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श्रीनगर की प्रसिद्ध डल झील परिचय कुछ रोचक तथ्य इतिहास।(देखिये कैसे जीते हैं लोग)। समस्या और संघर्ष।

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श्रीनगर की प्रसिद्ध डल झील परिचय कुछ रोचक तथ्य इतिहास।(देखिये कैसे जीते हैं लोग)। समस्या और संघर्ष।

श्रीनगर की प्रसिद्ध डल झील परिचय कुछ रोचक तथ्य इतिहास ।(देखिये कैसे जीते हैं लोग) । समस्या और संघर्ष ।

डल झील परिचय !!
• डल झील भौगोलिक दृश्य !!
• डल झील के कुछ रोचक तथ्य !!
• डल झील पहुंचने का मार्ग दर्शन !!
डल झील परिचय !!
दोस्तो नमस्कार , आज की आलेख में हम आपको डल झील से जुड़े इतिहास के पन्नों से अवगत करवाएंगे । डल झील भारत के श्रीनगर और कश्मीर इलाके में प्रसिद्ध झील है। इस झील का क्षेत्रफल तकरीबन 26 वर्ग किलोमीटर है अर्थात यह झील 26 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैली हुई है । सबसे आकर्षित करने वाला नजारा तो यह है कि यह झील तीन पहाड़ियों के संगम के ठीक बीच में बनी हुई है | ऐसे आकार के हिसाब से देखा जाए तो जम्मू कश्मीर की यह दूसरी सबसे बड़ी झील है इसके अंदर कश्मीर घाटी की बहुत सी झीले आकर सम्मिलित हो जाती है। डल झील के अंदर 4 प्रसिद्ध जलाशय है जिसमें से पहला गगरीबल, दूसरा लोकुट डल , तीसरा नागिन , और चौथा बोड डल है |
डल झील भौगोलिक दृश्य !!
लोकुट डल झील की बात करें तो यह झील रुपलंक द्वीप के चारों ओर स्थित है । दुनिया की सबसे सुंदर झीलो इसको गिना जाता है। इसके साथ साथ इसकी खूबसूरती को चार चांद तब लग जाते हैं , जब नजदीक में बने हुए मंगल वाटिका से डल झील का सुंदर नजारा देखने को मिलता है। जम्मू कश्मीर के असली आकर्षण का केंद्र तो डल झील की है । यहां पर आने वाले लोग हाउसबोट का नजारा लेना बिल्कुल नहीं भूलते । आने वाले पर्यटक डल झील का आकर्षण और सौंदर्य हाउसबोट के माध्यम से सवारी करके लेते हैं । अगर आप दिल्ली जेल में घूमने जाए तो इसके साथ साथ आप नेहरू पार्क, कानुटुर खाना, चारचीनारी आदि द्वीपों तथा हज़रत बल की सैर करना बिल्कुल ना भूलें ।
डल झील के कुछ रोचक तथ्य !!
कश्मीर के बारे में जो सुनने को मिलता है कश्मीर उससे भी कहीं ज्यादा खूबसूरत है | किताबों में लिखा गया है कि कश्मीर धरती का स्वर्ग है| पर अगर आप यहां पर जाएंगे तो आपको यह जगह स्वर्ग से भी बढ़कर लगेगी। दिल्ली झील को श्रीनगर का गहना और कश्मीर के मुकुट के नाम से भी जानते हैं| डल झील यहां की दूसरी लोकप्रिय झील है और इससे पहले वाली झील का नाम दिल्ली झील है । डल झील की सबसे ज्यादा खास बात तो यह है कि यहां पर जलाशयों के बीच में छोटे-छोटे द्वीप बने हुए हैं
डल झील का सबसे ज्यादा आकर्षण करने वाला नजारा हाउसबोट का होता है। जम्मू कश्मीर की लोकल भाषा के अंदर हाउसबोट को शिकारा भी कहा जाता है। यहां पर शिकारे के माध्यम से आप यहां के प्रमुख तीर्थ स्थलों की यात्रा आरामदायक तथा संतुष्ट होकर कर सकते हैं | यहां पर सबसे मुख्य तौर पर होने वाला काम झील में से मछलियों को पकड़ना है। अगर आप यहां पर कोई शॉपिंग करना चाहते हैं तो आपको शिकारे से शॉपिंग करनी पड़ेगी । क्योंकि यहां पर सभी दुकानें शिकारे में बनी हुई होती हैं | आप यहां पर शॉपिंग के अलावा एक रोमांचित कर देने वाले अनुभव को भी महसूस करेंगे।
डल झील पहुंचने का मार्ग दर्शन !!
अगर आप जम्मू कश्मीर में स्थिति डल झील पर घूमने जाना चाहते हैं तो आपको सबसे पहले श्रीनगर जिले में जाना पड़ेगा। वहां से तकरीबन 25 किलोमीटर दूरी पर स्थित बड़गांव जिले में एयरपोर्ट बना हुआ है वहां पर जाना होगा । इसके अलावा अपने सदीक में बनी रेल सेवा जम्मू मैं भी जा सकते हैं और वहां का जो नेशनल हाईवे NH01 कश्मीर की घाटियों को देश के अतिरिक्त अन्य भागों से भी जोड़ता है तथा आप इन्हें पहाड़ी इलाकों के माध्यम से यात्रा करके तकरीबन 10 से 12 घंटे में डल झील पहुंच सकते है
हमें आशा है कि हमारे द्वारा दी गई जानकारी से आप संतुष्ट होंगे । अगर आप हमारे लिए गए आलेख में कोई गलती पाते हैं। तो हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं ताकि हम आगे आने वाले आलेख के अंदर आपको ओर अच्छी जानकारी से अवगत करवा सकें।
Jammu Kashmir Massive Cleaning Drive Begins At Dal Lake - एक बार फिर चमकेगी डल झील, खूबसूरती के लिए उठाया जा रहा है ये कदम | डल झील खो रही अपना आकर्षण, करोड़ों खर्च करने के बाद भी हालात बदतर | जम्मू-कश्मीर सरकार ने श्रीनगर की प्रसिद्ध डल झील और उसके आसपास के क्षेत्रों को पारिस्थितकी के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्र (इको जोन) घोषित करने के लिए एक दस सदस्यीय समिति बनाई है।
नवंबर में जम्मू कश्मीर प्रशासन ने झील के सिकुड़ते आकार पर चिंताओं के बाद डल झील और उसके आसपास के क्षेत्रों को पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने के लिए एक 10 सदस्यीय समिति का गठन किया था।अधिकारियों की समिति ने बुधवार को झील और उसके आसपास के क्षेत्र को ईएसजेड घोषित करने के लिए मसौदा अधिसूचना की समीक्षा की।

ड्रेजिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के 2017 के आकलन के अनुसार प्रदूषण और अतिक्रमण के परिणामस्वरूप डल झील 22 वर्ग किलोमीटर के अपने मूल क्षेत्र से सिकुड़कर लगभग 10 वर्ग किलोमीटर हो गई है। डीसीआई के आकलन में यह भी पाया गया है कि अनुपचारित सीवेज और झील में बहने वाले ठोस अपशिष्ट पदार्थों, जल चैनलों और अतिक्रमणों के अतिक्रमण से तीव्र प्रदूषण ने झील में परिसंचरण और प्रवाह को कम कर दिया है, जिससे जल जलकुंभी का व्यापक विकास हुआ है।

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श्रीनगर के डल झील में शिकारे का आनंद | DAL LAKE SRINAGAR | हाउसबोट | KASHMIR TRIP | SHIKARA RIDE |

DAL LAKE डल झील श्रीनगर (SRINAGAR) का गहना मानी जाती है। 18 वर्ग किलोमीटर में फैली यह झील पृथ्वी पर स्वर्ग की तरह है। यह सुंदर हरे भरे पहाड़ों के बीच में स्थित है। शिकारा (SHIKARA) की सवारी, हाउस बोट और झील के बाजार जैसी सुविधाएं इस जगह को पर्यटकों के बीच पसंदीदा बनाती हैं। श्रीनगर हमेशा गर्मियों में घूमने के लिए एक सुखद स्थान रहा है। डल झील पर हाउस बोट(HOUSEBOAT) का आनंद पर्यटक ले सकते हैं।
बता दें कि डल झील पर हाउस बोट की अवधारणा अंग्रेजों के दिमाग के उपज थी, जिसने पर्यटन को बढ़ावा दिया। जब कभी भी आप श्रीनगर की यात्रा करने की योजना बनाए तो अपनी लिस्ट में डल झील को सबसे पहले प्राथमिकता दें। क्योंकि यहां सबसे सुंदर और मन को लुभाने वाली अगर कोई झील है, तो वह है डल झील। आइए हम इस VLOG के माध्यम से आपको डल झील श्रीनगर की यात्रा कराते है

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BEAUTIFUL KASHMIR! Dal Lake!

One of the most beautiful places I've visited is Dal Lake in Srinagar, Kashmir.

It's a stunning location famous for it's houseboats and colourful ashikaras to travel on to the various floating vegetable markets and small islands.

*Filmed before August*

#kashmir #kashmirvlog

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चंबल का बीहड़ कैसे बने उपजाऊ,लोगो का संघर्ष और जीवन (देखिये कैसे जीते हैं लोग) ।समस्या।

चंबल की घाटियां कभी डाकुओं के गिरोहों से त्रस्त थीं। डकैतों के समर्पण के गांधीवादी तरीकों के सफल प्रयासों के बाद चंबल क्षेत्र को डाकुओं के आतंक से तो राहत मिली, पर बीहड़ों की समस्या जस की तस बनी रही। नदियों द्वारा भूमि कटान से वहां बहुत-सी कृषि व चरागाह की भूमि बीहड़ों में परिवर्तित होती रही है, जिससे आम लोगों की आजीविका का संकट बढ़ता गया। मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में ही चंबल, क्वारी, आसन, सिंध जैसी नदियों के बहाव में भूमि के कटाव की प्रवृत्ति अधिक है। इससे न केवल ऊपर की उपजाऊ मिट्टी का कटाव होता है, बल्कि बीहड़ भी बनते चले जाते हैं। इसका सामना करने के लिए भी ‘महात्मा गांधी सेवा आश्रम, जौरा’ ने प्रयास किए हैं। वहां के प्रमुख प्रेरणा स्रोत विख्यात गांधीवादी कार्यकर्ता एसएन सुब्बराव ‘भाई जी’ रहे हैं, जिन्होंने ‘राष्ट्रीय सेवा योजना’ (एनएसएस) के कैंप आयोजित कर सैकड़ों युवाओं का श्रमदान बीहड़ों को समतल करने, .

अब इस काम को फिर से बड़े पैमाने पर आरंभ करने का समय आ गया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि क्षेत्र के युवाओं में बेरोजगारी से बढ़ती बेचैनी कम करने के लिए भी इस कार्य का उपयोग हो सकता है। बीहड़ प्रभावित भूमि को सुधार कर इसे युवाओं को रासायनिक खादों, कीटनाशकों और दवाओं से मुक्त जैविक या पर्यावरण की रक्षा करने वाली खेती के लिए दिया जा सकता है। वहां की एक अन्य समस्या यह है कि खेती में रासायनिक खाद व कीटनाशकों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है।
भारत में पानी से मृदा का कटाव, भूमि ह्रास के सबसे महत्त्वपूर्ण कारणों में से एक है। केवल भारत में लगभग 3.61 करोड़ हेक्टेयर भूमि पानी द्वारा कटाव से प्रभावित है। इस श्रेणी में सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश हैं। मध्य भारत में चम्बल घाटी देश के सबसे प्रभावित क्षेत्रों में से है। चम्बल मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में कटाव से प्रभावित क्षेत्र है, जिसे आमतौर पर घाटी के रूप में जाना जाता है। चम्बल यमुना नदी की एक महत्त्वपूर्ण सहायक नदी चम्बल नदी के किनारे स्थित है।

स्थानीय रूप से बीहड़ के नाम से प्रचलित चम्बल घाटी भारत का सबसे निम्नीकृत भूखण्ड है। चम्बल के बीहड़ में बड़े नाले और अत्यधिक विच्छेदित घाटी शामिल है। यह क्षेत्र अपने कमतर विकास और उच्च अपराध दर के लिये जाना जाता है।

चम्बल नदी घाटी का लगभग 4,800 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र इस बीहड़ के अन्तर्गत आता है जिसका विकास मुख्य रूप से चम्बल नदी के दोनों किनारों पर हुआ है, जो इस इलाके की जीवनरेखा है। चम्बल के किनारे पर घाटी का गठन काफी सघन है जिसका 5 से 6 किमी का क्षेत्र गहरे नालों के जा

50 हजार बीघा बीहड़ में अब हो रही है खेती
-मध्यप्रदेश में महू, उज्जैन, भिंड, मुरैना, श्योपुर से गुजरती है चंबल नदी।
-चंबल संभाग के करीब 50 हजार बीघा बीहड़ में अब हो रही है खेती।
-सरसों, बाजरा, तिल, अरहर और सब्जियों की खेती करते हैं किसान।
वैज्ञानिकों ने यहां खेती की संभावनाएं तलाशी
खेती की संभावना तलाशने के लिए मंगलवार को कृषि वैज्ञानिकों का एक दल ग्राम पावई क्षेत्र के बीहडों में पहुंचा। वैज्ञानिकों ने यहां खेती की संभावनाएं तलाशी। साथ ही, कहा कि बीहड़ की जमीन को उपजाऊ बनाया जा सकता है। यहां खेती की अपार संभावनाएं हैं। वैज्ञानिकों ने बीहड़ की भूमि में होने वाली फसल नींबू, बेर, संतरा, मौसम्मी, पपीता आदि की खेती का भी अध्ययन किया। उन्होंने कृषि वन, उद्यानिकी, पशु पालन के लिए किए जाने वाले प्रयोगों का आकलन किया। दल में जर्मनी के डाॅ ऐलरिच, स्विटजरलैंड के वैज्ञानिक डाॅ. एसके गुप्ता शामिल थे।
केंद्र 900 व प्रदेश 200 करोड़ देगा
इस दौरान सांसद डाॅ. भागीरथ प्रसाद ने कहा कि बीहड़ों के सुदृढ़ीकरण और फसलों की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए 1100 करोड़ रुपए स्वीकृत किए जाएंगे। इसमें 200 करोड़ रुपए मप्र सरकार और 900 करोड़ रुपए केन्द्र सरकार द्वारा वर्ल्ड बैंक के सहयोग से देगी।

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मध्य प्रदेश के श्योपुर और मुरैना के बीहड़ों को लैंडस्केप कन्जर्वेशन के मॉडल के तौर पर देखा जाता है। अब केंद्र सरकार के ग्रीन अग्रीकल्चर प्रॉजेक्ट के तहत इस इलाके को विकसित किया जाएगा।
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हिमाचल के एक ऐसा ही सुंदर जिला है लाहौल स्पीति।(देखिये कैसे जीते हैं लोग) । समस्या और संघर्ष।

हिमाचल प्रदेश का एक सुदूर जिला है, जो लाहौल और सपीति घाटियों से मिलकर बना है। इस क्षेत्र को बर्फीला रेगिस्तान भी कहा जाता है। साहसिक पर्यटन के लिए यह क्षेत्र विस्व भर में प्रसिद्ध है। जिले का मुख्यालय केलांग है। हिमाचल प्रदेश के दो पूर्व जिलों लाहौल और स्पीति के विलयोपरांत, अब लाहौल और स्पीति एक जिला है। विलय के पूर्व लाहौल का मुख्यालय करदंग और स्पीति का मुख्यालय दनकर था। मनु को इस क्षेत्र का प्राचीन शक्षक बताया गया है|

लाहौल-स्पीति की खूबसूरत घाटी को पालने पोसने का काम करती है स्पीति नदी जो हिमालय के कुनजुम रेंज से निकलती है और लाहौल और स्पीति को 2 हिस्सों में बांटती है। चूंकि हिमाचल प्रदेश का यह हिस्सा ठंडे रेगिस्तान जैसा है और यहां बारिश न के बराबर होती है लिहाजा इस नदी को बारिश का पानी बिलकुल नहीं मिलता है और इस नदी का पानी ग्लेशियर से पिघलने वाले पानी पर ही निर्भर है। इस इलाके में ज्यादातर इंसानी बसावट स्पीति नदी के किनारे ही स्थित है।

लाहौल-स्पीति एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है, इसलिए यहां अलग-अलग प्रकार के खानपान का लुत्फ ले सकते हैं। स्पीति का खानपान व रहन-सहन लद्दाख व तिब्बत से मिलता-जुलता है। अधिकांश रेस्तरांओं में भारतीय भोजन दाल-चावल व रोटी-सब्जी भी मिलती है। स्पीति घाटी का स्कयू, फैमर, शूनाली पर्यटकों में काफी लोकप्रिय है। ये थुपका व मोमोज की तर्ज पर ही बनाए जाते हैं। चूंकि ये स्थानीय हैं, इसलिए स्वाद में अलग होते हैं। यदि आप मांसाहारी व्यंजनों के शौकीन हैं, तो इस लिहाज से यह स्थान आपको खासा पसंद आएगा। दरअसल, बर्फीला क्षेत्र होने के कारण मांसाहारी भोजन की अधिकता है, जो तिब्बती अंदाज में ही तैयार किए जाते हैं। यहां आपको पारंपरिक व्यंजनों का आनंद लेना हो तो यहां खुले रेस्तरां का रुख करना चाहिए। काजा में खुले रेस्तरां खूब हैं।
मक्खन वाली चाय
याक के दूध की क्रीम से बनने वाली यहां की मक्खन वाली चाय जरूर चखें। इसका फ्लेवर बिलकुल ही अलग होता है। ये आमतौर में रेस्टोरेंट्स में नहीं मिलती पर यहां घरेलू खाने का अहम हिस्सा होती है। इसका रंग गुलाबी और स्वाद थोड़ा सा नमकीन होता है।
हिमाचल प्रदेश के लाहौल स्पीति और चंबा जिलों में कुछ स्थानों पर मौसम की पहली बर्फबारी ने मौसम विज्ञानियों को चौंका दिया है। मौसम विज्ञान विभाग ने सोमवार को यह जानकारी दी। अगस्त माह में आमतौर पर इन क्षेत्रों में बर्फबारी नहीं होती है।
जिले के एक अधिकारी ने बताया कि ताजा बर्फबारी के कारण चंबा से पंगी जाने वाली सड़क साच पास के पास बाधित हो गयी है। इस बीच, मौसम विज्ञान विभाग ने अगले 24 घंटों में राज्य के कुछ हिस्सों में बारिश जारी रहने का अनुमान व्यक्त किया है। शिमला मौसम केंद्र के निदेशक मनमोहन सिंह ने बताया कि अगले 24 घंटों में राज्य के अधिकतर स्थानों पर हल्की से मध्यम दर्जे की बारिश हो सकती है, वहीं दूर दराज के क्षेत्रों में तेज बारिश के आसार हैं। कई स्थानों पर भूस्खलन ने पानी का बहाव झरने तक जाना रोक दिया है और इससे उप मंडल के खादेतार गांव में एक बड़ी कृत्रिम झील निर्मित हो गई है। अधिकारियों ने बताया कि कांगड़ा जिले के त्रिन्दी, दानी, मिरका, लदोर, थाना, हिंदोरघाट, लेत्री और जसूर गांव के लोगों घरों को खाली करने को कहा गया है।
मुख्यालय: केलांग
भाषाएँ: भोटी,लहौली और हिन्दी
घाटियाँ -चंद्रा और भगा
चिनाब नदी लाहौल के बरलाचा से निकलती है
रोहतांग कर अर्थ है : लाशों का ढेर
लाहौल में तीन घाटियाँ है
चंद्रा घाटी, भागा घाटी और चंद्रभागा घाटी
चंद्रा घाटी को रंगोली भी कहा जाता है।
कोकसर इस घाटी का पहला गाँव है।
भागा घाटी को गारा कहा जाता है।
चंद्रभागा घाटी को पट्टन घाटी कहा जाता है|

स्पीति में पिन घाटी है।
स्पीति घाटी स्पीति नदी से बनती है।
किब्बर गाँव विश्व का सबसे ऊँचा गाँव है।
चंद्रा , भागा , स्पीति और पिन लाहौल की प्रमुख नदियाँ है।
लाहौल और भंगाल के बीच भंगाल दर्रा है।
लाहौल और जास्कर के बीच शिंगडकोन दर्रा है।
लाहौल और स्पीति को कुंजुम दर्रा जोड़ता है।
लाहौल को लद्दाख से बरलाचा दर्रा जोड़ता है।

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राज्य के कुल 12 जिलों में से 11 भारी बारिश की चपेट में हैं। भूस्खलन और सड़क बहने से प्रदेशभर में 9 नेशनल हाईवे समेत 877 सड़कें बंद हो गईं। राज्य में रविवार को 102.5 मिमी बारिश हुई। यह एक दिन में होने वाली औसत बारिश से 1065% ज्यादा है। रविवार को शिमला में सतलज नदी पर बना पुल बह गया।

राजस्थान बढ़ रहा भयानक भूजल संकट की ओर, खत्म हो सकता है पानी (देखिये कैसे जीते हैं लोग)।अकाल,सूखा।

झीलों के क्षेत्र के नाम प्रसिद्ध और खुद पीएचईडी मंत्री किरण माहेश्वरी के उदयपुर संभाग के गांव प्रदेश में सबसे ज्यादा प्यासे हैं। मंत्री का विधानसभा क्षेत्र राजसमंद कम्पलीट डार्क जोन घोषित हो चुका है, जबकि जहां उनका निवास स्थान है उस गृह जिले उदयपुर में 2498 गांव सूखे और जल संकट से जूझ रहे हैं। - संभाग के बांसवाड़ा के 1154 गांव, राजसमंद के 1063, डूंगरपुर के 988, प्रतापगढ़ के 827 और चित्तौडगढ के 94 गांवों में जल आपातकाल की स्थित बन गई है।
- हालात ये हैं कि मेवाड़ के कई गांवों में पीएचईडी विभाग पानी के टैंकर तक नहीं पहुंचा पाता है। - कई गांवों में तो पानी के लिए ग्रामीणों को 3 से 4 किमी दूर कुएं में उतरकर पानी लाना पड़ता है। - गर्मी बढ़ने के साथ इन गांवों में स्थिति और भयावह हो सकती है।
पानी के लिए 50 फीट गहरे कुओं में जोखिम में जान
- कातनवाड़ा पंचायत के सुमावत, मनावत, मेरावत, कनात, धयात, भाडला, निचला फला, वडाई और वातडा़ फलों में जलसंकट है।
- महिलाएं पचास फीट गहरे दो कुओं में जान जोखिम में डालकर पानी निकालती हैं।
- नीचे उतरने के लिए पत्थर लगे हैं, लेकिन इन पर पैर रखने जितनी जगह भी नहीं है।
- ऐसे हालात छह महीने से हैं। पंचायत में फ्लोराइडयुक्त पानी होने से जयसमंद से जोड़कर दो टंकियां बनवा रखी हैं।
- आठ साल पहले बनी एक टंकी अब तक एक बार भी नहीं भरी। दूसरी टंकी एक महीने से नाकारा पड़ी है।
सूखे नाले में वेरी, ये ही पानी पीते हैं इंसान और मवेशी
महाद पंचायत में पावटी फला (सूरा) में हैंडपंप तक नहीं है। ग्रामीणों ने नाले के पेटे में वेरी (गड्ढा) खोद रखा है। इंसान और मवेशी इसी से पानी पीते हैं। ऐसे हालात बरसों से हैं। ग्रामीण बताते हैं कि हैंडपंप के लिए कई बार जनप्रतिनिधियों से मिले, पर किसी ने पीड़ा नहीं सुनी। बेडाधर में कथौड़ी बस्ती के भी ये ही हाल हैं। हैंडपंप में जंग लगा पानी आता है। महिलाओं ने एक किमी दूर नदी पेटे में वेरी खोद रखी है। घंटों की मशक्कत के बाद एक घड़ा भरता है।
राज्य के 16 जिलों में राजसमंद-चित्तौड़गढ़ पूरी तरह डार्क जोन में
बाड़मेर, भीलवाड़ा, नागौर, भरतपुर, सवाई माधोपुर, धौलपुर, करौली, अलवर, दौसा, झुंझुनूं, जैसलमेर, जालौर, सिरोही, झालावाड़, चित्तौडगढ़, राजसमंद जिला कम्पलीट डार्क जोन घोषित हैं। उदयपुर जिले में बडग़ांव, भींडर, गोगुंदा, गिर्वा और मावली ब्लॉक डार्क जोन में हैं। डार्क जोन वे हैं, जहां 100 प्रतिशत से ज्यादा पानी तेजी से खपत हो रहा है। इसके अलावा लसाडिय़ा, झाड़ोल, खेरवाड़ा, कोटड़ा, सलूम्बर, सराड़ा ब्लॉक अतिसंवेदनशील श्रेणी में आ चुके हैं।
32 साल में यूं बढ़ी पानी की खपत
वर्ष 1984 में पूरे राजस्थान में भूजल विकास दर 35 प्रतिशत थी। जो आज बढ़कर 137 प्रतिशत गई है। 32 साल के दौरान खपत 132 प्रतिशत बढ़ गई है। 4500 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी निकलता था। आज 14 हजार 800 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी निकल रहा हैं।
यहां भयावह हालात
प्रतापगढ़ जिले के अरनोद कस्बे सहित उपखंड के दलोट, निनोर, सालमगढ़ में पेयजल के भयावह हालात है।

मौसम विभाग के आकड़ों के अनुसार प्रदेश के जयपुर, भीलवाड़ा, भरतपुर, धौलपुर, करौली, सवाई माधोपुर, अलवर, दौसा और प्रतापगढ़ में कम वर्षा होने के कारण इन जिलों में पानी की जबरदस्त किल्लत है।
किसानों की बर्बाद हुई फसलों में बाजरा, मूंग, मोठ, ग्वार और तिल प्रमुख हैं। बासनी हरिसिंह गांव एवं आसपास के सभी क्षेत्रों के किसान अपनी रही सही फसल काटने पर मजबूर हैं। किसानों का कहना है कि बारिश का इंतजार करते-करते फसलें सूख चुकी हैं। अब हम इन सूखी हुई फसलों को काटने को मजबूर हो रहे हैं।

किसानों का कहना है कि बारिश नहीं होने से अब ‘भागते भूत की लंगोटी भली’ के तहत सूखी फसलों की कटाई कर कुछ दिन पशुओं के चारे का इंतजाम किया जा रहा है। मारवाड़ में इस बार चारा, पानी और अनाज के नहीं होने से अकाल दस्तक दे चुका है। किसानों ने कहा कि यदि सरकार ने समय रहते किसानों की सहायता नहीं की तो स्थिति और भी विकट हो सकती है। कई गांवों में तालाब लगभग सूख चुके हैं और आने वाले समय में इन गांवों में पीने के पानी की भंयकर समस्या पैदा हो सकती है।
देश की एकमात्र मरूभूमि राजस्थान भूजल संकट के कगार पर है। राज्य में भूजल के 295 ब्लॉक में से 184 अतिदोहित श्रेणी में आ चुके हैं। मतलब आधे से ज्यादा राज्य में जमीनी पानी कभी भी समाप्त हो सकता है।

Rajasthan is facing a severe water crisis, with a decadal average study has inferring that there has been a decline in groundwater by 62.70% in the state with only 37.20% rise. ... The study was conducted by the Central Ground Water Board (CGWB) on 928 stations.

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लेह-लद्दाख कितना कठिन,संघर्षपूर्ण हैं जीना यहां,जहां पर पेड़ पौधे नाममात्र के हैं। आइए देखते हैं हम।

दुनियाभर में ऐसी कई रहस्यमयी जगह हैं, जिनसे जुड़ा सच वैज्ञानिक भी तलाश रहे हैं। ऐसी ही एक खास जगह लेह-लद्दाख में हैं। इसे 'मैग्नेटिक हिल' के नाम से जाना जाता है।
लेह (लद्दाख)। भारत में अगर सबसे अधिक पूजा-पाठ तथा भगवान को माना जाता है तो वह लद्दाख में माना जाता है। लद्दाख, जिसे 'चन्द्रभूमि' का नाम भी दिया जाता है, सचमुच चन्द्रभूमि ही है। यहां पर धर्म को अधिक महत्व दिया जाता है।

नंगे पहाड़ों से घिरी लद्दाख की धरती, जहां पर पेड़ नाममात्र के हैं तथा बारिश अक्सर चिढ़ाकर भाग जाती है, लामाओं की धरती के नाम से भी जानी जाती है। यहां पर धर्म को बहुत ही महत्व दिया जाता है। प्रत्येक गली-मोहल्ले में आपको स्तूप (छोटे मंदिर) तथा 'प्रेयर व्हील' (प्रार्थना चक्र) भी नजर आएंगे जिन्हें घूमाने से सभी पाप धुल जाते हैं तथा भगवान का नाम कई बार जपा जाता है, ऐसा लेहवासियों का दावा है।

लेह में कितने स्तूपा हैं, इसकी कोई गिनती नहीं है। कहीं-कहीं पर इनकी कतारें नजर आती हैं। सिर्फ शहर के भीतर ही नहीं, बल्कि सभी सीमांत गांवों, पहाड़ों अर्थात जहां भी आबादी का थोड़ा-सा भाग रहता है, वहां इन्हें देखा जा सकता है। इन स्तूपों में कोई मूर्ति नहीं होती बल्कि मंदिर के आकार के मिट्टी-पत्थरों से भरा एक ढांचा खड़ा किया गया होता है जिसे स्तूपा कहा जाता है। वैसे प्रत्येक परिवार की ओर से एक स्तूपा का निर्माण अवश्य किया जाता है।

स्तूपा के साथ-साथ प्रार्थना चक्र, जिसे लद्दाखी भाषा में 'माने तंजर' कहा जाता है, लद्दाख में बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। 5 से 6 फुट ऊंचे इन तांबे से बने चक्रों पर 'ॐ मने पदमने हों' के मंत्र खुदे होते हैं सैकड़ों की संख्या में। ये चक्र धुरियों पर घूमते हैं और एक बार घुमाने से वह कई चक्कर खाता है तो कई बार ही नहीं, बल्कि सैकड़ों बार उपरोक्त मंत्र ऊपर लगी घंटी से टकराते हैं जिनके बारे में बौद्धों का कहना है कि इतनी बार वे भगवान का नाम जपते हैं अपने आप।

वैसे भी 'माने तंजर' बौद्धों की जिंदगी में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसको घुमाने के लिए कोई समय निर्धारित नहीं होता है। जब भी इच्छा हो या फिर समय मिलने पर आदमी इसे घुमा सकता है। अक्सर देखा गया है कि हर आने वाला व्यक्ति इसे घुमाता है और दिन में कई बार इसे घुमाया जाता है, क्योंकि हर गली-मोहल्ले, चौक-बाजार आदि में ये मिल जाते हैं। इनके बारे में प्रचलित है कि उन्हें घुमाने से आदमी के सारे पाप धुल जाते हैं।

सीधी-सादी जिंदगी व्यतीत करने वाले लद्दाखी कितनी धार्मिक भावना अपने भीतर समेटे होते हैं, यह इस बात से भी जाहिर होता है कि एक बड़े परिवार का सबसे बड़ा बेटा लामा बनने के लिए दे दिया जाता है, जो बाद में ल्हासा में जाकर शिक्षा प्राप्त करता है और ब्रह्मचर्य का पालन करता है।

कभी भी लद्दाखियों के बीच झगड़ों की बात सुनने में नहीं आती है जबकि जब उन्होंने 'फ्री लद्दाख फ्रॉम कश्मीर' तथा लेह को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर आंदोलन छेड़ा था तो सरकार ही नहीं, बल्कि सारा देश हैरान था कि हमेशा शांतिप्रिय रहने वाली कौम ने ये कौन सा रास्ता अख्तियार किया है? लद्दाखियों का यह प्रथम आंदोलन था जिसमें हिंसा का प्रयोग किया गया था जबकि अक्सर लड़ाई-झगड़ों में वे पत्थर से अधिक का हथियार प्रयोग में नहीं लाते थे। इसके मायने यह नहीं है कि लद्दाखी कमजोर दिल के होते हैं बल्कि देश की सीमाओं पर जौहर दिखलाने वालों में लद्दाखी सबसे आगे होते हैं।

ताकतवर, शूरवीर तथा सीधे-सादे होने के साथ-साथ लद्दाखवासी नर्म दिल तथा परोपकारी भी होते हैं। मेहमान को भगवान का रूप समझकर उसकी पूजा की जाती है। उनकी नर्मदिली ही है कि उन्होंने तिब्बत से भागने वाले सैकड़ों तिब्बतियों को अपने जहां शरण देने के साथ-साथ उनकी भरपूर मदद भी की।

इसीलिए तो उनकी धरती को 'चांद की धरती' कहा जाता है, क्योंकि जहां लोगों के दिल चांद की तरह साफ हैं।

Note: बेहद मुश्किल वेदर कंडिशन होने की वजह से लेह-लद्दाख जाने का प्लान बनाने वाले टूरिस्ट्स को पहले ही कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए। हम आपको बता रहे हैं उन जरूरी टिप्स के बारे में जिन्हें अपनाकर आपकी लेह ट्रिप बनेगी इंट्रेस्टिंग और सक्सेसफुल...
- चीन और तिब्बत से सटा होने की वजह से उत्तर भारत का यह इलाका राजनीतिक रूप से काफी संवेदनशील है। ऐसे में अगर आप लेह-लद्दाख के लिए बाइक ट्रिप की प्लानिंग कर रहे हैं तो आपको स्पेशल परमिट की जरूरत होगी। इन परमिट्स को आप लोकल लद्दाख अथॉरिटीज के जरिए आसानी से हासिल कर सकते हैं।

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जम्मू कश्मीर की वुल्लर झील(झेलम नदी)लुप्त होता जा रहा हैं। देखे कैसे जीते हैं लोग। समस्या और समाधान।

जम्मू कश्मीर की वुल्लर झील(झेलम नदी)लुप्त होता जा रहा हैं। देखे कैसे जीते हैं लोग। समस्या और समाधान।

विशाल व शानदार वुलर झील,जम्मू कश्मीर के झेलम नदी का विस्तार है। इसे एशिया के सबसे बड़े मीठे पानी का स्रोत भी कहा जाता है। आज कल बहुत ज़्यादा सुनने में आ रहा है, कि शहरीकरण के प्रभाव से देश के लगभग सारे जल निकाय समाप्ति के कगार पर आ गये हैं। वुलर झील भी उन्हीं जल निकायों में से एक है, जो जल्द ही लुप्त होता जा रहा है। यह जम्मू कश्मीर के श्रीनगर से लगभग 70 किलोमीटर दूर बांडीपोरा ज़िले में स्थित है।

Fishing and other rural communities that have traditionally depended on Wular Lake are now struggling to earn a living from it, as shrinkage, siltation and ecological degradation take a toll on Kashmir’s largest flood basin.

नदी के दूसरी तरफ पहाड़ों का नज़ारा एक शन्तिचित्त परिदृश्य बनाता है। इस झील में आपको कई तरह के समुद्री जीव मिल जाएँगे, जिसकी वजह से यह झील मछली पकड़ने का भी मुख्य केंद्र है। सौभाग्य से वुलर झील 26 वेटलैंड रामसार कन्ज़र्वेशन साइट में से एक है। इसलिए इस झील की रक्षा और इसे बचाए रखने के लिए पूरी कोशिश की जा रही है। जम्मू कश्मीर पर्यटन विभाग कई सारे परियोजनाओं के तहत इसकी सुंदरता को बचाने और बढ़ाने में लगे हैं ताकि इसके पर्यटन में सुधार किया जा सके। इन सबके साथ वुलर झील में कई वॉटर स्पोर्ट्स( पानी के खेलों) का आयोजन भी किया जाता है, जैसे वॉटर स्कीइंग और बोटिंग।

क्यूँ यह लुप्त होता जा रहा है? वुलर झील का बहुत अधिक मात्रा में उपयोग करना भी वुलर झील के लिए ख़तरा बनता जा रहा है। इसके अलावा यहाँ सबसे ज़्यादा दुष्प्रभाव पड़ रहा है, क्युंकि इसके रखरखाव में बहुत ज़्यादा लापरवाही बरती जा रही है। झील के अधिकतर भाग में काई के जम जाने से वहाँ आने वाली पक्षियों पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। इन सबको मद्देनज़र रखते हुए, इस झील को पूर्वावस्था में लाने की पूरी कोशिश की जा रही है, जो अब तक ख़तरे में है।

तथापि, इन सबके साथ आप इस आकर्षक मीठे पानी के स्रोत को देखना बिल्कुल भी ना भूलें, जो हज़ारों लोगों के जीवन जीने का एक मात्र स्रोत है। यहाँ तक कि कश्मीर में पकड़े जाने वाली मछलियों में 60% मछलियाँ यहीं से प्राप्त होती हैं। तो जम्मू कश्मीर के इस आकर्षक वुलर झील के लुप्त हो जाने से पहले इसकी यात्रा पर जाना बिल्कुल भी ना भूलें। श्रीनगर के इस खूबसूरत नज़ारे पर थोड़ी देर के लिए आराम से बैठ कर इस खूबसूरत नज़ारे का आनंद ज़रूर लें।

वुलर झील के नज़दीक अन्य पर्यटक स्थल खीर भवानी मंदिर, मानसबाल झील, श्रीनगर, आँचार झील, सोपुर आदि वुलर झील के समीप ही मुख्य पर्यटक स्थल हैं। वुलर झील कैसे पहुँचें वुलर झील बांडीपोरा ज़िले में स्थित है, जो लेह- श्रीनगर हाइवे से लगभग 20 से 30 किलोमीटर की दूरी पर है। वुलर झील का मार्ग श्रीनगर के मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। कई टूरिस्ट बस, श्रीनगर से वुलर झील तक के लिए 1 दिन के ट्रिप का आयोजन भी करते हैं और इसके साथ आसपास के भी कई पर्यटक क्षेत्रों का भ्रमण कराते हैं। आप श्रीनगर से कोई निजी टैक्सी या कैब बुक करा कर भी वुलर झील की यात्रा पर जा सकते हैं।

'Wular' means ‘stormy’ in Kashmiri, and this is how the lake, known for its turbulent waters and fierce winds, was once described. It was praised for its beauty by writers in their books and loved by travellers who liked to camp along its banks. Most people, especially on the internet, have falsely claimed that Wular Lake, located in the Bandipora district of Jammu and Kashmir, is the largest freshwater lake of Asia. Though the fact might be untrue, but the lake's beauty is not made-up. Being fed by the water of the Jhelum River, the lake was once so clear that you could see till deep below. Children played in the lake and local families used the water to cook their meals.

KASHMIRI TEEN BILAL HAS FOUND FAME FOR HIS EFFORTS TO CLEAN UP WULAR LAKE

More than 8,000 fishermen earn their livelihood from Wular Lake. The pollution from fertilizers and animals as well as human wastes, the conversion of vast catchment into agriculture land and the hunting pressure on waterfowl and migratory birds are the biggest problems in the region.

According to a study by Wetland International, 32,000 families including 2,300 fisher households living on Wular’s shores depend on it for livelihood. In Dar’s village, 600 fisher families live off Wular’s resources.

“Kashmir’s water bodies such as Wular, Mansbal, Dal lakes and Jhelum have served the people since ages as sources of livelihood and served.

His colleague, Farooz Ahmad Bhat said that the total annual fish production of the region is 20,000 tons. Quoting statistics of Kashmir’s fisheries department, he said that more than 30,000 people are directly involved in fishing, 14,000 of them with registered licenses.
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गुजरात और राजस्थान के सीढ़ीदार कुआँ,कुछ इतिहास तथा अन्य प्राचीन जल इंजीनियरिंग को देखेंगे। (बावड़ी)

गुजरात और राजस्थान के सीढ़ीदार कुआँ,कुछ इतिहास तथा अन्य प्राचीन जल इंजीनियरिंग को देखेंगे। Stepwell (बावड़ी)

रानी की वाव भारत के गुजरात राज्य के पाटण में स्थित प्रसिद्ध बावड़ी (सीढ़ीदार कुआँ) है। ... कहते हैं कि रानी की वाव (बावड़ी) वर्ष 1063 में सोलंकी शासन के राजा भीमदेव प्रथम की प्रेमिल स्मृति में उनकी पत्नी रानी उदयामति ने बनवाया था।

जयपुर, राजस्थान के समीप आभानेरी गाँव में स्थित चाँद बावड़ी भारत की सबसे सुन्दर बावड़ी है। मैं तो इसे सर्वाधिक चित्रीकरण योग्य बावड़ी भी मानती हूँ।
चांद बावड़ी के नाम से मशहूर इस बावड़ी का निर्माण आज से करीब 1200 साल पहले यानि 9वीं शताब्दी के आसपास किया गया था। इस बावड़ी के अंदर 3,500 सीढ़ियां हैं जो नीचे की ओर जाती हैं। उस समय अगर किसी भी व्यक्ति को बावड़ी के भीतर से पानी निकालना होता था तो उसे पहले साढ़े तीन हजार सीढ़ियां नीचे जाना पड़ता था।

Rani ki vav) भारत के गुजरात राज्य के पाटण ज़िले में स्थित प्रसिद्ध बावड़ी (सीढ़ीदार कुआँ) है। 23 जून, 2014 को इसे यूनेस्को के विश्व विरासत स्थल में सम्मिलित किया गया।[1] बावड़ी में बनी बहुत-सी कलाकृतियों की मूर्तियों में ज्यादातर भगवान विष्णु से संबंधित हैं। भगवान विष्णु के दशावतार के रूप में ही बावड़ी में मूर्तियों का निर्माण किया गया है, जिनमे मुख्य रूप से कल्कि, राम, कृष्णा, नरसिम्हा, वामन, वाराही और दुसरे मुख्य अवतार भी शामिल हैं। इसके साथ-साथ बावड़ी में नागकन्या और योगिनी जैसी सुंदर अप्सराओं की कलाकृतियाँ भी बनायी गयी हैं। बावड़ी की कलाकृतियों को अद्भुत और आकर्षित रूप में बनाया गया है।

• 'रानी की वाव' एक भूमिगत संरचना है, जिसमें सीढ़ीयों की एक श्रृंखला, चौड़े चबूतरे, मंडप और दीवारों पर मूर्तियां बनी हैं। रानी की वाव को रानी उदयामती ने अपने पति राजा भीमदेव की याद में वर्ष 1063 ई. में बनवाया था। राजा भीमदेव गुजरात के सोलंकी राजवंश के संस्थापक थे। भूगर्भीय बदलावों के कारण आने वाली बाढ़ और लुप्त हुई सरस्वती नदी के कारण यह बहुमूल्य धरोहर तकरीबन 700 सालों तक गाद की परतों तले दबी रही। बाद में भारतीय पुरातत्व विभाग ने इसे खोजा। वाव के खंभे सोलंकी वंश और उसके आर्किटेक्चर के नायाब नमूने हैं। वाव की दीवारों और खंभों पर ज्यादातर नक्काशियां राम, वामन, महिषासुरमर्दिनी, कल्कि जैसे अवतारों के कई रूपों में भगवान विष्णु को समर्पित हैं। इस वाव में एक छोटा द्वार भी है, जहां से 30 किलोमीटर लम्बी सुरंग निकलती है। रानी की वाव ऐसी इकलौती बावड़ी है, जो विश्व धरोहर सूची में शामिल हुई है।

Stepwells are wells or ponds in which the water is reached by descending a set of steps to the water level. They may be multi-storied with a bullock turning a water wheel to raise the well water to the first or second floor.

यह बावड़ी एक भूमिगत संरचना है जिसमें सीढ़ीयों.

अपने प्रकार की यह इकलौती बावड़ी ”रानी की वाव” चारों तरफ से बेहद आर्कषक कलाकृतियों और मूर्तियों से घिरी हुई है। इस ऐतिहासिक बावड़ी का निर्माण 11वीं सदी में सोलंकी वंश के राजा भीमदेव की याद में उनकी पत्नी रानी उदयमती ने करवाया था। सरस्वती नदी के किनारे स्थित इस बावड़ी को इसकी अद्भुत एवं विशाल संरचना की वजह से यूनेस्को द्धारा साल 2014 में विश्व धरोहर की सूची में भी शामिल किया गया है।
यह अपने आप में इसकी अद्धितीय और अनूठी संरचना है, जो कि भूमिगत पानी के स्त्रोतों से थोड़ी अलग है। इस विशाल ऐतिहासिक संरचना के अंदर 500 से भी ज्यादा मूर्तिकलाओं का बेहद शानदार ढंग से प्रदर्शन किया गया है।

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बंगाल की खाड़ी के पास सुंदरवन हैं कितना कठिन, संघर्षपूर्ण हैं जीना यहां। आइए देखते हैं लोगो का जीवन।

बंगाल के सुंदरवन का नाम भले ही सुहाना लगता है, लेकिन यहां के बाशिंदों के लिए ये एक डरावनी दास्तान बनकर रह गया है. आख़िर ऐसा क्यों है?

भारत के राज्य पश्चिम बंगाल में स्थित सुंदरवन 54 छोटे द्वीपों का समूह है. सुंदरवन आदमख़ोर बाघों की धरती है, जहां हर साल दर्जनों लोग बाघों का शिकार बनते हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि ये हमले लगातार बढ़ रहे हैं.

ये डेल्टा सदाबहार वनों और विशाल खारे दलदल से भरे हैं. इस दलदली जंगल में ऊंची-नीची संकरी खाड़ी हैं. इस तस्वीर में एक नाविक अपनी नाव चला रहा है.

विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण यहां मनुष्यों और बाघों के नज़दीक आने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. ऐसे में लोगों पर बाघों के हमले बढ़ रहे हैं.
मछुआरे, शहद बटोरने वाले और शिकारी जो अकसर जंगल में भीतर तक चले जाते हैं.
शहद बटोरने वालों को जंगल में जाने से पहले वन विभाग मुखौटा देता है. वन अधिकारियों का कहना है कि बाघ अक्सर पीछे से हमला करता है और मुखौटे के जरिए उसे मूर्ख बनाया जा सकता है.
एक बांस पर फहराता हुए झंडा- जिसे झामती कहा जाता है, इसे ऐसी जगहों पर लगाया जाता है जहां बाघ के हमले की आशंका काफी अधिक होती है.
सुंदरवन में वन विभाग ने गांव वालों को रोज़गार दिया है. इसका काम गांव में बाघों को आने से रोकने के लिए जाल लगाना है.

रीता मंडल के पति श्रीनाथ को अप्रैल 2011 में बाघ ने मार दिया. आज उनके तीन बच्चों की पूरी जिम्मेदारी रीता के ऊपर ही है.
पूरे क्षेत्र में सभी गांवों की यही कहानी है. युवा विधवाएं, जिनके पतियों को इस बड़ी बिल्ली ने मार डाला. यहां ऐसी ही एक विधवा महिला खड़ी है.
स्थानीय रीति-रिवाज के मुताबिक़ पत्नियां संदूर लगाती हैं. ये एक विवाहित हिंदू महिला का चिन्ह है. यहां नर्मल ग्यान की पत्नी अंजना अपने पति के जंगल से लौट आने पर संदूर लगा रही हैं.

आधिकारिक आंकडों के मुताबिक़ सुंदरवन के जंगलों में सैकड़ों बाघ रहते हैं.
मछुआरे और शहद जमा करने वाले रॉबिन मजूमदार पर घने जंगल में बाघ ने हमला किया. वो मौत के मुंह से बचकर तो आ गए लेकिन दोबारा जंगल में जाने की हिम्मत नहीं हुई.
प. बंगाल सरकार द्वारा हर साल 40 हजार से ज्यादा लोगो को जंगल से शहद व वनोपज एकत्र करने, मछली पकड़ने का परमिट दिया जाता है, पर पैसा कमाने के लालच में हजारों लोग अवैध रूप से इन जंगलों और तटों पर वनोपज इकट्ठा करने व मछली पकड़ने जाते हैं
सुंदरवन या सुंदरबोन भारत तथा बांग्लादेश में स्थित विश्व का सबसे बड़ा नदी डेल्टा है। बहुत सी प्रसिद्ध वनस्पतियों और प्रसिद्ध बंगाल टाईगर का निवास स्थान है। यह डेल्टा धीरे धीरे सागर की ओर बढ़ रहा है। कुछ समय पहले कोलकाता सागर तट पर ही स्थित था और सागर का विस्तार राजमहल तथा सिलहट तक था, परन्तु अब यह तट से 15-20 मील (24-32 किलोमीटर) दूर स्थित लगभग 1,80,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। यहाँ बड़ी तादाद में सुंदरी पेड़ मिलते हैं जिनके नाम पर ही इन वनों का नाम सुंदरवन पड़ा है। इसके अलावा यहाँ पर देवा, केवड़ा, तर्मजा, आमलोपी और गोरान वृक्षों की ऐसी प्रजातियाँ हैं, जो सुंदरवन में पाई जाती हैं। यहाँ के वनों की एक ख़ास बात यह है कि यहाँ वही पेड़ पनपते या बच सकते हैं, जो मीठे और खारे पानी के मिश्रण में रह सकते हों।

सुंदरवन राष्ट्रीय अभयारण्य, पश्चिम बंगाल (1987) : सुंदरवन अभयारण्य पश्चिम बंगाल (भारत) में खानपान जिले में स्थित है। इसकी सीमा बांग्लादेश के अंदर तक है। सुंदरवन भारत के 14 बायोस्फीयर रिजर्व में से एक बाघ संरक्षित क्षेत्र है। इस उद्यान को भी विश्‍व धरोहर में शामिल किया गया है। कई दुर्लभ और प्रसिद्ध वनस्पतियों और बंगाल टाइगर के निवास स्थान सुंदरवन को 'सुंदरबोन' भी कहा जाता है, जो भारत तथा बांग्लादेश में स्थित विश्व का सबसे बड़ा नदी डेल्टा भी है। बंगाल की खाड़ी में हुगली नदी के मुहाने (शरत) से मेघना नदी के मुहाने (बांग्लादेश) तक 260 किमी तक विस्तृत एक व्यापक जंगली एवं लवणीय दलदली क्षेत्र, जो गंगा डेल्टा का निचला हिस्सा बनाता है, यह 100-130 किमी में फैला अंतर्स्थलीय क्षेत्र है। भारत तथा बांग्लादेश में यह जंगल 1,80,000 वर्ग किलोमीटर तक फैला है। सुंदरवन नाम संभवत: ‘सुंदरी का वन’ से लिया गया है जिसका यहां पाए जाने वाले मूल्यवान विशालकाय मैंग्रोव से है। यहां बड़ी तादाद में सुंदरी पेड़ मिलते हैं जिनके नाम पर ही इन वनों का नाम सुंदर वन पड़ा है।

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गुजरात राज्य के कच्छ जिले में हैं Dholavira (धोलावीरा), सिंधु घाटी सभ्यता प्राचीन इतिहास देखते हैं ।

Dholavira – धोलावीरा शहर सिंधु घाटी सभ्यता के कुछ प्रमुख शहरों में से एक हुवा करता था। और इसी सभ्यता के गुजरात राज्य के कच्छ जिले में स्थित धोलावीरा पुरातत्वीय शहर के बारे में विस्तार से जानेंगे। तो आइये फ्रेंड्स शुरू करते है।

धोलावीरा भारत के पश्चिम में आए हुए गुजरात राज्य के कच्छ जिले के भचाऊ तालुका में आये हुवे गांव खदिरबेट में मिली हुई पुरातत्वीय जगह है। धोलावीरा शहर करीब 100 से 120 एकर में फैला हुवा है।

कच्छ के स्थानीय लोग इसे कोटड़ा टिम्बा (जिसका अर्थ है बड़ा किला) के नाम से जानते है। इस जगह में प्राचीन सिंधु सभ्यता के धोलावीरा शहर के खँडहर दबे पड़े है।
धोलावीरा की तुलना हड़प्पा संस्कृति के अन्य प्रमुख शहरों जैसे मोहनजोदड़ो (सिंध,पाकिस्तान), हड़प्पा(साहीवाल,पंजाब,पाकिस्तान), गनेरीवाला(बहावलपुर,पंजाब,पाकिस्तान), कालीबंगा ( राजस्थान, भारत ), राखीगढ़ी (हरियाणा,भारत), बनवाली (हरियाणा,भारत) और लोथल(गुजरात,भारत) से की जा सकती है।

यह सारे शहर सिंधु घाटी सभ्यता जिसे इंडस वेली सभ्यता से भी जाना जाता है उसके प्रमुख शहर हुवा करते थे जिसमे यह सभ्यता फूली फली थी।
सिंधु सभ्यता को अगर हम ईजिप्त की मिस्र या मेसोपोटेमिया की सभ्यता के साथ तुलना करें तो यह पता चलता है की यह सारी सभ्यता एक ही युग में फली फूली थी।
आज से 5000 वर्ष पहले भारत की इस सभ्यता ने अर्बन सविलाइज़ेशन का सबसे पहला मॉडल बनाया था।

इस समय जब बाकि की दुनिया खाना और पानी कैसे ढूंढे उसके बारे में सोच रही थी तब ये उन्नत सभ्यता खेती, पक्की इमारतें, व्यापर और साहित्य जैसी कई दिशाओं में आगे बढ़ चुकी थी।

यह सभ्यता गणित, विज्ञान, इंजीनरिंग, भूमिति, धातुविद्या और खेती के काम में भी माहिर थी।

यह बात सोचने लायक है की उस समय की सबसे उन्नत सभ्यता का पतन कैसे हो गया? तो आइये आज हम इसके इतिहास को थोड़ा और क़रीबसे जानने की कोशिश करते है।
Dholavira History - धोलावीरा हिस्ट्री..
धोलावीरा भारत के दो सबसे बड़े हड़प्पा स्थलों में से एक है, और उपमहाद्वीप में 5 वां सबसे बड़ा स्थान है।

लोथल की तरह धोलावीरा भी हड़प्पा संस्कृति के सभी दौरों (लगभग 2900 ईसा पूर्व से 1500 ईसा पूर्व तक) से गुजरा था। जबकि दूसरे शहरों ने शुरुआती या तो आखरी दौर ही देखा था।

1967 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा साइट का पता लगाया गया था, लेकिन केवल 1990 के बाद से व्यवस्थित रूप से खुदाई की गई है।
पुरातत्विदों के मत अनुसार धोलावीरा सिंधु सभ्यता के मुख्य शहर में से एक हुवा करता था। यह 47 हेक्टेयर चतुर्भुज शहर दो मौसमी धाराओं के बीच स्थित है। जब धोलावीरा शहर नया-नया बसा ही था तब वहाँ के लोग मिट्टी के पत्थर बनाते थे, पत्थर तोड़ते थे और शंख आदि के मनके बनाते थे।

धोलावीरा की नगर व्यस्था में एक किला (जहां शासक, उनके वंशज और उनके उच्च अधिकारी) रहते थे, मध्य शहर और निचले शहर (जिसमे आम जनता और बाजार) हुवा करते थे।

हमारी तरह सिंधु घाटी की सभ्यता भी पक्की गाणितिक वव्यस्थापन से रहती थी। आधुनिक तौर तरीकों से खेती और व्यापर किया करती थी।

इस सभ्यताओं को उन्नत इस लिए माना जाता है क्यूंकि जब बाकि की कई सभ्यताएं जंगल में ही रहा करती थी और खाने और पिने के लिए रास्ते तलाश रही थीं तब यह सभ्यता ने रहने के लिए पक्के घर बना लिए थे जिसमे कमरे, बाथरूम और टॉयलेट की भी व्यस्था थीं जिसके पानी के निकाल के लिए नाले और ड्रेनेज की भी एक पक्की संरचना मौजूद थीं।
जमीं के निचे दबी मिली सुद्रढ़ नगर रचना आज के इंजीनरिंग को भी मात देती है। क्यूंकि उस ज़माने में कोई आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल किए बिना सिर्फ मानव परिश्रम के द्वारा इतनी सुद्रढ़ संरचना बनाना उनकी गाणितिक सूज बूज की गवाही देती है।
हर घर में बाथरूम का इस्तेमाल होता था। इस पानी के निकाल के लिए.,

धोलावीरा में दो मौसमी नाले या धाराएँ थीं, उत्तर में मानसर और दक्षिण में मनहर। मतलब की धोलावीरा के निवासियों ने यह दो धाराओं के बीच अपना शहर बसाया हुवा था,जो मॉनसून में अपना पानी इकट्ठा करते थे और वर्ष के बाकी समय तक इसका उपयोग करते थे।

Dholavira, located around 250 km away from Bhuj is a famous ancient archaeological place that marks the existence of historical Harappa Sanskriti.

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अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह (Andaman and Nicobar Islands) - कुछ रोचक तथ्य।

अण्डमान और निकोबार द्वीपसमूह (Andaman and Nicobar Islands) - कुछ रोचक तथ्य।

गभग 300 छोटे-बड़े द्वीपों से मिलकर बना है भारत का यह केन्द्र शासित प्रदेश अंडमान और निकोबार द्वीप समूह (Andaman and Nicobar Islands)। ये बंगाल की खाड़ी के दक्षिण में हिन्द महासागर में स्थित है। यहां की राजधानी पोर्ट ब्लेयर है।

अंडमान शब्द मलय भाषा के शब्द हांदुमन से आया है जो हिन्दू देवता हनुमान के नाम का परिवर्तित रूप है। निकोबार शब्द भी इसी भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ होता है नग्न लोगों की भूमि। इसे गार्डन ऑफ ईडन भी कहा जाता है। कहीं उल्लेखित है कि श्रीलंका के आसपास ही कहीं 'आदम' का जन्म हुआ था।

उष्‍ण कटिबंधी वर्षा वन और बंगाल की खाड़ी के कारण यहां पौधों, जंतुओं तथा समुद्री जीवन की विविधता और सुंदरता देखते ही बनती है। अपने किनारों पर पाम वृक्षों के साथ यहां का संगमरमरी सफेद तट ऐसा लगता है मानों स्वर्ग का कोई राज्य हो।

जनजातीय तबलों की ताल के बीच रंगबिरंगी मछलियां साफ-स्‍वच्‍छ चमकीले पानी में नृत्य करती हुई नजर आती हैं। यहां के प्रमुख तट है- कोर्बिन कोव और चिरायाटापू, हरमिंदर बे तट, करमतांग तट, राधानगर और विजयनगर तट, रामनगर तट और इसके अलावा एक समुद्री पार्क है वंडुर नेशनल पार्क।

इस द्वीप में अधिकांश भाग में उद्यान है जो घने पेड़ों से युक्‍त हैं, यहां के खुले स्‍थान भी झाड़ियों और लताओं से भरे पड़े हैं। घने वृक्ष, लता और झाड़ियों के कारण यहां पक्षियों की आवाज तो सुन सकते हैं लेकिन उन्हें देखना मुश्किल ही है। शाखाएं और बेलें समुद्र के ऊपर टंगी हुई दिखाई देती हैं।

निश्चित ही अंडमान-निकोबार द्वीप समूह पर छुट्टियां िबताना किसी स्वर्ग में रहने से कम नहीं है। यहां रहने का अनुभव आप जीवन भर भूल नहीं सकते। आध्यात्म की तलाश करने वालों के लिए यह सबसे उपयुक्त स्थान है। निश्चित ही यहां रहकर मोक्ष पाया जा सकता है।

अंडमान निकोबार में पूरे साल मौसम सुहावना बना रहता है लेकिन आप बेस्ट टाइम में यहां जाएंगे तो माहौल और भी ज्यादा अच्छा होगा। अंडमान निकोबार की सबसे अच्छी बात यही है कि यहां तापमान पूरे साल अच्छा होता है और तापमान में परिवर्तन बेहद कम होता है। उष्णकटिबंधीय द्वीप होने के कारण अंडमान और निकोबार में ज्यादा सर्दी नहीं पड़ती है

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राजस्थान के लोग कैसे बचा रहे अपने नदियों को, सूख चुकी नान्दूवाली नदी का फिर से बहने लगी । अलवर जिला।

यह कल्पना करना मुश्किल है कि यह नदी और जंगल कभी सूख चले थे। पेड़ों के साथ-साथ समाज और परम्पराओं का भी कटाव होने लगा था। कुओं में कटीली झाड़ियाँ उग आईं और बरसात से जो थोड़ी सी फसल होती उसमें गुजारा करना मुश्किल था। गाय-भैंस बेचकर कई परिवार बकरियाँ रखने लगे क्योंकि चारे को खरीदने और गाँव तक लाने में ही काफी पैसे खर्च हो जाते। जवान लोगों का रोजी-रोटी के लिये पलायन जरूरी हो गया। निम्न जाति के परिवारों की हालत बदतर थी। सूख चुकी नान्दूवाली नदी का फिर से बहना अकाल ग्रस्त भारत के लिये एक सुखद सन्देश है। ढाक के पेड़ों पर नई लाल पत्तियाँ आ रही हैं पर कदम, ढोंक और खेजड़ी की शाखाएँ लदी हुई हैं। एक दूसरे में मिलकर यह हमें कठोर धूप से बचा रहे हैं। जिस कच्चे रास्ते पर हम बढ़ रहे हैं वह धीरे-धीरे सख्त पत्थरों को पीछे छोड़ मुलायम हो चला है और कुछ ही दूरी पर नान्दूवाली नदी में विलीन हो जाता है। राजस्थान में अलवर जिले के राजगढ़ इलाके की यह मुख्य धारा कई गाँव के कुओं और खलिहानों को जीवन देती चलती है। इनमें न सिर्फ कई मन अनाज, बल्कि सब्जियों की बाड़ी और दुग्ध उत्पादन भी शामिल है। रायका समुदाय इस क्षेत्र की सबसे पिछड़ी जाति है। पारम्परिक तौर पर ऊँटों के व्यापारी रायका थोड़ी सी आमदनी से गुजारा करते। लेकिन आज इस इलाके के 15 रायका परिवारों के पास पक्के मकान और खेत हैं जिस पर सब्जियाँ, गेहूँ और सरसों की फसल उन्हें अच्छी आमदनी देती हैं। 30 वर्षीय जय सिंह रायका कहते हैं कि उनकी जमीन पर कोई सिंचाई सुविधा नहीं थी पर पास में एक जोहड़ के निर्माण से उनके भी कुएँ तर हो गए जिससे फसल अच्छी होने लगी।

अपने दम पर पानी और जंगल सहेज रहे हैं ग्रामीण

धीरे-धीरे जब खेती में सुधार हुआ तो समाज का योगदान 25 प्रतिशत से बढ़कर 100 प्रतिशत हो गया। पिछले तीन साल से संस्था ने कुछ भी खर्चा नहीं किया परन्तु जोहड़, एनीकट और मेड़बन्दी बनती चली जा रही है।

गाँव वाले निर्माण से लेकर मरम्मत और वनों का संरक्षण अपने दम पर कर रहें हैं। कुंज बिहारी एक तकनीकी सहायक की तरह जरूरत पड़ने पर हाजिर हो जाते हैं। वह बताते हैं कि हर कोई यहाँ एक इंजीनियर है। वह केवल पानी के सतही और धरातल के स्वभाव को ही नहीं, निर्माण के सभी पहलुओं की जानकारी रखते हैं।

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१) अजमेर - साबरमती, सरस्वती, खारी, ड़ाई, बनास
२) अलवर - साबी, रुपाढेल, काली, गौरी, सोटा
३) बाँसबाड़ा - माही, अन्नास, चैणी
४) बाड़मेर - लूनी, सूंकड़ी
५) भरतपुर - चम्बल, बराह, बाणगंगा, गंभीरी, पार्वती
६) भीलवाडा - बनास, कोठारी, बेडच, मेनाली, मानसी, खारी
७) बीकानेर - कोई नदी नही
८) बूंदी - कुराल
९) चुरु - कोई नदी नही
१०) धौलपुर - चंबल
११) डूंगरपुर - सोम, माही, सोनी
१२) श्रीगंगानगर - धग्धर
१३) जयपुर - बाणगंगा, बांड़ी, ढूंढ, मोरेल, साबी, सोटा, डाई, सखा, मासी
१४) जैसलमेर - काकनेय, चांघण, लाठी, धऊआ, धोगड़ी
१५) जालौर - लूनी, बांड़ी, जवाई, सूकड़ी
१६) झालावाड़ - काली सिन्ध, पर्वती, छौटी काली सिंध, निवाज
१७) झुंझुनू - काटली
१८) जोधपुर - लूनी, माठड़ी, जोजरी
१९) कोटा - चम्बल, काली सिंध, पार्वती, आऊ निवाज, परवन
२०) नागौर - लूनी
२१) पाली - लीलड़ी, बांडी, सूकड़ी जवाई
२२) सवाई माधोपुर - चंबल, बनास, मोरेल
२३) सीकर - काटली, मन्था, पावटा, कावंट
२४) सिरोही - प. बनास, सूकड़ी, पोसालिया, खाती, किशनावती, झूला, सुरवटा
२५) टोंक - बनास, मासी, बांडी
२६) उदयपुर - बनास, बेडच, बाकल, सोम, जाखम, साबरमती
२७) चित्तौडगढ़ - वनास, बेडच, बामणी, बागली, बागन, औराई, गंभीरी, सीवान, जाखम, माही।

The 22km long river which flows through the village Nandu situated 65km to the west of Alwar District in Rajasthan. It focuses on the methods used by the people in the village to revive the river. The process was initiated by Satish Sharma and Kunj Bihari. They are brothers and are natives of Nandu. They played a vital role in creating awareness among the people of Nandu.
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राजस्थान जहा ज़मीन के पानी से निकलता हैं नमक। सुजानगढ़ नमक कैसे बनता है। इन बातों से अंजान होंगे आप ।

राजस्थान जहा ज़मीन के पानी से निकलता हैं नमक। सुजानगढ़ नमक कैसे बनता है। इन बातों से अंजान होंगे आप ।

राजस्थान, एक बेहद ही सभ्य और खूबसूरत राज्य है। अपनी महमान नवाज़ी के लिए जाना जाने वाला ये राज्य हमेशा सबको पधारो म्हारे देश के नारे के साथ अपनी खूबसूरती दिखाने के लिए न्यौता देता है। आदर-सत्कार और परंपराओं को मानने वाले इस राज्य को देखना दुनिया भर के पर्यटक आते हैं। यूं तो राजस्थान का नाम सुनते ही अक्सर हमारे मन में एक बीयाबान रेगिस्तान जहां सिर्फ चिलचिलाती धूप और ऊंट पर बैठे कुछ लोगों की छवी बनती है। लेकिन हकीकत में राजस्थान में और भी बहुत कुछ है जो एक बार आखों में बसने के बाद कभी ओझल नहीं होगा।

राजस्थान की खारे पानी की झीले, विश्वविख्यात कृष्ण मृग अभयारण्य की सीमा पर करीब 1000 एकड़ में फैले लवण उद्योग का अब दम टूटने लगा है. सरकार ने नमक उद्योग लगाकर इस उद्योग की कभी सुध नहीं ली.
अभयारण्य विस्तार में नमक उद्योग व्यवसाय जमीन छोड़ने को तैयार व्यवसायियों से जब इस विषय पर वार्ता हुई तो उन्होंने बताया कि सरकार यदि निश्चित मुआवजा दे तो अभयारण्य विस्तार के लिए हम भूमि छोड़ने को भी तैयार हैं क्योंकि नमक का उत्पादन अब ना के बराबर होता है कुछेक नमक प्लॉट ही बचे हैं जो वर्तमान में नमक उत्पादन कर रहे हैं.

Sujangarh (सुजानगढ़) is the name of a city and a tahsil in Churu district of Rajasthan. Its old name was Guleriyon Ki Dhani (गुलेरियों की ढ़ाणी).

मोहिल जाटवंश राज्य - मोहिल जाटवंश ने बीकानेर राज्य स्थापना से पूर्व छापर में जो बीकानेर से 70 मील पूर्व में है और सुजानगढ़ के उत्तर में द्रोणपुर में अपनी राजधानियां स्थापित कीं। इनकी ‘राणा’ पदवी थी। छापर नामक झील भी मोहिलों के राज्य में थी जहां काफी नमक बनता है। कर्नल जेम्स टॉड ने अपने इतिहास के पृ० 1126 खण्ड 2 में लिखा है कि “मोहिल वंश का 140 गांवों पर शासन था।

मोहिल वंश के अधीन 140 गांवों के जिले (परगने) - छापर (मोहिलों की राजधानी), हीरासर, गोपालपुर, चारवास, सांडण, बीदासर. लाडनू, मलसीसर, खरबूजाराकोट आदि। जोधा जी के पुत्र बीदा (बीका का भाई) ने मोहिलों पर आक्रमण किया और उनके राज्य को जीत लिया। मोहिल लोग बहुत प्राचीनकाल से अपने राज्य में रहा करते थे। पृ० 1123.

नमक उद्योग नमक उद्योग राजस्थान में बड़े पैमाने के ... और पंचभद्रा में स्थित हैं, जबकि अनेक लघु सुजानगढ़ में स्थित हैं।

यह झील चुरु जिले में है तथा इससे लगभग 24000 टन वार्षिक नमक बनाया जाता है। कुचामन, फलौदी व सुजानगढ़ में कुओं से भी नमक बनाया जाता है।

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सांभर झील जयपुर से 60 किमी और अजमेर से 82 किमी की दूरी पर स्थित है। यहाँ के लिए नियमित बसें उपलब्ध हैं और सांभर का रेलवे जंक्शन भी है।
सांभर झील
राजस्थान के सांभर झील को राजस्थान की साल्ट लेक भी कहा जाता है जो भारत की सबसे बड़ी अंतर्देशीय नमक की झील है। जो 22.5 किमी क्षेत्र में फैली, यह भारत की सबसे बड़ी अंतर्देशीय नमक झील है जिसको 'थार रेगिस्तान का उपहार भी' माना जाता है। इस खारी झील 5.1 किमी लम्बी बांध में विभाजित की गयी है जो नमक को बनाने में मदद करता है।

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Kashmiri Filmmaker on the Plight of Dal Lake Dwellers

The Dal Lake in Srinagar, also known as a “jewel in the crown of Kashmir,” is slowly “dying,” warns filmmaker Dr. Abdul Rashid Bhat in his documentary, “The Bitter Truth – Dal Losing Battle Between Locals & the Authorities.” While pollution, sewage and encroachment are taking a heavy toll on the lake, the local government’s seemingly half-hearted efforts towards its conservation are making life a hell for those who have been living on the lake for generations.

Bhat’s film features voices from angry Dal dwellers, officials and environmentalists. In this video interview, shot in New Delhi at the PickUrFlick Indie Film Festival in May, Bhat describes the pain of the lake inhabitants who are being forced to relocate to an area where the living conditions are equally bad, in not worse.

Bhat asks that while the efforts towards preserving the beauty of the lake are desirable, can we neglect the future of its dwellers?
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Special Report - Dal Lake (Ek Jheel Ki Kahani)

In this special report on the Dal Lake, we take a look at its present condition and the problems faced by the house boats & shikara owners and the zamindaar community in Srinagar.

Anchor & Producer : Samina

लेह-लद्दाख के लोगो का संघर्ष ,(The Wonderful Hard Working People of Leh - Ladakh) । Short Film in 4K

भारत एक ऐसा देश है, जहां विभिन्न क्षेत्र, विभिन्न आबोहवा अपने में समेटे हुए रहते हैं।

लद्दाख का इतिहास दो हज़ार साल से भी ज़्यादा पुराना है और भूगोल के हिसाब से हिमालय व काराकोरम पर्वत शृंखला के बीच बसे इस भूभाग पर समय समय पर ताकतवर रहे तमाम देशों की नज़र रही है. बहुत पुरानी बात न करते हुए ये जानिए कि 17वीं सदी के अंत में तिब्बत के साथ विवाद के चलते लद्दाख ने खुद को भूटान के साथ जोड़ा था. फिर कश्मीर के डोगरा वंश के शासकों ने लद्दाख को 19वीं सदी में हासिल किया. तिब्बत, भूटान, चीन, बाल्टिस्तान और कश्मीर के साथ कई संघर्ष के बाद 19वीं सदी से लद्दाख कश्मीर का ही हिस्सा रहा.


गुजरात का कच्छ व राजस्थान रेत में भी चटख रंगों की सुन्दरता समेटे है, तो केरल हरियाली और झरने। सिक्किम, उत्तराखंड बर्फ के साथ खूबसूरत फूलों से आपका स्वागत करता है, तो गोवा समुद्री लहरों व उन्हीं के समान थिरकते जिस्मों से। कोई क्षेत्र भारतमाता को बर्फ का ताज पहनाता है, सागर से उसके चरण पखारता है यानी हर क्षेत्र का अपना-अपना अलग रंग, अपनी सुंदरता। अनेकता में एकता को चरितार्थ करते अपनी मातृभूमि पर गर्व का अनुभव करते देश के विभिन्न राज्यों को देखने का अवसर प्राप्त हुआ। लेकिन पहली बार मालूम हुआ कि सिर्फ समुद्र तट को छोड़ दें तो बर्फीली घाटियों से ढंके पहाड़, हरियाली चुनर जैसे सिर से खींच ली हो, ऐसे भूरे, बंजर, पत्थरों से पटी विशाल पर्वत श्रृंखलाएं, हजारों फीट की ऊंचाई वाले पर्वतों के बीच बेहद खूबसूरत घाटियां, कल-कल बहते ठंडे पहाड़ी झरने, कांच की तरह साफ व मटमैली भी, दोनों तरह की नदियां, किसी रेगिस्तान की तरह बिछी रेत, पठार और उस पठार में खूबसूरत झील। कुदरत की खूबसूरत कारीगरी... ये सारी चकित कर देने वाली सुंदरता एक जगह थी। जी हां...! अद्भुत... अविस्मरणीय... अप्रतिम... सौंदर्य से भरपूर... इतनी सारी विविधता अपने विशाल आंचल में समेटे ये क्षेत्र था लेह।

जम्मू-कश्मीर के लद्दाख जिले में आने वाली जगह लेह...! 3 किलोमीटर प्रति व्यक्ति के हिसाब से जनसंख्या घनत्व वाला लेह...! 25,321 स्क्वेयर किमी क्षेत्रफल वाला लेह...! समुद्री सतह से 11,300 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।

वैसे तो लेह-लद्दाख देशी कम, विदेशी सैलानियों की सूची की पसंदीदा जगहों में सबसे ऊपर है, लेकिन भला हो बॉलीवुड का, जिसने कुछ फिल्मों की शूटिंग यहां करके इसे और लोकप्रिय बना दिया।

जब लेह-लद्दाख का प्रोग्राम बना तो दिल्ली से लेह की फ्लाइट थी। (हालांकि बाद में लगा कि मनाली या श्रीनगर आकर वहां से सड़क मार्ग से आना ज्यादा आनंददायक रहता)। खैर... जानकारों के अनुसार यहां जुलाई में आना चाहिए, क्योंकि तब तक काफी बर्फ पिघल जाती है और बर्फ के अलावा वो सारा सौंदर्य आप देख सकते हैं, जो मैंने ऊपर वर्णित किया है।
यहां के अधिकतर त्योहार फसलों और धर्म से संबंधित हैं.

लद्दाख के शासक रहे नामज्ञाल वंश को स्तोक की जागीर दी गई.

कश्मीर की हसीन वादियों में बसा लद्दाख एक बहुत ही शांत क्षेत्र है. पर्यटन के लिहाज़ से भी ये किसी से कम नहीं है. लद्दाख भले ही जम्म-कश्मीर में हो, लेकिन यहां की संस्कृति कश्मीर घाटी से बिलकुल अलग है. अगर आप लद्दाख जाने का प्लान बना रहे हैं तो आपको भी वहां की संस्कृति और रीति-रिवाज़ों के बारे में पहले से जान लेना बेहतर होगा. ये वहां घूमने और वहां के लोगों को समझने में आपके बहुत काम आएगा.

यहां के लोग अपने कल्चर से बहुत ही प्यार करते हैं. चाहे डेली रूटीन हो या फिर कोई फ़ेस्टिवल ये अपनी परंपरा को निभाने से पीछे नहीं हटते. यहां के अधिकतर लोग खेती करते हैं. हां कुछ लोग हैं जो टूरिज़्म के ज़रिये भी अब पैसे कमाने लगे हैं. इसके अलावा यहां भेड़ चराना यानी चरवाहे का काम भी अधिकतर लोग करते दिखाई दे जाएंगे.

-Ladakh Festival -Tak-Tok Festival


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ये सफ़र है सुहाना डल झील श्रीनगर | Dal Lake Shrinagar J&K

Please watch: जीव विज्ञान के 20 महत्वपूर्ण प्रश्न जो हर परीक्षा में पूछे जाते है | Imp 20 Question of Biology
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यह वीडियो डल झील श्रीनगर का है | भारत की खूबसूरत झीलों में से एक है | इस विडिओ में हमने झील का एक चक्कर लगाया है |
#jaisalmerdarshan

Dal jheel srinagar,डल झील श्रीनगर की कुछ झलकियां

Dosto Is video mein Srinagar Dal Jheel Ki Kuch video footage aapko Main dikha Raha Hoon. Mere dwara 2015 Mein Srinagar Yatra ki gayi thi us samay camera itna better nahi tha isliye footage Puri tarah stable Nahi Hai Phir Bhi Mane Kafi koshish ki hai Ki better video aap dekh Sake is video mein aapko Dal jheel ki puri sundarta, shikare aur kuch Any jaankari Karenge

Srinagar में जम गई डल झील, माइनस में पहुंचा तापमान | News@7 | ABP News Hindi

नए साल के मौके पर लोग जश्न मनाने पहाड़ी इलाकों में पहुंचे हुए हैं. लेकिन हाल ये है कि इस ठंडी में मैदान ने पहाड़ को भी पीछे छोड़ दिया है. दिल्ली में तो सौ साल का रिकॉर्ड टूट चुका है. पहाड़ी इलाकों में मौसम कैसे नए साल के जश्न को ठंडा करने में लगा है. लद्दाख में सब बर्फ से ढक गए हैं. तापमान माइनस 20 से 30 डिग्री के बीच हिचकोले खा रहा है और अब ये नदी पूरी तरह से बर्फ बन गई है.

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