भी पुरानी मानी जाती है। देश की सभी नदियों की अपेक्षा नर्मदा विपरित दिशा में बहती है। नर्मदा एक पहाड़ी नदी होने के कारण कई स्थानों पर इसकी धारा बहुत ऊँचाई से गिरती है। अनेक स्थानों पर यह प्राचीन और बड़ी-बड़ी चट्टानों के बीच से सिंहनाद करती हुई गुजरती हैं।
भारत की नदियों में नर्मदा का अपना महत्व है। न जाने कितनी भूमि को इसने हरा-भरा बनाया है। कितने ही तीर्थ आज भी प्राचीन इतिहास के गवाह है। नर्मदा के जल का राजा है मगरमच्छ जिसके बारे में कहा जाता है कि धरती पर उसका अस्तित्व 25 करोड़ साल पुराना है। माँ नर्मदा मगरमच्छ पर सवार होकर ही यात्रा करती हैं, तो आओ चलते हैं हम भी नर्मदा की यात्रा पर।
ॐकारेश्वर :
कहते हैं कि वराह कल्प में जब सारी पृथ्वी जल में मग्न हो गई थी तो उस वक्त भी मार्केंडेय ऋषि का आश्रम जल से अछूता था। यह आश्रम नर्मदा के तट पर ॐकारेश्वर में है। ॐकारेश्वर में ज्योर्तिलिंग होने के कारण यह प्रसिद्ध प्राचीन हिंदू तीर्थ है।

ॐकारेश्वर के आसपास दोनों तीरों पर बड़ा घना वन है, जिसे 'सीता वन' कहते हैं। वाल्मीकि ऋषि का आश्रम यहीं कहीं था।

मंडलेश्वर और महेश्वर :
ॐकारेश्वर से महेश्वर लगभग 64 किम.

महेश्वर से कोई 19 किमी पर खलघाट है। इस स्थान को 'कपिला तीर्थ' भी कहते हैं। कपिला तीर्थ से 12 किमी पश्चिम में धर्मपुरी के पास महर्षि दधीचि का आश्रम बताया गया है। स्कंद-पुराण और वायु पुराण में इसका उल्लेख मिलता है।

शुक्लेश्वर :
धर्मपुरी के बाद कुश ऋषि की तपोभूति शुक्लेश्वर से आगे नर्मदा माता चिरवलदा पहुँचती हैं। माना जाता है कि यहाँ विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्री वसिष्ठ और कश्यप ने तप किया था।

शूलपाणी :
बावन गजा के आगे वरुण भगवान की तपोभूमि हापेश्वर के दुर्गम जंगल के बाद शूलपाणी नामक तीर्थ है। यहाँ शूलपाणी के अलावा कमलेश्वर, राजराजेश्वर आदि और भी कई मन्दिर हैं।
अन्य तीर्थ :
शूलपाणी से आगे चलकर क्रमश: गरुड़ेश्वर, शुक्रतीर्थ, अंकतेश्वर, कर्नाली, चांदोद, शुकेश्वर, व्यासतीर्थ होते हुए नर्मदा अनसूयामाई के स्थान पहुँचती हैं, जहाँ अत्री -ऋषि की आज्ञा से देवी अनसूयाजी ने पुत्र प्राप्ति के लिए तप किया था

अंगारेश्वर :
सीनोर के बाद भडूच तक कई छोटे-बड़े गाँव के बाद अंगारेश्वर में मंगल ने तप करके अंगारेश्वर की स्थापना की थी। कहते हैं कि अंगारेश्वर से आगे निकोरा में पृथ्वी का उद्धार करने के बाद वराह भगवान ने इस तीर्थ की स्थापना की। फिर आगे क्रमश: लाडवाँ में कुसुमेश्वर तीर्थ है। कितने ही तीर्थ आज भी प्राचीन इतिहास के गवाह है। नर्मदा के जल का राजा है मगरमच्छ जिसके बारे में कहा जाता है कि धरती पर उसका अस्तित्व 25 करोड़ साल पुराना है। माँ नर्मदा मगरमच्छ पर सवार होकर ही यात्रा करती हैं, तो आओ चलते हैं हम भी नर्मदा की यात्रा पर।

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भारत के छोटे शहरो की अनछुई कहानियां कन्नौज (kannauj) इत्र की खुशबू से महकती हैं गलियां। रोचक तथ्य ।

भारत के छोटे शहरो की अनछुई कहानियां कन्नौज (kannauj) जहां इत्र की खुशबू से महकती हैं गलियां। कुछ इतिहास और रोचक तथ्य ।

कन्नौज भारत के उत्तर प्रदेश राज्य का एक ऐतिहासिक शहर है। गंगा नदी के किनारे बसा यह शहर प्राचीन हथियारों और अन्य शिल्पकृतियों का एक समृद्ध संग्रह माना जाता है। यह नगर कई शासकों की राजधानी रह चुका है। यहां कई राजवंश जैसे कन्नौज-मोखारी वंश, नंद साम्राज्य, राष्ट्रकूट, पाल राजवंश, प्रतिहार राजवंश, चौहान, सोलंकी आदि का शासन रहा है। इसके अलावा यह नगर विदेशी यात्रियों का भी केंद्र बिन्दु रहा है। फा हिएन और ह्यूएन त्सांग नाम के दो विदेशी यात्रि कन्नौज का दौरा कर चुके हैं। इन सब के अलावा यह नगर पौराणिक व पुरातात्विक महत्व भी रखता है। भारतीय महाकाव्यों-रामायण और महाभारत में कन्नौज का उल्लेख मिलता है। कन्नौज संस्कृत के कान्यकुब्ज शब्द से बना है। आइए जानते पर्यटन के लिहाज से यह शहर आपके लिए कितना मायने रखता है।
भारत की इत्र नगरी उत्तर प्रदेश राज्य का कन्नौज शहर अपने इत्र उत्पादन के लिए जाना जाता है। यहां कई वर्षों से इत्र का उत्पादन और व्यापार किया जा रहा है। कन्नौज इत्र मध्य पूर्व देशों में भी काफी प्रसिद्ध था। ये देश कन्नोज के साथ व्यापार किया करता था। कहा जाता है कि कन्नौज से इत्र मुगल सम्राटों को भी पहुंचाई जाती थी।

कन्नौज की इत्र गलियों के भ्रमण के बाद आप यहां के चुनिंदा खास स्थलों की सैर का आनंद ले सकते हैं। आप यहां कन्नौज का पुरातत्व संग्रहालय देख सकते हैं। जहां कन्नौज के इतिहास को संजोकर रखा गया है। अपने ऐतिहासिक महत्व के लिए प्रसिद्ध यह शहर पुरातात्विक खजानों से भरा हुआ है, जिसकी खूबसूरत झलकी आप इस संग्रहालय के माध्यम से देख सकते हैं।
लाख बहोसी पक्षी अभयारण्य लाख बहोसी अभयारण्य एक पक्षी अभयारण्य है, जो लाख और बहोसी गांवों के निकट दो झीलों को अपने में समाए लगभग 80 वर्ग किमी में फैला है। यह भारत के चुनिंदा पक्षी अभयारण्यों में गिना जाता है।

धूल भरी गलियों-सड़कों वाले पुराने शहर कन्नौज में घूमने-फिरने के लिए कुछ खास नहीं है, लेकिन उम्दा चीजों के पारखी लोगों के लिए यहां एक बिल्कुल नई दुनिया के दरवाजे खुलते हैं

गरजते बादलों के साथ हो रही घनघोर बारिश में खचाखच भरी बस में बैठकर मैं कन्नौज की ओर बढ़ रही थी और मेरी यादें बचपन की ओर भाग रही थीं. मेरे कानों में एक आवाज गूंजने लगी. हर शाम गले में इत्र की शीशियों का बड़ा-सा बक्सा टांगे फेरी लगाते इत्रवाले की आवाज. वह अकसर मेरी दादी के घर आता. मेरी दादी बदलते मौसम के मुताबिक उससे इत्र खरीदा करती थीं और कहतीं कि यादों का नाता सबसे ज्यादा गंध से जुड़ा होता है.

इत्रवाला अपनी पतली उंगलियों से रूई लगी बारीक तीलियों को विभिन्न क्रिस्टल शीशियों में रखे इत्र में डुबोकर खुशबू के कई नमूने हमारे सामने पेश करता. खुशबू में भीगे वे लम्हे हमें अपने जादू में बांध लेते. उनमें से कुछ इत्र की बहुत खास खुशबू मानो अब भी सांसों से लिपटी हुई है.

अचानक बस के हॉर्न की कर्कश आवाज ने मेरी तंद्रा भंग कर दी. खिड़की से बाहर देखा तो बादल जमकर बरस रहे थे. बस ने मुझे मुख्य सड़क पर उतार दिया और डीजल के धुएं और कीचड़ के बीच छोड़कर आगे निकल गई. कन्नौज ऐसी जगह है, जहां ऊपरी तौर पर देखने के लिए कुछ खास नहीं है पर खोजी तबीयत के लोगों के लिए इस जगह में बेशुमार आकर्षण मौजूद है.

गंगा तट पर बसा कन्नौज हर्षवर्धन के साम्राज्य की राजधानी था. यहां इत्र का कारोबार फल-फूल रहा था. कन्नौज को इत्र के आसवन (डिस्टिलेशन) और बनाने का तरीका फारस से मिला था. आज जबकि ज्यादातर पुराने शहरों ने अपनी जड़ों से नाता तोड़कर एक नया वेश धारण कर लिया है, इत्रों के इस शहर ने इत्र बनाने की प्राचीन कला को आज भी अपने कलेजे से लगाकर.

मैंने एक रिक्शे वाले को आवाज दी और ट्रैफिक के जंजाल से निकलकर पुराने शहर के मुख्य इलाके की ओर चल पड़ी. चंद मिनटों में मेरे सामने इस प्राचीन शहर के गौरवशाली अतीत के पन्ने खुलने लग—चंदन की पुरानी डिस्टिलरी, इत्र की पुरानी दुकानें और प्राचीन मंदिर.

मैं प्रगति अरोमा डिस्टिलरी के पुष्पराज जैन की मेहमान थी, जिनका परिवार पिछली सात पीढिय़ों से इत्र के कारोबार में लगा हुआ है. उन्होंने मुझे अपनी डिस्टिलरी में घुमाया, जहां इत्र बनाने के लिए आज भी हाइड्रो डिस्टिलेशन के पारंपरिक तरीके का इस्तेमाल किया जाता है. तांबे के बड़े से कड़ाहों और बांस से बनी पाइपों के जरिए अत्तर और हाइड्रोसोल (गुलाब जल, केवड़ा जल) तैयार किए जाते हैं.

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नर्मदा भारत की नदी जो मध्य प्रदेश,गुजरात तथा राजस्थान के करोड़ो लोगो को जीवन देती हैं। आइए देखते हैं।

पुण्यसलिला मेकलसुता मां नर्मदा, जिनके पुण्य प्रताप से हर कोई परिचित है। वैसे तो आमतौर अनेक नदियों से कोई न कोई कथा जुड़ी हुई है, लेकिन मां नर्मदा इनमें सबसे भिन्न हैं।
-यह एकमात्र ऐसी नदी है जिसका पुराण है। यह एकमात्र ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है। बड़े-बड़े ऋषि मुनि नर्मदा के तटों पर गुप्त तप करते हैं।

-मान्यता है कि एक बार क्रोध में आकर इन्होंने अपनी दिशा परिवर्तित कर ली और चिरकाल तक अकेले ही बहने का निर्णय लिया। ये अन्य नदियों की तुलना में विपरीत दिशा में बहती हैं। इनके इस अखंड निर्णय की वजह से ही इन्हें चिरकुंआरी कहा जाता है। यहां हम आपको नर्मदा मैया से जुड़े कुछ ऐसे तथ्यों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनके बारे में साधारणतः जानना संभव नहीं होता।

-पुराणों में ऐसा बताया गया है कि इनका जन्म एक 12 वर्ष की कन्या के रूप में हुआ था। समुद्र मंथन के बाद भगवान शिव के पसीने की एक बूंद धरती पर गिरी जिससे मां नर्मदा प्रकट हो गईं। इसी वजह से इन्हें शिवसुता भी कहा जाता है।

-चिरकुंआरी मां नर्मदा के बारे में कहा जाता है कि चिरकाल तक मां नर्मदा को संसार में रहने का वरदान है। ऐसा उल्लेख मिलता है कि भगवान शिव ने मां रेवा को वरदान दिया था कि प्रलयकाल में भी तुम्हारा अंत नहीं होगा। अपने निर्मल जल से तुम युगों-युगों तक इस समस्त संसार का कल्याण करोगी।

-मध्य प्रदेश के खूबसूरत स्थल अमरकंटक अनूपपुर से मां नर्मदा का उद्गम स्थल है। यहां ये एक छोटी-सी धार से प्रारंभ होकर आगे बढ़ते हुए विशाल रूप धारण कर लेती हैं।

-यह स्थान अद्भुत दृश्यों के लिए भी जाना जाता है। इसी जगह पर मां रेवा का विवाह मंडप आज भी देखने मिलता है। पुराणों के अनुसार अपने प्रेमी सोनभद्र से क्रोधित होकर ही इन्होंने उल्टा बहने का निर्णय लिया और गुस्से में अपनी दिशा परिवर्तित कर ली।

-सोनभद्र और सखी जोहिला ने बाद में इनसे क्षमा भी मांगी, किंतु तब तक नर्मदा दूर तक बह चुकी थी। अपनी सखी के विश्वास को खंडित करने की वजह से ही जोहिला को पूज्यनीय नदियों में स्थान नहीं दिया गया है। सोन नदी या नद सोनभद्र का उद्गम स्थल भी अमरकंटक ही है।

-वैसे तो मां नर्मदा को लेकर अनेक मान्यताएं हैं लेकिन ऐसा बताया जाता है कि जो भी भक्त पूरी निष्ठा के साथ इनकी पूजा व दर्शन करते हैं उन्हें ये जीवनकाल में एक बार दर्शन अवश्य देती हैं।

-जिस प्रकार गंगा में स्नान का पुण्य है उसी प्रकार नर्मदा के दर्शन मात्र से मनुष्य के कष्टों का अंत हो जाता है।

-ऐसी पुरातन मान्यता है कि गंगा स्वयं प्रत्येक साल नर्मदा से भेंट एवं स्नान करने आती हैं। मां नर्मदा को मां गंगा से भी अधिक पवित्र माना गया है कहा जाता है कि इसी वजह से गंगा हर साल स्वयं को पवित्र करने नर्मदा के पास पहुंचती हैं। यह दिन गंगा दशहरा का माना जाता है।
नर्मदा नदी का उद्गम स्थल है 'अमरकंटक'
1. नर्मदा भारत के मध्यभाग में पूरब से पश्चिम की ओर बहने वाली मध्य प्रदेश और गुजरात राज्य में बहने वाली एक प्रमुख नदी है, जो गंगा के समान पूजनीय है। महाकाल पर्वत के अमरकण्टक शिखर से नर्मदा नदी की उत्पत्ति हुई है। नर्मदा सर्वत्र पुण्यमयी नदी बताई गई है तथा इसके उद्भव से लेकर संगम तक दस करोड़ तीर्थ हैं।

• पुण्या कनखले गंगा कुरुक्षेत्रे सरस्वती ।
ग्रामे वा यदि वारण्ये पुण्या सर्वत्र नर्मदा ॥

• नर्मदा संगम यावद् यावच्चामरकण्टकम् ।
तत्रान्तरे महाराज तीर्थकोट्यो दश स्थिता: ॥

नर्मदा नदी को मध्यप्रदेश की जीवन-रेखा कहा जाता है। पर्वतराज मैखल की पुत्री नर्मदा को रेवा के नाम से भी जाना जाता है। नर्मदा भारतीय प्रायद्वीप की सबसे प्रमुख और भारत की पांचवी बड़ी नदी मानी जाती है। विंध्य की पहाड़ियों में बसा अमरकंटक एक वन प्रदेश है। अमरकंटक को ही नर्मदा का उद्गम स्थल माना गया है। यह समुद्र तल से 3500 फुट की ऊंचाई पर स्थित है।

नर्मदा नदी (Narmada River) का उद्गम स्थल अमरकण्टक शिखर से है
1. ग्रंथों में इस नदी को रेवा के नाम से भी जाना जाता है
2. यह नदी पश्चिम की तरफ खम्बात की खाड़ी में गिरती है
3. इस नदी की सहायक नदियाँ बुढनेर, बंजर, शर, तबा, आदि हैं
4. इस नदी पर बने बांध महेश्वर बाँध, इंदिरा सागर बाँध, .

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चम्बल नदी का धार्मिक महत्व, मध्य प्रदेश, राजस्थान के लोगो के लिए जीवनदायिनी नदी हैं। देखते हैं कैसे।

चंबल नदी मध्य भारत में यमुना नदी की सहायक नदी है। यह नदी जानापाव पर्वत बाचू पाईट महू से निकलती है। इसका प्राचीन नाम चरमवाती है। इसकी सहायक नदिया शिप्रा, सिंध, काली सिन्ध, ओर कुनू नदी है। यह नदी भारत में उत्तर तथा उत्तर-मध्य भाग में राजस्थान के कोटा तथा धौलपुर, मध्य प्रदेश के धार, उज्जैन, रतलाम, मन्दसौर, भिंड, मुरैना आदि जिलो से होकर बहती है। यह नदी दक्षिण मुड़ कर उत्तर प्रदेश राज्य में यमुना में शामिल होने के पहले राजस्थान और मध्य प्रदेश के बीच सीमा बनाती है। इस नदी पर चार जल विधुत परियोजना -गांधी सागर, राणा सागर, जवाहर सागर और कोटा बैराज (कोटा)- चल रही है। प्रसिद्ध चूलीय जल प्रपातचंबल नदी (कोटा) मे है। कुल लंबाई 135।
यह एक बारहमासी नदी है। इसका उद्गम स्थल जानापाव की पहाडी (मध्य प्रदेश) है।यह दक्षिण में महू शहर के, इंदौर के पास, विंध्य रेंज में मध्य प्रदेश में दक्षिण ढलान से होकर गुजरती है। चंबल और उसकी सहायक नदियां उत्तर पश्चिमी मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र के नाले, जबकि इसकी सहायक नदी, बनास, जो अरावली पर्वतों से शुरू होती है इसमें मिल जाती है। चंबल, कावेरी, यमुना, सिन्धु, पहुज भरेह के पास पचनदा में, उत्तर प्रदेश राज्य में भिंड और इटावा जिले की सीमा पर शामिल पांच नदियों के संगम समाप्त होता है।

चंबल के अपवाह क्षेत्र में चितौड, कोटा, बूंदी, सवाई माधौपुर, करौली, धौलपुर इत्यादि इलाके शामिल हैं। तथा सवाई माधोपुर, करौली व धौलपुर से गुजरती हुई राजस्थान व मध्यप्रदेश की सीमा बनाती हुए चलती है जो कि 252 किलोमीटर की है।

बनास नदी, क्षिप्रा नदी,मेज , बामनी , सीप काली सिंध, पार्वती, छोटी कालीसिंध, कुनो, ब्राह्मणी, परवन नदी इत्यादि चम्बल की सहायक नदियाँ हैं।

महाभारत के अनुसार राजा रंतिदेव के यज्ञों में जो आर्द्र चर्म राशि इकट्ठा हो गई थी उसी से यह नदी उदभुत हुई थी-
महानदी चर्मराशेरूत्क्लेदात् ससृजेयतःततश्चर्मण्वतीत्येवं विख्याता स महानदी।
कालिदास ने भी मेघदूत-पूर्वमेघ 47 में चर्मण्वती नदी को रंतिदेव की कीर्ति का मूर्त स्वरूप कहा गया है-

आराध्यैनं शदवनभवं देवमुल्लघिताध्वा,
सिद्धद्वन्द्वैर्जलकण भयाद्वीणिभिदैत्त मार्गः।
व्यालम्बेथास्सुरभितनयालंभजां मानयिष्यन्,
स्रोतो मूत्यभुवि परिणतां रंतिदेवस्य कीर्तिः।
इन उल्लेखों से यह जान पड़ता है कि रंतिदेव ने चर्मवती के तट पर अनेक यज्ञ किए थे। महाभारत में भी चर्मवती का उल्लेख है -
ततश्चर्मणवती कूले जंभकस्यात्मजं नृपं ददर्श वासुदेवेन शेषितं पूर्ववैरिणा
अर्थात इसके पश्चात सहदेव ने (दक्षिण दिशा की विजय यात्रा के प्रसंग में) चर्मण्वती के तट पर जंभक के पुत्र को देखा जिसे उसके पूर्व शत्रु वासुदेव ने जीवित छोड़ दिया था। सहदेव इसे युद्ध में हराकर दक्षिण की ओर अग्रसर हुए थे।
चर्मण्वती नदी को वन पर्व के तीर्थ यात्रा अनु पर्व में पुण्य नदी माना गया है -
चर्मण्वती समासाद्य नियतों नियताशनः रंतिदेवाभ्यनुज्ञातमग्निष्टोमफलं लभेत्।
श्रीमदभागवत में चर्मवती का नर्मदा के साथ उल्लेख है-

सुरसानर्मदा चर्मण्वती सिंधुरंधः
इस नदी का उदगम जनपव की पहाड़ियों से हुआ है। यहीं से गंभीरा नदी भी निकलती है। यह यमुना की सहायक नदी है। महाभारत में अश्वनदी का चर्मण्वती में, चर्मण्वती का यमुना में और यमुना का गंगा नदी में मिलने का उल्लेख है –
मंजूषात्वश्वनद्याः सा ययौ चर्मण्वती नदीम्,
चर्मण्वत्याश्व यमुना ततो गंगा जगामह।
गंगायाः सूतविषये चंपामनुययौपुरीम्।

उत्तरप्रदेश में इटावा के बिठौली गांव में स्थित तातरपुर में यमुना, चम्बल, कावेरी, सिंधु और पहुज नदियों का संगम होता है। इस संगम को पचनदा अथवा पचनद भी कहा जाता है। यहां के प्राचीन मन्दिरों में लगे पत्थर आज भी दुनिया के इस आश्चर्य और भारत की श्रेष्ठ धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत का बखान करते नजर आते हैं।

अलकनन्दा नदी • इंद्रावती नदी • कालिंदी नदी • काली नदी • कावेरी नदी • कृष्णा नदी • केन नदी • कोशी नदी • क्षिप्रा नदी • खड़कई नदी • गंगा नदी • गंडक नदी • गोदावरी नदी • गोमती नदी • घाघरा नदी • चम्बल नदी • झेलम नदी • टोंस नदी • तवा नदी • चनाब नदी • ताप्ती नदी • ताम्रपर्णी नदी • तुंगभद्रा नदी • दामोदर नदी • नर्मदा नदी • पार्वती नदी • पुनपुन नदी • पेन्नार नदी • फल्गू नदी • बनास नदी • बराकर नदी • बागमती • बाणगंगा नदी • बेतवा नदी • बैगाई नदी • बैगुल नदी • ब्यास नदी • ब्रह्मपुत्र नदी • बकुलाही नदी • भागीरथी नदी • भीमा नदी • महानंदा नदी • महानदी • माही नदी • मूठा नदी • मुला नदी • मूसी नदी • यमुना नदी • रामगंगा नदी • रावी नदी • लखनदेई नदी • लाछुंग नदी • लूनी नदी • शारदा नदी • शिप्रा नदी • सतलुज नदी • सरस्वती नदी • साबरमती नदी • सिन्धु नदी • सुवर्णरेखा नदी • सोन नदी • हुगली नदी • टिस्टा नदी • सई नदी

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ताप्ती नदी के किनारे बसे भारत के प्रमुख शहरों की कहानियां, कुछ प्राचीन इतिहास और रोचक तथ्य। તાપ્તી ।

ताप्ती (संस्कृत : तापी, मराठी : तापी ; गुजराती : તાપ્તી) पश्चिमी भारत की प्रसिद्ध नदी है। यह मध्य प्रदेश राज्य के बैतूल जिले के मुलताई से निकलकर सतपुड़ा पर्वतप्रक्षेपों के मध्य से पश्चिम की ओर बहती हुई महाराष्ट्र के खानदेश के पठार एवं सूरत के मैदान को पार करती और अरब सागर में गिरती है। नदी का उद्गगम् स्थल मुल्ताई है।

ताप्ती (संस्कृत: तापी, मराठी: तापी; गुजराती: તાપ્તી) पश्चिमी भारत की प्रसिद्ध नदी है। यह मध्य प्रदेश राज्य के बैतूल जिले के मुलताई से निकलकर सतपुड़ा पर्वतप्रक्षेपों के मध्य से पश्चिम की ओर बहती हुई महाराष्ट्र के खानदेश के पठार एवं सूरत के मैदान को पार करती और अरब सागर में गिरती है। नदी का उद्गगम् स्थल मुल्ताई है। यह भारत की उन मुख्य नदियों में है जो पूर्व से पश्चिम की तरफ बहती हैं, अन्य दो हैं - नर्मदा नदी और माही नदी। यह नदी पूर्व से पश्चिम की ओर लगभग 740 किलोमीटर की दूरी तक बहती है और खम्बात की खाड़ी में जाकर मिलती है। सूरत बन्दरगाह इसी नदी के मुहाने पर स्थित है। इसकी प्रधान उपनदी का नाम पूर्णा है। इस नदी को सूर्यपुत्री भी कहा जाता है। समुद्र के समीप इसकी ३२ मील की लंबाई में ज्वार आता है, किंतु छोटे जहाज इसमें चल सकते हैं। पुर्तगालियों एवं अंग्रेजों के इतिहास में इसके मुहाने पर स्थित स्वाली बंदरगाह का बड़ा महत्व है। गाद जमने के कारण अब यह बंदरगाह उजाड़ हो गया है। .

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ताप्ती नदी
ताप्ती (संस्कृत: तापी, मराठी: तापी; गुजराती: તાપ્તી) पश्चिमी भारत की प्रसिद्ध नदी है। यह मध्य प्रदेश राज्य के बैतूल जिले के मुलताई से निकलकर सतपुड़ा पर्वतप्रक्षेपों के मध्य से पश्चिम की ओर बहती हुई महाराष्ट्र के खानदेश के पठार एवं सूरत के मैदान को पार करती और अरब सागर में गिरती है। नदी का उद्गगम् स्थल मुल्ताई है। यह भारत की उन मुख्य नदियों में है जो पूर्व से पश्चिम की तरफ बहती हैं, अन्य दो हैं - नर्मदा नदी और माही नदी। यह नदी पूर्व से पश्चिम की ओर लगभग 740 किलोमीटर की दूरी तक बहती है और खम्बात की खाड़ी में जाकर मिलती है। सूरत बन्दरगाह इसी नदी के मुहाने पर स्थित है। इसकी प्रधान उपनदी का नाम पूर्णा है। इस नदी को सूर्यपुत्री भी कहा जाता है। समुद्र के समीप इसकी ३२ मील की लंबाई में ज्वार आता है, किंतु छोटे जहाज इसमें चल सकते हैं। पुर्तगालियों एवं अंग्रेजों के इतिहास में इसके मुहाने पर स्थित स्वाली बंदरगाह का बड़ा महत्व है। गाद जमने के कारण अब यह बंदरगाह उजाड़ हो गया है। .

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ताप्ती नदी ke kinare base saher
ताप्ती नदी शहर
ताप्ती नदी लंबाई
मुलताई का इतिहास
ताप्ती नदी किस समुद्र में गिरती है
सूर्य पुत्री ताप्ती
तापी नदी महाराष्ट्र
तापी नदी का पुल
ताप्ती नदी कहाँ से निकली है

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अनदेखा सिक्किम (Sikkim) - हिंदी डाक्यूमेंट्री

अनदेखा सिक्किम (Sikkim) - हिंदी डाक्यूमेंट्री

सिक्किम का प्रारंभिक इतिहास 13 वीं शताब्दी से आरंभ होता है जब लेप्चा प्रमुख थेकोंग-थेक और तिब्बत के राजकुमार खे-भूमसा के बीच उत्तरी सिक्किम में काब लुंगत्सोक में भाईचारे के एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इसके बाद सन 1641 में तिब्बत के सम्मानित लामा संतों ने पश्चिमी सिक्किम के युकसाम प्रांत की ऐतिहासिक यात्रा की, जहां उन्होंने खे-हूमसा के छठी पीढ़ी के वंशज फुंत्सोग नामग्याल राजवंश का उदय हुआ। समय के बदलाव के साथ सिक्किम लोकतांत्रिक प्रक्रिया से गुजरा और 1975 में वह भारतीय संघ का अभिन्न अंग बन गया। गुरु पद्मसंभव ने अपने तिब्बत प्रवास के दौरान इस स्थान को आशीर्वाद दिया था। सिक्किम में सभी समुदायों के लोग आपसी सद्भवाव से रहते हैं। सिक्किम में भिन्न-भिन्न मतों से जुड़े लोग हैं और शायद यह भारतीय संघ में सांप्रदायिक सद्भाव और मानवीय संबंधों को बढ़ावा देने वाला सर्वाधिक शांति वाला राज्य है जिसकी भारत जैसे बहुसामाजिक व्यवस्था वाले देश में नितांत आवश्यकता भी है।

विश्व की तीसरी सबसे ऊंची चोटी, कंचनजंगा, जिसे सिक्किम की रक्षा देवी माना जाता है, इस राज्य पर अपनी मंत्रमुग्ध करने वाले प्राकृतिक सौंदर्य की छटा बिखेरती है। सिक्किम जैव विविधताओं से भरा दुनिया के 18 प्रमुख क्षेत्रों में एक है।
सिक्किम में मुख्य रूप से भूटिया, लेप्चा और नेपाली समुदायों के लोग रहते है। माघी संक्रांति, दुर्गापूजा, लक्ष्मीपूजा और चैत्र दसाई/राम नवमी, दसई, त्योहार, सोनम लोसूंग, नामसूंग, तेन्दोंग हलो रुम फाट (तेन्दोंग पर्वत की पूजा), लोसर (तिब्बतीय नव वर्ष) राज्य के प्रमुख त्योहार हैं। अन्य त्यौहारों में साकेवा (राय), सोनम लोचर (गुरुंग), बराहिमज़ोग (मागर) आदि शामिल हैं।

सिक्किम की अर्थव्यवस्था मूलत: कृषि प्रधान है। राज्य की 64 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या जीवनयापन के लिए कृषि पर निर्भर है। सिक्किम में कृषि योग्य भूमि लगभग 1,09,000 हेक्टेयर है जो कुल भौगोलिक क्षेत्र का 15.36 प्रतिशत है।

मक्का, चावल, गेहूं, आलू, बड़ी इलायची, अदरक और संतरा यहां की प्रमुख फसलें हैं। सिक्किम देश में बड़ी इलायची का सबसे अधिक उत्पादन करने वाला राज्य है और इसके अधिकांश भू-भाग में इलायची का उत्पादन होता है। अदरक, आलू, संतरा तथा गैर-मौसमी सब्जियां यहां की अन्य नकदी फसलें हैं।

सड़कें: गंगटोक सड़क मार्ग से दार्जिलिंग, कलिमपोंग, सिलीगुड़ी तथा सिक्किम के सभी जिला मुख्यालयों से जुड़ा है। 41 कि.मी. राष्ट्रीय राजमार्ग सहित, राज्य में सड़कों की कुल लंबाई 2,933.49 कि.मी. है। इसमें से 873.40 कि.मी. सड़कें सीमा सड़क संगठन ने बनाई हैं।

रेलवे और उड्डयन: राज्य के निकटवर्ती रेलवे स्टेशन सिलीगुड़ी (113 कि.मी.) और न्यू जलपाईगुड़ी (125 कि.मी.) हैं जहां से कोलकाता, दिल्ली, गुवाहाटी, लखनऊ तथा देश के अन्य महत्वपूर्ण शहरों के लिए आया-जाया जा सकता है।

सिक्किम में कोई हवाई अड्डा नहीं है। गंगटोक और बागडोगरा के बीच हेलीकॉप्टर सेवा उपलब्ध कराई गई है।

सिक्किम अपने हरे-भरे पौधों, जंगलों, दर्शनीय घाटियों और पर्वतमालाओं और अव्वल सांस्कृतिक धरोहर के लिए प्रसिद्ध है और यहां के शांतिप्रिय लोगों की वजह से यह प्रदेश पर्यटकों के लिए सुरक्षित स्वर्ग के समान है। राज्य सरकार पर्यावरण से दोस्ती पूर्ण पर्यटन तथा तीर्थ पर्यटन को बढ़ावा दे रही है और वे तमाम सुविधाएं प्रदान कर रही है जिससे कि यहां आने वाले लोग सिक्किम की जीवन-शैली और धरोहर के आनंद का अनुभव कर सकें। पर्यटन उद्योग की संभावनाओं को स्वीकारते हुए राज्य सरकार दक्षिण सिक्किम में चैमचेय गांव में हिमालयन सेंटर फॉर एडवेंचर दूरिज्म की स्थापना कर रही है।

सिक्किम एक पहाड़ी इलाका है जो हिमालय पर्वत इलाके में बसा है। सिक्किम राज्य में कई पहाड़ी जगह हैं जिनकी उंचाई 280 मीटर से 8,585 मीटर तक है। राज्य का सबसे उंचा बिंदु माउंट कंचनजंगा है, जिसे पृथ्वी की तीसरी सबसे ऊँची चोटी के रूप में भी जाना जाता है

यदि आप कुदरत की अनछुई खूबसूरती से रूबरू होना चाहते हैं तो सिक्किम आपका इंतजार कर रहा है। हिमालय की तलहटी में बसा यह छोटा सा राज्य. हैं

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ड्रेगन फ्रूट की खेती केसे करे | Cultivation of Dragon Fruit - मुनाफा, न ज्यादा पानी देना होता है |

किसान अब कर रहे इस अमेरिकन फल की खेती, एक बार लगाने पर 25 सालों तक दे सकता है मुनाफा, न ज्यादा पानी देना होता है न बहुत ज्यादा रख-रखाव की जरूरत

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सेहत के लिए फायदेमंद है, इसलिए इस फल की रहती है मार्केट में डिमांड, 400 रु - 700 रु किलो तक बिकता है

ड्रैगन फ्रूट जिसे पिताया फल नाम से भी जानते हैं, इसे ज्यादातर मेक्सिको और सेंट्रल एशिया में खाया जाता है। यह फल खाने में काफी कुछ तरबूज की तरह मीठा होता है। देखने में काफी आकर्षक लगने वाले इस फल में बाहर की ओर स्पाइक्स होते हैं अंदर की तरफ सफेद होता है और इसमें काले रंग के बीज होते हैं। ड्रैगन फ्रूट्स को सुपरफ्रूट माना जाता है क्योंकि इसके कई हेल्थ बेनिफिट्स होते हैं। स्टडीज की मानें तो यह डायबीटीज और हार्ट डिजीज के खतरे को भी कम करता है।

ड्रैगन फ्रूट में ऐंटी-ऑक्सिडेंट्स, फाइबर्स और विटमिन सी पाया जाता है। यह कई गंभीर बीमारियों से रिकवरी में मदद करता है। स्टडीज की मानें तो विटमिन सी की पर्याप्त मात्रा लेने से कैंसर का खतरा कम रहता है। ड्रैगन फ्रूट में विटमिन सी काफी मात्रा में पाया जाता है। सप्लिमेंट्स लेने के बजाय बेहतर होगा विटमिन सी फल के रूप में लें जिसका ज्यादा फायदा होगा।

ड्रैगन फ्रूट में बीटा कैरोटीन और लायकोपीन भी पाया जाता है। कैरोटिनॉइड रिच फूड लेने से भी कैंसर और हार्ट डिजीज का खतरा कम रहता है। खाने में फाइबर्स का होना बहुत जरूरी है और ड्रैगन फ्रूट से आपको पर्याप्त मात्रा में फाइबर्स मिलते हैं। अगर आप होल ग्रेन वगैरह नहीं पसंद करते तो ड्रैगन फ्रूट खा सकते हैं।

ड्रैगन फ्रूट आपका इम्यून सिस्टम मजबूत बनाता है साथ ही आपका पेट भी ठीक रखता है। अगर आपके शरीर में आयरन की कमी है तो भी ड्रैगन फ्रूट आपके लिए बेस्ट है।

उत्तर प्रदेश में अब किसान ऐसे अमेरिकन फल की खेती कर रहे हैं, जिसकी एक बार की फसल 25 सालों तक मुनाफा देती है। इसमें पानी भी काफी कम लगता है। वीडियो में देखिए पूरी डिटेल।

अगर किसान भाइयों आपका कोई सवाल है तो कमेंट करें अगर आप हमसे संपर्क करना चाहते हैं तो हमें इस पर मेल करें ।

Email : tajagroproducts@gmail.com

धन्यवाद् !

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भारत में आज भी सही सलामत है विश्व का सबसे प्राचीन और आधुनिक डैम !

भारत में आज भी सही सलामत है विश्व का सबसे प्राचीन और आधुनिक डैम !

विश्व का सबसे प्राचीन बांध भारत में बना था.

…और इसे बनाने वाले भी भारतीय ही थे. सुनने में आपको थोड़ा अटपटा जरूर लग सकता है लेकिन यह ऐतिहासिक सत्य है.

आज से करीब 2 हजार वर्ष पूर्व भारत में कावेरी नदी पर कल्लनई बांध का निमार्ण कराया गया था, जो आज भी न केवल सही सलामत है बल्कि सिंचाई का एक बहुत बड़ा साधन भी है.

भारत के इस गौरवशाली इतिहास को पहले अंग्रेज और बाद में वामपंथी इतिहासकारों ने जानबूझकर लोगों से इस तथ्य को छुपाया.

दक्षिण भारत में कावेरी नदी पर बना यह कल्लनई बांध वर्तमान में तमिलनाडू के तिरूचिरापल्ली जिले में है. इसका निमार्ण चोल राजवंश के शासन काल में हुआ था.राज्य में पड़ने वाले सूखे और बाढ़ से निपटने के लिए कावेरी नदी को डायवर्ट कर बनाया गया यह बांध प्राचीन भारतीयों की इंजीनियरिंग का उत्तम उदाहरण है.

कल्लनई बांध को चोल शासक करिकाल ने बनवाया था.यह बांध करीब एक हजार फीट लंबा और 60 फीट चौड़ा है.

आपको जानकर हैरानी होगी कि इस बांध में जिस तकनीक का उपयोग किया गया है वह वर्तमान विश्व की आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक है, जिसकी भारतीयों को आज से करीब 2 हजार वर्ष पहले ही जानकारी थी.

कावेरी नदी की जलधारा बहुत तीव्र गति से बहती है, जिससे बरसात के मौसम में यह डेल्टाई क्षेत्र में भयंकर बाढ़ से तबाही मचाती है.

पानी की तेज धार के कारण इस नदी पर किसी निर्माण या बांध का टिक पाना बहुत ही मुश्किल काम था. उस समय के भारतीय वैज्ञानिकों ने इस चुनौती को स्वीकार किया और और नदी की तेज धारा पर बांध बना दिया जो 2 हजार वर्ष बीत जाने के बाद आज भी ज्यों का त्यों खड़ा है.

इस बांध को आप कभी देखेंगे तो पाएंगे यह जिग जैग आकार का है. यह जिग जैग आकार का इस लिए बनाया गया था ताकि पानी के तेज बहाव से बांध की दीवारों पर पड़ने वाली फोर्स को डायवर्ट कर उस पर दवाब को कम कर सके. देश ही नहीं दुनिया में बनने वाले सभी आधुनिक बांधों के लिए यह बांध आज प्रेरणा का स्रोत है.

यह कल्लनई बांध तमिलनाडू में सिंचाई का महत्वपूर्ण स्रोत है.

आज भी इससे करीब 10 लाख एकड़ जमीन की सिंचाई होती है.

यदि आप भारत की इस अमूल्य तकनीकी विरासत कल्लनई बांध के दर्शन करना चाहते हैं तो आपको तमिलनाडू के तिरूचिरापल्ली जिले में आना होगा. मुख्यालय तिरूचिरापल्ली से इसकी दूरी महज 19 किलोमीटर है.

G K HINDI /भारत का सबसे पुराना बाँध -- कल्लनई बांध (ग्रैंड एनीकट बाँध) , कावेरी नदी ,तमिलनाडु

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