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हिमाचल के एक ऐसा ही सुंदर जिला है लाहौल स्पीति।(देखिये कैसे जीते हैं लोग) । समस्या और संघर्ष।

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हिमाचल के एक ऐसा ही सुंदर जिला है लाहौल स्पीति।(देखिये कैसे जीते हैं लोग) । समस्या और संघर्ष।

हिमाचल प्रदेश का एक सुदूर जिला है, जो लाहौल और सपीति घाटियों से मिलकर बना है। इस क्षेत्र को बर्फीला रेगिस्तान भी कहा जाता है। साहसिक पर्यटन के लिए यह क्षेत्र विस्व भर में प्रसिद्ध है। जिले का मुख्यालय केलांग है। हिमाचल प्रदेश के दो पूर्व जिलों लाहौल और स्पीति के विलयोपरांत, अब लाहौल और स्पीति एक जिला है। विलय के पूर्व लाहौल का मुख्यालय करदंग और स्पीति का मुख्यालय दनकर था। मनु को इस क्षेत्र का प्राचीन शक्षक बताया गया है|

लाहौल-स्पीति की खूबसूरत घाटी को पालने पोसने का काम करती है स्पीति नदी जो हिमालय के कुनजुम रेंज से निकलती है और लाहौल और स्पीति को 2 हिस्सों में बांटती है। चूंकि हिमाचल प्रदेश का यह हिस्सा ठंडे रेगिस्तान जैसा है और यहां बारिश न के बराबर होती है लिहाजा इस नदी को बारिश का पानी बिलकुल नहीं मिलता है और इस नदी का पानी ग्लेशियर से पिघलने वाले पानी पर ही निर्भर है। इस इलाके में ज्यादातर इंसानी बसावट स्पीति नदी के किनारे ही स्थित है।

लाहौल-स्पीति एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है, इसलिए यहां अलग-अलग प्रकार के खानपान का लुत्फ ले सकते हैं। स्पीति का खानपान व रहन-सहन लद्दाख व तिब्बत से मिलता-जुलता है। अधिकांश रेस्तरांओं में भारतीय भोजन दाल-चावल व रोटी-सब्जी भी मिलती है। स्पीति घाटी का स्कयू, फैमर, शूनाली पर्यटकों में काफी लोकप्रिय है। ये थुपका व मोमोज की तर्ज पर ही बनाए जाते हैं। चूंकि ये स्थानीय हैं, इसलिए स्वाद में अलग होते हैं। यदि आप मांसाहारी व्यंजनों के शौकीन हैं, तो इस लिहाज से यह स्थान आपको खासा पसंद आएगा। दरअसल, बर्फीला क्षेत्र होने के कारण मांसाहारी भोजन की अधिकता है, जो तिब्बती अंदाज में ही तैयार किए जाते हैं। यहां आपको पारंपरिक व्यंजनों का आनंद लेना हो तो यहां खुले रेस्तरां का रुख करना चाहिए। काजा में खुले रेस्तरां खूब हैं।
मक्खन वाली चाय
याक के दूध की क्रीम से बनने वाली यहां की मक्खन वाली चाय जरूर चखें। इसका फ्लेवर बिलकुल ही अलग होता है। ये आमतौर में रेस्टोरेंट्स में नहीं मिलती पर यहां घरेलू खाने का अहम हिस्सा होती है। इसका रंग गुलाबी और स्वाद थोड़ा सा नमकीन होता है।
हिमाचल प्रदेश के लाहौल स्पीति और चंबा जिलों में कुछ स्थानों पर मौसम की पहली बर्फबारी ने मौसम विज्ञानियों को चौंका दिया है। मौसम विज्ञान विभाग ने सोमवार को यह जानकारी दी। अगस्त माह में आमतौर पर इन क्षेत्रों में बर्फबारी नहीं होती है।
जिले के एक अधिकारी ने बताया कि ताजा बर्फबारी के कारण चंबा से पंगी जाने वाली सड़क साच पास के पास बाधित हो गयी है। इस बीच, मौसम विज्ञान विभाग ने अगले 24 घंटों में राज्य के कुछ हिस्सों में बारिश जारी रहने का अनुमान व्यक्त किया है। शिमला मौसम केंद्र के निदेशक मनमोहन सिंह ने बताया कि अगले 24 घंटों में राज्य के अधिकतर स्थानों पर हल्की से मध्यम दर्जे की बारिश हो सकती है, वहीं दूर दराज के क्षेत्रों में तेज बारिश के आसार हैं। कई स्थानों पर भूस्खलन ने पानी का बहाव झरने तक जाना रोक दिया है और इससे उप मंडल के खादेतार गांव में एक बड़ी कृत्रिम झील निर्मित हो गई है। अधिकारियों ने बताया कि कांगड़ा जिले के त्रिन्दी, दानी, मिरका, लदोर, थाना, हिंदोरघाट, लेत्री और जसूर गांव के लोगों घरों को खाली करने को कहा गया है।
मुख्यालय: केलांग
भाषाएँ: भोटी,लहौली और हिन्दी
घाटियाँ -चंद्रा और भगा
चिनाब नदी लाहौल के बरलाचा से निकलती है
रोहतांग कर अर्थ है : लाशों का ढेर
लाहौल में तीन घाटियाँ है
चंद्रा घाटी, भागा घाटी और चंद्रभागा घाटी
चंद्रा घाटी को रंगोली भी कहा जाता है।
कोकसर इस घाटी का पहला गाँव है।
भागा घाटी को गारा कहा जाता है।
चंद्रभागा घाटी को पट्टन घाटी कहा जाता है|

स्पीति में पिन घाटी है।
स्पीति घाटी स्पीति नदी से बनती है।
किब्बर गाँव विश्व का सबसे ऊँचा गाँव है।
चंद्रा , भागा , स्पीति और पिन लाहौल की प्रमुख नदियाँ है।
लाहौल और भंगाल के बीच भंगाल दर्रा है।
लाहौल और जास्कर के बीच शिंगडकोन दर्रा है।
लाहौल और स्पीति को कुंजुम दर्रा जोड़ता है।
लाहौल को लद्दाख से बरलाचा दर्रा जोड़ता है।

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राज्य के कुल 12 जिलों में से 11 भारी बारिश की चपेट में हैं। भूस्खलन और सड़क बहने से प्रदेशभर में 9 नेशनल हाईवे समेत 877 सड़कें बंद हो गईं। राज्य में रविवार को 102.5 मिमी बारिश हुई। यह एक दिन में होने वाली औसत बारिश से 1065% ज्यादा है। रविवार को शिमला में सतलज नदी पर बना पुल बह गया।
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श्रीनगर की प्रसिद्ध डल झील परिचय कुछ रोचक तथ्य इतिहास।(देखिये कैसे जीते हैं लोग)। समस्या और संघर्ष।

श्रीनगर की प्रसिद्ध डल झील परिचय कुछ रोचक तथ्य इतिहास ।(देखिये कैसे जीते हैं लोग) । समस्या और संघर्ष ।

डल झील परिचय !!
• डल झील भौगोलिक दृश्य !!
• डल झील के कुछ रोचक तथ्य !!
• डल झील पहुंचने का मार्ग दर्शन !!
डल झील परिचय !!
दोस्तो नमस्कार , आज की आलेख में हम आपको डल झील से जुड़े इतिहास के पन्नों से अवगत करवाएंगे । डल झील भारत के श्रीनगर और कश्मीर इलाके में प्रसिद्ध झील है। इस झील का क्षेत्रफल तकरीबन 26 वर्ग किलोमीटर है अर्थात यह झील 26 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैली हुई है । सबसे आकर्षित करने वाला नजारा तो यह है कि यह झील तीन पहाड़ियों के संगम के ठीक बीच में बनी हुई है | ऐसे आकार के हिसाब से देखा जाए तो जम्मू कश्मीर की यह दूसरी सबसे बड़ी झील है इसके अंदर कश्मीर घाटी की बहुत सी झीले आकर सम्मिलित हो जाती है। डल झील के अंदर 4 प्रसिद्ध जलाशय है जिसमें से पहला गगरीबल, दूसरा लोकुट डल , तीसरा नागिन , और चौथा बोड डल है |
डल झील भौगोलिक दृश्य !!
लोकुट डल झील की बात करें तो यह झील रुपलंक द्वीप के चारों ओर स्थित है । दुनिया की सबसे सुंदर झीलो इसको गिना जाता है। इसके साथ साथ इसकी खूबसूरती को चार चांद तब लग जाते हैं , जब नजदीक में बने हुए मंगल वाटिका से डल झील का सुंदर नजारा देखने को मिलता है। जम्मू कश्मीर के असली आकर्षण का केंद्र तो डल झील की है । यहां पर आने वाले लोग हाउसबोट का नजारा लेना बिल्कुल नहीं भूलते । आने वाले पर्यटक डल झील का आकर्षण और सौंदर्य हाउसबोट के माध्यम से सवारी करके लेते हैं । अगर आप दिल्ली जेल में घूमने जाए तो इसके साथ साथ आप नेहरू पार्क, कानुटुर खाना, चारचीनारी आदि द्वीपों तथा हज़रत बल की सैर करना बिल्कुल ना भूलें ।
डल झील के कुछ रोचक तथ्य !!
कश्मीर के बारे में जो सुनने को मिलता है कश्मीर उससे भी कहीं ज्यादा खूबसूरत है | किताबों में लिखा गया है कि कश्मीर धरती का स्वर्ग है| पर अगर आप यहां पर जाएंगे तो आपको यह जगह स्वर्ग से भी बढ़कर लगेगी। दिल्ली झील को श्रीनगर का गहना और कश्मीर के मुकुट के नाम से भी जानते हैं| डल झील यहां की दूसरी लोकप्रिय झील है और इससे पहले वाली झील का नाम दिल्ली झील है । डल झील की सबसे ज्यादा खास बात तो यह है कि यहां पर जलाशयों के बीच में छोटे-छोटे द्वीप बने हुए हैं
डल झील का सबसे ज्यादा आकर्षण करने वाला नजारा हाउसबोट का होता है। जम्मू कश्मीर की लोकल भाषा के अंदर हाउसबोट को शिकारा भी कहा जाता है। यहां पर शिकारे के माध्यम से आप यहां के प्रमुख तीर्थ स्थलों की यात्रा आरामदायक तथा संतुष्ट होकर कर सकते हैं | यहां पर सबसे मुख्य तौर पर होने वाला काम झील में से मछलियों को पकड़ना है। अगर आप यहां पर कोई शॉपिंग करना चाहते हैं तो आपको शिकारे से शॉपिंग करनी पड़ेगी । क्योंकि यहां पर सभी दुकानें शिकारे में बनी हुई होती हैं | आप यहां पर शॉपिंग के अलावा एक रोमांचित कर देने वाले अनुभव को भी महसूस करेंगे।
डल झील पहुंचने का मार्ग दर्शन !!
अगर आप जम्मू कश्मीर में स्थिति डल झील पर घूमने जाना चाहते हैं तो आपको सबसे पहले श्रीनगर जिले में जाना पड़ेगा। वहां से तकरीबन 25 किलोमीटर दूरी पर स्थित बड़गांव जिले में एयरपोर्ट बना हुआ है वहां पर जाना होगा । इसके अलावा अपने सदीक में बनी रेल सेवा जम्मू मैं भी जा सकते हैं और वहां का जो नेशनल हाईवे NH01 कश्मीर की घाटियों को देश के अतिरिक्त अन्य भागों से भी जोड़ता है तथा आप इन्हें पहाड़ी इलाकों के माध्यम से यात्रा करके तकरीबन 10 से 12 घंटे में डल झील पहुंच सकते है
हमें आशा है कि हमारे द्वारा दी गई जानकारी से आप संतुष्ट होंगे । अगर आप हमारे लिए गए आलेख में कोई गलती पाते हैं। तो हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं ताकि हम आगे आने वाले आलेख के अंदर आपको ओर अच्छी जानकारी से अवगत करवा सकें।
Jammu Kashmir Massive Cleaning Drive Begins At Dal Lake - एक बार फिर चमकेगी डल झील, खूबसूरती के लिए उठाया जा रहा है ये कदम | डल झील खो रही अपना आकर्षण, करोड़ों खर्च करने के बाद भी हालात बदतर | जम्मू-कश्मीर सरकार ने श्रीनगर की प्रसिद्ध डल झील और उसके आसपास के क्षेत्रों को पारिस्थितकी के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्र (इको जोन) घोषित करने के लिए एक दस सदस्यीय समिति बनाई है।
नवंबर में जम्मू कश्मीर प्रशासन ने झील के सिकुड़ते आकार पर चिंताओं के बाद डल झील और उसके आसपास के क्षेत्रों को पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने के लिए एक 10 सदस्यीय समिति का गठन किया था।अधिकारियों की समिति ने बुधवार को झील और उसके आसपास के क्षेत्र को ईएसजेड घोषित करने के लिए मसौदा अधिसूचना की समीक्षा की।

ड्रेजिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के 2017 के आकलन के अनुसार प्रदूषण और अतिक्रमण के परिणामस्वरूप डल झील 22 वर्ग किलोमीटर के अपने मूल क्षेत्र से सिकुड़कर लगभग 10 वर्ग किलोमीटर हो गई है। डीसीआई के आकलन में यह भी पाया गया है कि अनुपचारित सीवेज और झील में बहने वाले ठोस अपशिष्ट पदार्थों, जल चैनलों और अतिक्रमणों के अतिक्रमण से तीव्र प्रदूषण ने झील में परिसंचरण और प्रवाह को कम कर दिया है, जिससे जल जलकुंभी का व्यापक विकास हुआ है।

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Let's talk about Lahaul

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In this vlog I'm off to Lahaul, to the village where my Mum grew up in Tinnan Valley, and then to where my Grandmum grew up in Upper Keylong.
Summer time in Lahaul, the lush green countryside and the ginormous mountains that tower over you - there's nothing more beautiful!

Created by: Ronnie & Barty
Music: Rohan Thakur


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Sangla, Kalpa, Chitkul Tour | Kinnaur Tour Guide | Places to visit in Kinnaur and Spiti Valley

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Kinnaur Tour Guide
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Kinnaur valley is one of the 12 districts of Himachal Pradesh which is known for its ethereal as well as rustic beauty. The place is surrounded by majestic mountains, picturesque small hamlets, beautiful meadows, thick dense forests, and adventurous roads. Apart from the scenic beauty, you can enjoy adventure sports like trekking and skiing at Kinnaur.
Here is a complete tour plan of this beautiful valley.

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Lahaul - Tribes of Himachal Pradesh

Lahaul - Tribes of Himachal Pradesh, A Documentary Movie prepared by NSTFDC, New Delhi, Source: tribal.nic.in/repository

लाहौल और स्पीति घाटी, (Lahaul And Spiti) हिमाचल प्रदेश, कितना मेंहनत और संघर्षपूर्ण हैं जीना यहाँ।

लाहौल और स्पीति घाटी (Lahaul And Spiti) - हिमाचल प्रदेश, कितना मेंहनत और संघर्षपूर्ण हैं जीना यहाँ। देखते हैं।

हिमाचल प्रदेश के भारतीय राज्य में लाहौल-स्पीति का जिला, लाहौल और स्पीति के दो पूर्व में अलग-अलग जिलों के होते हैं।

वर्तमान प्रशासनिक केंद्र लाहौल में कीलंग है। दो जिलों को विलय करने से पहले, कराडंग लाहौल की राजधानी थी, और स्पीति की राजधानी धनकर 1 9 60 में जिला का गठन किया गया था और भारत का चौथा सबसे कम जनसंख्या वाला जिला (640 में से) है।
कुनुज़म ला या कुंजम पास (ऊंचाई 4,551 मीटर (14, 9 31 फीट)) लाहौल से स्पीति घाटी तक प्रवेश द्वार है। यह चंद्र ताल से 21 किमी (13 मील) है यह जिला रोहतांग पास से मनाली से जुड़ा हुआ है दक्षिण में, स्पीति तोमो से 24 किमी (15 मील) की दूरी पर, सुम्दो में, जहां सड़क किन्नौर में प्रवेश करती है और राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 22
अब लाहौल और स्पीति, जो हिमाचल प्रदेश का एक जिला है,

लाहौल और स्पीति भारतीय राज्य हिमाचल प्रदेश का एक जिला है। जिले का मुख्यालय केलांग है। हिमाचल प्रदेश के दो पूर्व जिलों लाहौल और स्पीति के विलयोपरांत, अब लाहौल और स्पीति एक जिला है। विलय के पूर्व लाहौल का मुख्यालय करदंग और स्पीति का मुख्यालय दनकर था।
क्षेत्रफल - 12210 वर्ग कि॰मी॰
जनसंख्या - 33224 (2001 जनगणना)
साक्षरता - 73.1%
एस.टी.डी (STD) कोड - 91-01900
जिलाधिकारी - (सितम्बर 2006 में)
समुद्र तल से ऊंचाई - 10050 फुट
अक्षांश - उत्तर
देशांतर - पूर्व

लाहौल और स्पीति अपनी ऊंची पर्वतमाला के कारण शेष दुनिया से कटा हुआ है। रोहतांग दर्रा 3,978 मी की ऊंचाई पर लाहौल और स्पीति को कुल्लू घाटी से पृथक् करता है। जिले़ की पूर्वी सीमा तिब्बत से मिलती है, उत्तर में लद्दाख भू-भाग (जम्मू और कश्मीर में स्थित) और किन्नौर एवं कुल्लू दक्षिण सीमा में हैं।

अपनी ऊंचाई के कारण लाहौल और स्पीति में सर्दियों में बहुत ठंड होती है। गर्मियों में मौसम बहुत सुहावना होता है। शीतकाल में ठंड के कारण यहां बिजली व यातायात की बेहद कमी हो जाती है जिस कारण यहां पर्यटन में भारी कमी हो जाती है। हालांकि स्पीति पूरे साल शिमला से काज़ा पुराने भारत-तिब्ब्त के रास्ते से अभिगम्य होता है। उधर लाहौल जून तक अभिगम्य नहीं होता परन्तु दिसम्बर से अप्रैल के बीच साप्ताहिक हेलिकॉप्टर सेवाएं उपलब्ध रहती हैं।

स्पीति की अत्याधिक शीत के कारण यहां टुन्ड्रा पेड़-पौधे तक नहीं पनप पाते और सारा इलाका बंजर रहता है। स्पीति की सबसे निचली घाटी में गर्मियों में भी तापमान २० डिग्री के उपर नहीं पहुंचता।

लाहौल की कठिन परिस्थितियों के कारण केवल कुछ कड़ी घास एवं झाड़ियां ही यहाँ उग पाती हैं, वो भी ४००० मीटर के नीचे। ५००० मीटर के उपर हिमनद रेखाएं पाई जाती
कुंजुम पास इस जिले का एक महत्वपूर्ण स्थान है। इस पास के द्वारा स्पीती घाटी में दाखिल होया जाता है। कुंजुम पास का नाम यहाँ पर कुंजुम माता के नाम पर पड़ा है। यह मन जाता है की जिसका मन सच्चा होता है माता उसका हाथ से चिपका हुआ सिक्का माता की मुर्ति में चिपक जाता है। अतः इसकी कारण यहाँ पर श्रद्धालु अपनी आस्था को प्रकट करने क लिए माता की मूर्ति पर सिक्के चिपकाने का प्रयास करते हैं। कुंजुम पास के पास चन्द्र ताल है जोकि राष्ट्रीय राजमार्ग 22 पर स्थित है।

लाहौल –स्पीति — हिमाचल प्रदेश का जिला

स्पीति घाटी का एक छोटा-सा गांव है ग्यू जहां मुश्किल एक दर्जन घर होंगें। ये जगह भिक्षु सांघा तेजिंग के मम्मी के रूप में प्रसिद्ध है। भारत में से एकमात्र ऐसा स्थान है जो प्राकृतिक मम्मी के लिए मशहूर है। माना जाता है कि इस भिक्षु ने अपने गांव को बिच्छुओं के कहर से बचाने के लिए बहुत बड़ा त्याग दिया था। गांव वासियों का मानना है कि जब सांघा तेंजिंग ने अपने शरीर का त्याग किया था तब यहां एक इंद्रधनुष बना जा जिसके बाद गांच को बिच्छुओं से मुक्ति मिली थी।

The Lahaul and Spiti district in the Indian state of Himachal Pradesh consists of the two formerly separate districts of Lahaul and Spiti. The present administrative centre is Keylong in Lahaul. Before the two districts were merged, Kardang was the capital of Lahaul, and Dhankar the capital of Spiti. The district was formed in 1960, and is the fourth least populous district in India (out of 640).

Delhi to Lahaul Valley
this access route leads via Karnal - Shahabad - Pinjore - Swarghat - Bilaspur - Mandi - Kullu ( 560 km. ) then from Manali - Keylong (via) Rohtang Pass - Gramphoo - Tandi (115 km).

Delhi to Spiti Valley
this access route leads via Sonipat - Karnal - Kurukshetra - Ambala - Chandigarh - Solan - Shimla- Tabo.

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चंबल का बीहड़ कैसे बने उपजाऊ,लोगो का संघर्ष और जीवन (देखिये कैसे जीते हैं लोग) ।समस्या।

चंबल की घाटियां कभी डाकुओं के गिरोहों से त्रस्त थीं। डकैतों के समर्पण के गांधीवादी तरीकों के सफल प्रयासों के बाद चंबल क्षेत्र को डाकुओं के आतंक से तो राहत मिली, पर बीहड़ों की समस्या जस की तस बनी रही। नदियों द्वारा भूमि कटान से वहां बहुत-सी कृषि व चरागाह की भूमि बीहड़ों में परिवर्तित होती रही है, जिससे आम लोगों की आजीविका का संकट बढ़ता गया। मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में ही चंबल, क्वारी, आसन, सिंध जैसी नदियों के बहाव में भूमि के कटाव की प्रवृत्ति अधिक है। इससे न केवल ऊपर की उपजाऊ मिट्टी का कटाव होता है, बल्कि बीहड़ भी बनते चले जाते हैं। इसका सामना करने के लिए भी ‘महात्मा गांधी सेवा आश्रम, जौरा’ ने प्रयास किए हैं। वहां के प्रमुख प्रेरणा स्रोत विख्यात गांधीवादी कार्यकर्ता एसएन सुब्बराव ‘भाई जी’ रहे हैं, जिन्होंने ‘राष्ट्रीय सेवा योजना’ (एनएसएस) के कैंप आयोजित कर सैकड़ों युवाओं का श्रमदान बीहड़ों को समतल करने, .

अब इस काम को फिर से बड़े पैमाने पर आरंभ करने का समय आ गया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि क्षेत्र के युवाओं में बेरोजगारी से बढ़ती बेचैनी कम करने के लिए भी इस कार्य का उपयोग हो सकता है। बीहड़ प्रभावित भूमि को सुधार कर इसे युवाओं को रासायनिक खादों, कीटनाशकों और दवाओं से मुक्त जैविक या पर्यावरण की रक्षा करने वाली खेती के लिए दिया जा सकता है। वहां की एक अन्य समस्या यह है कि खेती में रासायनिक खाद व कीटनाशकों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है।
भारत में पानी से मृदा का कटाव, भूमि ह्रास के सबसे महत्त्वपूर्ण कारणों में से एक है। केवल भारत में लगभग 3.61 करोड़ हेक्टेयर भूमि पानी द्वारा कटाव से प्रभावित है। इस श्रेणी में सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश हैं। मध्य भारत में चम्बल घाटी देश के सबसे प्रभावित क्षेत्रों में से है। चम्बल मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में कटाव से प्रभावित क्षेत्र है, जिसे आमतौर पर घाटी के रूप में जाना जाता है। चम्बल यमुना नदी की एक महत्त्वपूर्ण सहायक नदी चम्बल नदी के किनारे स्थित है।

स्थानीय रूप से बीहड़ के नाम से प्रचलित चम्बल घाटी भारत का सबसे निम्नीकृत भूखण्ड है। चम्बल के बीहड़ में बड़े नाले और अत्यधिक विच्छेदित घाटी शामिल है। यह क्षेत्र अपने कमतर विकास और उच्च अपराध दर के लिये जाना जाता है।

चम्बल नदी घाटी का लगभग 4,800 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र इस बीहड़ के अन्तर्गत आता है जिसका विकास मुख्य रूप से चम्बल नदी के दोनों किनारों पर हुआ है, जो इस इलाके की जीवनरेखा है। चम्बल के किनारे पर घाटी का गठन काफी सघन है जिसका 5 से 6 किमी का क्षेत्र गहरे नालों के जा

50 हजार बीघा बीहड़ में अब हो रही है खेती
-मध्यप्रदेश में महू, उज्जैन, भिंड, मुरैना, श्योपुर से गुजरती है चंबल नदी।
-चंबल संभाग के करीब 50 हजार बीघा बीहड़ में अब हो रही है खेती।
-सरसों, बाजरा, तिल, अरहर और सब्जियों की खेती करते हैं किसान।
वैज्ञानिकों ने यहां खेती की संभावनाएं तलाशी
खेती की संभावना तलाशने के लिए मंगलवार को कृषि वैज्ञानिकों का एक दल ग्राम पावई क्षेत्र के बीहडों में पहुंचा। वैज्ञानिकों ने यहां खेती की संभावनाएं तलाशी। साथ ही, कहा कि बीहड़ की जमीन को उपजाऊ बनाया जा सकता है। यहां खेती की अपार संभावनाएं हैं। वैज्ञानिकों ने बीहड़ की भूमि में होने वाली फसल नींबू, बेर, संतरा, मौसम्मी, पपीता आदि की खेती का भी अध्ययन किया। उन्होंने कृषि वन, उद्यानिकी, पशु पालन के लिए किए जाने वाले प्रयोगों का आकलन किया। दल में जर्मनी के डाॅ ऐलरिच, स्विटजरलैंड के वैज्ञानिक डाॅ. एसके गुप्ता शामिल थे।
केंद्र 900 व प्रदेश 200 करोड़ देगा
इस दौरान सांसद डाॅ. भागीरथ प्रसाद ने कहा कि बीहड़ों के सुदृढ़ीकरण और फसलों की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए 1100 करोड़ रुपए स्वीकृत किए जाएंगे। इसमें 200 करोड़ रुपए मप्र सरकार और 900 करोड़ रुपए केन्द्र सरकार द्वारा वर्ल्ड बैंक के सहयोग से देगी।

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मध्य प्रदेश के श्योपुर और मुरैना के बीहड़ों को लैंडस्केप कन्जर्वेशन के मॉडल के तौर पर देखा जाता है। अब केंद्र सरकार के ग्रीन अग्रीकल्चर प्रॉजेक्ट के तहत इस इलाके को विकसित किया जाएगा।
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लेह-लद्दाख के लोगो का संघर्ष ,(The Wonderful Hard Working People of Leh - Ladakh) । Short Film in 4K

भारत एक ऐसा देश है, जहां विभिन्न क्षेत्र, विभिन्न आबोहवा अपने में समेटे हुए रहते हैं।

लद्दाख का इतिहास दो हज़ार साल से भी ज़्यादा पुराना है और भूगोल के हिसाब से हिमालय व काराकोरम पर्वत शृंखला के बीच बसे इस भूभाग पर समय समय पर ताकतवर रहे तमाम देशों की नज़र रही है. बहुत पुरानी बात न करते हुए ये जानिए कि 17वीं सदी के अंत में तिब्बत के साथ विवाद के चलते लद्दाख ने खुद को भूटान के साथ जोड़ा था. फिर कश्मीर के डोगरा वंश के शासकों ने लद्दाख को 19वीं सदी में हासिल किया. तिब्बत, भूटान, चीन, बाल्टिस्तान और कश्मीर के साथ कई संघर्ष के बाद 19वीं सदी से लद्दाख कश्मीर का ही हिस्सा रहा.


गुजरात का कच्छ व राजस्थान रेत में भी चटख रंगों की सुन्दरता समेटे है, तो केरल हरियाली और झरने। सिक्किम, उत्तराखंड बर्फ के साथ खूबसूरत फूलों से आपका स्वागत करता है, तो गोवा समुद्री लहरों व उन्हीं के समान थिरकते जिस्मों से। कोई क्षेत्र भारतमाता को बर्फ का ताज पहनाता है, सागर से उसके चरण पखारता है यानी हर क्षेत्र का अपना-अपना अलग रंग, अपनी सुंदरता। अनेकता में एकता को चरितार्थ करते अपनी मातृभूमि पर गर्व का अनुभव करते देश के विभिन्न राज्यों को देखने का अवसर प्राप्त हुआ। लेकिन पहली बार मालूम हुआ कि सिर्फ समुद्र तट को छोड़ दें तो बर्फीली घाटियों से ढंके पहाड़, हरियाली चुनर जैसे सिर से खींच ली हो, ऐसे भूरे, बंजर, पत्थरों से पटी विशाल पर्वत श्रृंखलाएं, हजारों फीट की ऊंचाई वाले पर्वतों के बीच बेहद खूबसूरत घाटियां, कल-कल बहते ठंडे पहाड़ी झरने, कांच की तरह साफ व मटमैली भी, दोनों तरह की नदियां, किसी रेगिस्तान की तरह बिछी रेत, पठार और उस पठार में खूबसूरत झील। कुदरत की खूबसूरत कारीगरी... ये सारी चकित कर देने वाली सुंदरता एक जगह थी। जी हां...! अद्भुत... अविस्मरणीय... अप्रतिम... सौंदर्य से भरपूर... इतनी सारी विविधता अपने विशाल आंचल में समेटे ये क्षेत्र था लेह।

जम्मू-कश्मीर के लद्दाख जिले में आने वाली जगह लेह...! 3 किलोमीटर प्रति व्यक्ति के हिसाब से जनसंख्या घनत्व वाला लेह...! 25,321 स्क्वेयर किमी क्षेत्रफल वाला लेह...! समुद्री सतह से 11,300 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।

वैसे तो लेह-लद्दाख देशी कम, विदेशी सैलानियों की सूची की पसंदीदा जगहों में सबसे ऊपर है, लेकिन भला हो बॉलीवुड का, जिसने कुछ फिल्मों की शूटिंग यहां करके इसे और लोकप्रिय बना दिया।

जब लेह-लद्दाख का प्रोग्राम बना तो दिल्ली से लेह की फ्लाइट थी। (हालांकि बाद में लगा कि मनाली या श्रीनगर आकर वहां से सड़क मार्ग से आना ज्यादा आनंददायक रहता)। खैर... जानकारों के अनुसार यहां जुलाई में आना चाहिए, क्योंकि तब तक काफी बर्फ पिघल जाती है और बर्फ के अलावा वो सारा सौंदर्य आप देख सकते हैं, जो मैंने ऊपर वर्णित किया है।
यहां के अधिकतर त्योहार फसलों और धर्म से संबंधित हैं.

लद्दाख के शासक रहे नामज्ञाल वंश को स्तोक की जागीर दी गई.

कश्मीर की हसीन वादियों में बसा लद्दाख एक बहुत ही शांत क्षेत्र है. पर्यटन के लिहाज़ से भी ये किसी से कम नहीं है. लद्दाख भले ही जम्म-कश्मीर में हो, लेकिन यहां की संस्कृति कश्मीर घाटी से बिलकुल अलग है. अगर आप लद्दाख जाने का प्लान बना रहे हैं तो आपको भी वहां की संस्कृति और रीति-रिवाज़ों के बारे में पहले से जान लेना बेहतर होगा. ये वहां घूमने और वहां के लोगों को समझने में आपके बहुत काम आएगा.

यहां के लोग अपने कल्चर से बहुत ही प्यार करते हैं. चाहे डेली रूटीन हो या फिर कोई फ़ेस्टिवल ये अपनी परंपरा को निभाने से पीछे नहीं हटते. यहां के अधिकतर लोग खेती करते हैं. हां कुछ लोग हैं जो टूरिज़्म के ज़रिये भी अब पैसे कमाने लगे हैं. इसके अलावा यहां भेड़ चराना यानी चरवाहे का काम भी अधिकतर लोग करते दिखाई दे जाएंगे.

-Ladakh Festival -Tak-Tok Festival


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राजस्थान बढ़ रहा भयानक भूजल संकट की ओर, खत्म हो सकता है पानी (देखिये कैसे जीते हैं लोग)।अकाल,सूखा।

झीलों के क्षेत्र के नाम प्रसिद्ध और खुद पीएचईडी मंत्री किरण माहेश्वरी के उदयपुर संभाग के गांव प्रदेश में सबसे ज्यादा प्यासे हैं। मंत्री का विधानसभा क्षेत्र राजसमंद कम्पलीट डार्क जोन घोषित हो चुका है, जबकि जहां उनका निवास स्थान है उस गृह जिले उदयपुर में 2498 गांव सूखे और जल संकट से जूझ रहे हैं। - संभाग के बांसवाड़ा के 1154 गांव, राजसमंद के 1063, डूंगरपुर के 988, प्रतापगढ़ के 827 और चित्तौडगढ के 94 गांवों में जल आपातकाल की स्थित बन गई है।
- हालात ये हैं कि मेवाड़ के कई गांवों में पीएचईडी विभाग पानी के टैंकर तक नहीं पहुंचा पाता है। - कई गांवों में तो पानी के लिए ग्रामीणों को 3 से 4 किमी दूर कुएं में उतरकर पानी लाना पड़ता है। - गर्मी बढ़ने के साथ इन गांवों में स्थिति और भयावह हो सकती है।
पानी के लिए 50 फीट गहरे कुओं में जोखिम में जान
- कातनवाड़ा पंचायत के सुमावत, मनावत, मेरावत, कनात, धयात, भाडला, निचला फला, वडाई और वातडा़ फलों में जलसंकट है।
- महिलाएं पचास फीट गहरे दो कुओं में जान जोखिम में डालकर पानी निकालती हैं।
- नीचे उतरने के लिए पत्थर लगे हैं, लेकिन इन पर पैर रखने जितनी जगह भी नहीं है।
- ऐसे हालात छह महीने से हैं। पंचायत में फ्लोराइडयुक्त पानी होने से जयसमंद से जोड़कर दो टंकियां बनवा रखी हैं।
- आठ साल पहले बनी एक टंकी अब तक एक बार भी नहीं भरी। दूसरी टंकी एक महीने से नाकारा पड़ी है।
सूखे नाले में वेरी, ये ही पानी पीते हैं इंसान और मवेशी
महाद पंचायत में पावटी फला (सूरा) में हैंडपंप तक नहीं है। ग्रामीणों ने नाले के पेटे में वेरी (गड्ढा) खोद रखा है। इंसान और मवेशी इसी से पानी पीते हैं। ऐसे हालात बरसों से हैं। ग्रामीण बताते हैं कि हैंडपंप के लिए कई बार जनप्रतिनिधियों से मिले, पर किसी ने पीड़ा नहीं सुनी। बेडाधर में कथौड़ी बस्ती के भी ये ही हाल हैं। हैंडपंप में जंग लगा पानी आता है। महिलाओं ने एक किमी दूर नदी पेटे में वेरी खोद रखी है। घंटों की मशक्कत के बाद एक घड़ा भरता है।
राज्य के 16 जिलों में राजसमंद-चित्तौड़गढ़ पूरी तरह डार्क जोन में
बाड़मेर, भीलवाड़ा, नागौर, भरतपुर, सवाई माधोपुर, धौलपुर, करौली, अलवर, दौसा, झुंझुनूं, जैसलमेर, जालौर, सिरोही, झालावाड़, चित्तौडगढ़, राजसमंद जिला कम्पलीट डार्क जोन घोषित हैं। उदयपुर जिले में बडग़ांव, भींडर, गोगुंदा, गिर्वा और मावली ब्लॉक डार्क जोन में हैं। डार्क जोन वे हैं, जहां 100 प्रतिशत से ज्यादा पानी तेजी से खपत हो रहा है। इसके अलावा लसाडिय़ा, झाड़ोल, खेरवाड़ा, कोटड़ा, सलूम्बर, सराड़ा ब्लॉक अतिसंवेदनशील श्रेणी में आ चुके हैं।
32 साल में यूं बढ़ी पानी की खपत
वर्ष 1984 में पूरे राजस्थान में भूजल विकास दर 35 प्रतिशत थी। जो आज बढ़कर 137 प्रतिशत गई है। 32 साल के दौरान खपत 132 प्रतिशत बढ़ गई है। 4500 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी निकलता था। आज 14 हजार 800 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी निकल रहा हैं।
यहां भयावह हालात
प्रतापगढ़ जिले के अरनोद कस्बे सहित उपखंड के दलोट, निनोर, सालमगढ़ में पेयजल के भयावह हालात है।

मौसम विभाग के आकड़ों के अनुसार प्रदेश के जयपुर, भीलवाड़ा, भरतपुर, धौलपुर, करौली, सवाई माधोपुर, अलवर, दौसा और प्रतापगढ़ में कम वर्षा होने के कारण इन जिलों में पानी की जबरदस्त किल्लत है।
किसानों की बर्बाद हुई फसलों में बाजरा, मूंग, मोठ, ग्वार और तिल प्रमुख हैं। बासनी हरिसिंह गांव एवं आसपास के सभी क्षेत्रों के किसान अपनी रही सही फसल काटने पर मजबूर हैं। किसानों का कहना है कि बारिश का इंतजार करते-करते फसलें सूख चुकी हैं। अब हम इन सूखी हुई फसलों को काटने को मजबूर हो रहे हैं।

किसानों का कहना है कि बारिश नहीं होने से अब ‘भागते भूत की लंगोटी भली’ के तहत सूखी फसलों की कटाई कर कुछ दिन पशुओं के चारे का इंतजाम किया जा रहा है। मारवाड़ में इस बार चारा, पानी और अनाज के नहीं होने से अकाल दस्तक दे चुका है। किसानों ने कहा कि यदि सरकार ने समय रहते किसानों की सहायता नहीं की तो स्थिति और भी विकट हो सकती है। कई गांवों में तालाब लगभग सूख चुके हैं और आने वाले समय में इन गांवों में पीने के पानी की भंयकर समस्या पैदा हो सकती है।
देश की एकमात्र मरूभूमि राजस्थान भूजल संकट के कगार पर है। राज्य में भूजल के 295 ब्लॉक में से 184 अतिदोहित श्रेणी में आ चुके हैं। मतलब आधे से ज्यादा राज्य में जमीनी पानी कभी भी समाप्त हो सकता है।

Rajasthan is facing a severe water crisis, with a decadal average study has inferring that there has been a decline in groundwater by 62.70% in the state with only 37.20% rise. ... The study was conducted by the Central Ground Water Board (CGWB) on 928 stations.

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हिमाचल के एक ऐसा ही सुंदर जिला है लाहौल स्पीति।देखिये कैसे जीते हैं लोग ।

हिमाचल प्रदेश का एक सुदूर जिला है, जो लाहौल और सपीति घाटियों से मिलकर बना है। इस क्षेत्र को बर्फीला रेगिस्तान भी कहा जाता है। साहसिक पर्यटन के लिए यह क्षेत्र विस्व भर में प्रसिद्ध है। जिले का मुख्यालय केलांग है। हिमाचल प्रदेश के दो पूर्व जिलों लाहौल और स्पीति के विलयोपरांत, अब लाहौल और स्पीति एक जिला है। विलय के पूर्व लाहौल का मुख्यालय करदंग और स्पीति का मुख्यालय दनकर था। मनु को इस क्षेत्र का प्राचीन शक्षक बताया गया है|

लाहौल-स्पीति की खूबसूरत घाटी को पालने पोसने का काम करती है स्पीति नदी जो हिमालय के कुनजुम रेंज से निकलती है और लाहौल और स्पीति को 2 हिस्सों में बांटती है। चूंकि हिमाचल प्रदेश का यह हिस्सा ठंडे रेगिस्तान जैसा है और यहां बारिश न के बराबर होती है लिहाजा इस नदी को बारिश का पानी बिलकुल नहीं मिलता है और इस नदी का पानी ग्लेशियर से पिघलने वाले पानी पर ही निर्भर है। इस इलाके में ज्यादातर इंसानी बसावट स्पीति नदी के किनारे ही स्थित है।

लाहौल-स्पीति एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है, इसलिए यहां अलग-अलग प्रकार के खानपान का लुत्फ ले सकते हैं। स्पीति का खानपान व रहन-सहन लद्दाख व तिब्बत से मिलता-जुलता है। अधिकांश रेस्तरांओं में भारतीय भोजन दाल-चावल व रोटी-सब्जी भी मिलती है। स्पीति घाटी का स्कयू, फैमर, शूनाली पर्यटकों में काफी लोकप्रिय है। ये थुपका व मोमोज की तर्ज पर ही बनाए जाते हैं। चूंकि ये स्थानीय हैं, इसलिए स्वाद में अलग होते हैं। यदि आप मांसाहारी व्यंजनों के शौकीन हैं, तो इस लिहाज से यह स्थान आपको खासा पसंद आएगा। दरअसल, बर्फीला क्षेत्र होने के कारण मांसाहारी भोजन की अधिकता है, जो तिब्बती अंदाज में ही तैयार किए जाते हैं। यहां आपको पारंपरिक व्यंजनों का आनंद लेना हो तो यहां खुले रेस्तरां का रुख करना चाहिए। काजा में खुले रेस्तरां खूब हैं।
मक्खन वाली चाय
याक के दूध की क्रीम से बनने वाली यहां की मक्खन वाली चाय जरूर चखें। इसका फ्लेवर बिलकुल ही अलग होता है। ये आमतौर में रेस्टोरेंट्स में नहीं मिलती पर यहां घरेलू खाने का अहम हिस्सा होती है। इसका रंग गुलाबी और स्वाद थोड़ा सा नमकीन होता है।
हिमाचल प्रदेश के लाहौल स्पीति और चंबा जिलों में कुछ स्थानों पर मौसम की पहली बर्फबारी ने मौसम विज्ञानियों को चौंका दिया है। मौसम विज्ञान विभाग ने सोमवार को यह जानकारी दी। अगस्त माह में आमतौर पर इन क्षेत्रों में बर्फबारी नहीं होती है।
जिले के एक अधिकारी ने बताया कि ताजा बर्फबारी के कारण चंबा से पंगी जाने वाली सड़क साच पास के पास बाधित हो गयी है। इस बीच, मौसम विज्ञान विभाग ने अगले 24 घंटों में राज्य के कुछ हिस्सों में बारिश जारी रहने का अनुमान व्यक्त किया है। शिमला मौसम केंद्र के निदेशक मनमोहन सिंह ने बताया कि अगले 24 घंटों में राज्य के अधिकतर स्थानों पर हल्की से मध्यम दर्जे की बारिश हो सकती है, वहीं दूर दराज के क्षेत्रों में तेज बारिश के आसार हैं। कई स्थानों पर भूस्खलन ने पानी का बहाव झरने तक जाना रोक दिया है और इससे उप मंडल के खादेतार गांव में एक बड़ी कृत्रिम झील निर्मित हो गई है। अधिकारियों ने बताया कि कांगड़ा जिले के त्रिन्दी, दानी, मिरका, लदोर, थाना, हिंदोरघाट, लेत्री और जसूर गांव के लोगों घरों को खाली करने को कहा गया है।
मुख्यालय: केलांग
भाषाएँ: भोटी,लहौली और हिन्दी
घाटियाँ -चंद्रा और भगा
चिनाब नदी लाहौल के बरलाचा से निकलती है
रोहतांग कर अर्थ है : लाशों का ढेर
लाहौल में तीन घाटियाँ है
चंद्रा घाटी, भागा घाटी और चंद्रभागा घाटी
चंद्रा घाटी को रंगोली भी कहा जाता है।
कोकसर इस घाटी का पहला गाँव है।
भागा घाटी को गारा कहा जाता है।
चंद्रभागा घाटी को पट्टन घाटी कहा जाता है|

स्पीति में पिन घाटी है।
स्पीति घाटी स्पीति नदी से बनती है।
किब्बर गाँव विश्व का सबसे ऊँचा गाँव है।
चंद्रा , भागा , स्पीति और पिन लाहौल की प्रमुख नदियाँ है।
लाहौल और भंगाल के बीच भंगाल दर्रा है।
लाहौल और जास्कर के बीच शिंगडकोन दर्रा है।
लाहौल और स्पीति को कुंजुम दर्रा जोड़ता है।
लाहौल को लद्दाख से बरलाचा दर्रा जोड़ता है।

#लाहौलस्पीतिसमस्याऔरसंघर्ष #लाहौल-स्‍पीति

Spiti Valley #TravelVlog 2019 Tribute | Maahi Ve | Alia Bhatt | Highway | Ameya Mandlik

Hey Guys!! So finally this is the travel vlog tribute to Spiti Valley. Spiti Valley is one of the best places that I have traveled. Untouched, unexplored and offbeat. You will be out of network for a very long time still you would want to stay that way amidst the nature. This travel Tribute video is the compilation of total 9 days and 8 nights of our journey. Detailed Vlog playlist is shared below. Please check it out as we had traveled the full and complete Spiti Valley Circuit from Chandigarh to Chandigarh.

WE first started off from Chandigarh to Shimla took a night halt at Kufri. Then we went from Kufri to Chitkul - Last village on India-Tibet Border and took a night halt at Raksham. Next day we traveled from Raksham to Nako via Sangla and Kalpa. Further we headed to Kaza the next day. Then visited the nearby places like Langza, Ki, Kibber, also visited the worlds highest village at Komic, worlds highest post office at Hikkim and worlds highest bridge which is Chicham Bridge in the same day and took a night stay at Kaza. Next day we traveled towards Pin Valley which is the heart of Spiti. Next day from Pin Valley we traveled straight away towards Chandratal Lake via Kumzum Pass. And next day via Rohtang Pass we reached Manali very Late. And finally ended our journey back at Chandigarh. This the the complete circuit that you can choose to travel.

Also, I couldn't think of any song more perfect than Highway! Maahi Ve is a fantastic composition that will leave you mesmerized, Irshad Kamil's lyrics are easy and meaningful while Rahman husky voice adds life to the original track.

Spiti Valley Travel Vlog :
Travel Tribute Videos :

Song Credits:
Song: Highway - Maahi Ve Unplugged Cover feat. Divij Naik
Artist: Divij Naik

Original Song Credits:
Song: Maahi Ve
Singer: A.R Rahman
Music: A.R Rahman
Lyrics: Irshad Kamil
Movie: Highway
Directed By: Imtiaz Ali
Starring: Alia Bhatt, Randeep Hooda and Others
Music Label: T-Series

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हिमाचल में हाड़ कपा वाली ठंड, लाहौल स्पीति और मनाली में माइनस में पारा

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Lahaul & Spiti Valley // स्पीति क्या है, कैसा है, कहाँ है // Geo India

????????लाहौल-स्पीति घाटी के विश्लेषण में आपका हार्दिक स्वागत है ????

????????नमस्कार मित्रों ????????
इस Vlog में हिमाचल प्रदेश के लाहौल और स्पीति को विश्लेषित किया गया है, जो हिमाचलमल का एक दुर्लभ भू-भाग है! इस video में लाहौल स्पीति में घूमने के लिए समय और स्थान को विशेष महत्व दिया गया है!
जो Tourist लाहौल-स्पीति घूमने जाते है, वो भी कुछ विशेष तथ्य से अंजान होते हैं, अतः इस Vlog में सभी प्रमुख बिंदुओं को Focus किया गया है, जो हिमालय प्रेमियों को काफी पसंद आएगा !
दोस्तो, यदि आपको ये vlog अच्छा लगे तो एक Like???????? और Share???? जरूर करे, साथ हो comment's✍???? करके अपनी प्रतिक्रिया भी दे..... आप मुझे Instagram पर follow भी कर सकते हैं, जिसका Link नीचे ???????? दिया गया है..


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Lahaul Spiti travel in 10 mins.

Kaza Circuit (Chandigarh - Shimla - Kaza - Manali - Chandigarh)
5 days tour
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देखें, लाहौल-स्पीति में दुनिया के सबसे ऊंचे आइस हॉकी रिंग में कैंप का आयोजन

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Ladakh India (लद्दाख के लोगो का जीवन और जमीनी हकीकत।) - हिंदी डाक्यूमेंट्री

Ladakh India (लद्दाख के लोगो का जीवन और जमीनी हकीकत।) - हिंदी डाक्यूमेंट्री

इसीलिए तो उनकी धरती को 'चांद की धरती' कहा जाता है, क्योंकि जहां लोगों के दिल चांद की तरह साफ हैं।

भारत एक ऐसा देश है, जहां विभिन्न क्षेत्र, विभिन्न आबोहवा अपने में समेटे हुए रहते हैं। गुजरात का कच्छ व राजस्थान रेत में भी चटख रंगों की सुन्दरता समेटे है, तो केरल हरियाली और झरने। सिक्किम, उत्तराखंड बर्फ के साथ खूबसूरत फूलों से आपका स्वागत करता है, तो गोवा समुद्री लहरों व उन्हीं के समान थिरकते जिस्मों से। कोई क्षेत्र भारतमाता को बर्फ का ताज पहनाता है, सागर से उसके चरण पखारता है यानी हर क्षेत्र का अपना-अपना अलग रंग, अपनी सुंदरता। अनेकता में एकता को चरितार्थ करते अपनी मातृभूमि पर गर्व का अनुभव करते देश के विभिन्न राज्यों को देखने का अवसर प्राप्त हुआ। लेकिन पहली बार मालूम हुआ कि सिर्फ समुद्र तट को छोड़ दें तो बर्फीली घाटियों से ढंके पहाड़, हरियाली चुनर जैसे सिर से खींच ली हो, ऐसे भूरे, बंजर, पत्थरों से पटी विशाल पर्वत श्रृंखलाएं, हजारों फीट की ऊंचाई वाले पर्वतों के बीच बेहद खूबसूरत घाटियां, कल-कल बहते ठंडे पहाड़ी झरने, कांच की तरह साफ व मटमैली भी, दोनों तरह की नदियां, किसी रेगिस्तान की तरह बिछी रेत, पठार और उस पठार में खूबसूरत झील। कुदरत की खूबसूरत कारीगरी... ये सारी चकित कर देने वाली सुंदरता एक जगह थी। जी हां...! अद्भुत... अविस्मरणीय... अप्रतिम... सौंदर्य से भरपूर... इतनी सारी विविधता अपने विशाल आंचल में समेटे ये क्षेत्र था लेह।

जम्मू-कश्मीर के लद्दाख जिले में आने वाली जगह लेह...! 3 किलोमीटर प्रति व्यक्ति के हिसाब से जनसंख्या घनत्व वाला लेह...! 25,321 स्क्वेयर किमी क्षेत्रफल वाला लेह...! समुद्री सतह से 11,300 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।

वैसे तो लेह-लद्दाख देशी कम, विदेशी सैलानियों की सूची की पसंदीदा जगहों में सबसे ऊपर है, लेकिन भला हो बॉलीवुड का, जिसने कुछ फिल्मों की शूटिंग यहां करके इसे और लोकप्रिय बना दिया।

खैर... जानकारों के अनुसार यहां जुलाई में आना चाहिए, क्योंकि तब तक काफी बर्फ पिघल जाती है और बर्फ के अलावा वो सारा सौंदर्य आप देख सकते हैं, जो मैंने ऊपर वर्णित किया है।

बर्फ से ढंकी ऊंची चोटियां, हिमनदी, रेत के टीले, चमकती सुबह के साथ घने बादल, दुनिया की सबसे ऊंची जगह पर स्थित लद्दाख का यह परिदृश्य है। लद्दाख उत्तर की तरफ से काराकोरम और दक्षिण की तरफ हिमालय से घिरा है। लगभग 9,000 से 25,170 फीट की ऊंचाई पर यह स्थान है।


कैसे जाएं?

वायुमार्ग : जम्मू, चंडीगढ़, दिल्ली, श्रीनगर से लेह के लिए इंडियन एयरलाइंस की सीधी उड़ानें हैं। लेह शहर में आपको टैक्सी, जीपें तथा जोंगा किराए पर लेना पड़ती है। ये स्थानीय ट्रांसपोर्ट तथा बाहरी क्षेत्रों में जाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।

रेलमार्ग : सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन जम्मू है, जो 690 किमी दूर है और जम्मू रेलवे स्टेशन देश के प्रत्येक भाग से रेल द्वारा जुड़ा हुआ है।

सड़क मार्ग : लेह तक पहुंचने के लिए जम्मू-श्रीनगर-लेह राष्ट्रीय राजमार्ग है जिसमें सबसे ऊंचा दर्रा 13,479 फुट की ऊंचाई पर फोतुला है। लेह से श्रीनगर 434 किमी, कारगिल 230 किमी तथा जम्मू 690 किमी दूर है।

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Avalanche hits Himachal Pradesh’s Lahaul & Spiti, हिमाचल के लाहौल स्पीति में बर्फीला तूफान

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उत्तराखंड के कॉर्बेट नेशनल पार्क के आस पास के गाँव कितना कठिन, संघर्षपूर्ण और खतरनाक हैं जीना यहां।

उत्तराखण्ड के जंगलों में इंसान का बढ़ता दखल खतरनाक है कोई जानवर किसी इंसान की जान का दुश्मन कब बनता है?
कॉर्बेट नेशनल पार्क हिमालय की शिवालिक पर्वत श्रृंखला की तलहटी में स्थित है,

मनुष्य और वन्यजीव के बीच सदियों से संघर्ष रहा है. इस संघर्ष को वर्तमान परिपेक्ष्य में कैसे देखें? कोई जानवर किसी इंसान की जान का दुश्मन कब बनता है? या यूं कहें कि परस्परतापूर्ण संचालित जीवन कैसे एक-दूसरे की बलि लेने पर आमादा हो जाता है? इस महत्वपूर्ण सवाल को समझने की आवश्यकता है. यदि आधुनिक विकास को कुछ हद तक जिम्मेदार मान भी लें तो यह गुत्थी सुलझने वाली नहीं है. बदलते मौसम पर भी ठीकरा फोड़ दें, तब भी मानव और वन्य जीवों के संघर्ष की गाथा को समझना आसान नहीं होगा. किसी के जीवन, परिवार और आश्रय में बाहरी दखल ही अन्ततः संघर्ष का पर्याय बनता है. हालांकि सदियों से मानव और वन्यजीवों का आपस में घनिष्ठ संबंध भी रहा है. दोनों एक दूसरे के परस्पर सहयोगी रहे हैं. इसके बावजूद वनप्राणी अपने घरोंदों को छोड़ने के लिए विवश क्यों हुए? कभी तो वनों में प्रचुर प्राकृतिक संसाधन रहे होंगे कमोवेश आज भी हैं.

दरअसल वनों पर अत्यधिक मानवीय हस्तक्षेप ही वन्य जीवों के साथ मानव के संघर्ष का प्रथम कारण बना. वनों का व्यावसायिक उपयोग, उद्योग जगत का विस्तार और आधुनिक जीवनशैली तथा बाजारीकरण और नगरीय सभ्यता के विकास ने दुनिया के कोने-कोने में कंक्रीट के जंगल खड़े कर दिए. सड़कों का जाल ऐसे बिछा कि जंगल के बाशिंदे भोजन और आवास के लिए तरसने लगे. परिणामस्वरूप उनका पदार्पण मानव बस्तियों की ओर होने लगा. तो क्या विकासपरक नीतियां ही मानव और वन्य जीवों के संघर्ष के पीछे महत्वपूर्ण कारक है? जंगलों के दोहन के साथ सेंचुरी और नेशनल पार्क के निर्माण ने वनों के आस-पास निवास करने वाले स्थानीय निवासियों को उनके हक से वंचित किया है. जबकि यह वही स्थानीय निवासी थे, जिन्होंने सदियों से बिना व्यावसायिक दोहन के हमेशा वनों का उचित उपयोग करते हुए उसके संरक्षण का भी काम किया था. विडंबना ही कहेंगे कि इस मुद्दे को सिरे से नकार दिया जाता है. राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले विमर्श हाशिये के समाजों की जीवन शैली को समझने में असमर्थ ही रहे हैं.

पर्यटन के नाम पर जंगलों को कमाई का केन्द्र बना देना भी मानव और वन्यजीव के बीच संघर्ष का कारण बन गया है. जितना बड़ा वन क्षेत्र उतनी ही संख्या में सफारी और जंगल रिज़ॉर्ट में रहने का रोमांच पर्यटन को बढ़ावा तो दे रहा है और कमाई का माध्यम भी बन रहा है. लेकिन इस नीति ने वन्यजीवों की निजता का हनन किया है. लगातार बढ़ता इंसानी दखल उनको पलायन करने पर मजबूर कर रहा है और शिकार की तलाश में वह इंसानी बस्तियों का रुख कर रहे हैं. इस प्रक्रिया में सबसे अधिक स्थानीय समाज भुग्तभोगी बनता है, नुकसान भी झेलता है और सरकारी मुआवजे की राह तकते रहता है. उत्तराखण्ड के सन्दर्भ में देखें तो 1936 में राम गंगा अभ्यारण का निर्माण हुआ, यह पहला संरक्षित क्षेत्र रहा. कालान्तर में जिम कॉर्बेट पार्क के नाम से मशहूर हुआ. इसके बाद श्रृंखलाबद्ध संरक्षित क्षेत्रों का दायरा बढ़ता गया.

महान शिकारी, पर्यावरणविद, फोटोग्राफर और लेखक जिम कार्बेट की जिंदगी जंगल के रहस्य और एक खूबसूरत इंसान का दस्तावेज है। आप उनके बारे में जितना जानेंगे जिज्ञासा उतनी ही बढ़ती जाएगी। दर्जनों खतरनाक बाघ और तेंदुओं से लोगों की जिंदगी बचाने वाले जिम ने कुछ वक्त के बाद शिकार करना छोड़ दिया और उनके संरक्षण.

आंकड़े बताते हैं कि रामनगर वन क्षेत्र में 2010-2011 में 7 लोगों को बाघ ने निवाला बनाया जिसमें 6 महिलाएं और 1 पुरूष शामिल थे. बागेश्वर गरूड़ में 2017-18 में 5 मासूम बच्चों को गुलदार ने मार डाला. सभी बच्चे 7 से 12 साल की उम्र के थे. नेशनल पार्क के आस-पास के क्षेत्रों में स्थानीय लोगो के लिए वन्यजीव खासा मुसीबत के सबब बन रहे हैं, जिम कार्बेट पार्क के आसपास के क्षेत्र जैसे पम्पापुरी में हिरनों के झुण्ड आसानी से बस्ती में घुस आते हैं, हालाकि हिरनों से लोगों को जान माल का नुकसान नहीं होता लेकिन हिरन तेंदुए के लिए आसान शिकार होता है और आसान शिकार की तलाश में तेंदुआ मानव पर भी हमला करता है. बहरहाल जब तक वन संरक्षित क्षेत्र में इंसानी दखलंदाजी को रोका नहीं जायेगा, जंगल सफारी के नाम पर वन्यजीवों की जिंदगी में विघ्न डालना बंद नहीं किया जायेगा, आवश्यकता से अधिक पूर्ति के लिए जंगलों की अंधाधुंध कटाई रोकी नहीं जाएगी और विकास के नाम पर विनाश की प्रक्रिया बंद नहीं की जाएगी वन्य जीव बनाम इंसान का संघर्ष जारी रहेगा.

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लाहौल ! घाटी में मौसम तो हुआ साफ़ पर हिमखंड गिरने हुए शुरू ।

सोमवार को धूप निकलने के बाद भी लाहौल घाटी में हालात सामान्य नहीं हुए है। कई गाँव मुख्य मार्गों से अभी तक कटे हैं दर्जनों गांवों के लोग अभी भी मुख्य सड़क तक मार्ग बहाल करने में जुटे है। सीमा सड़क संगठन ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सड़कें बहाल नहीं कर पा रही है ।
बर्फबारी के बाद मौसम खुलते ही लाहौल में एक भयानक हिमखंड गिर गया । यह हिमखंड पिछले चार दिन से हो रही बर्फबारी के बाद सोमवार को मौसम खुलते ही केलंग -उदयपुर मार्ग पर गिरा।हिमखंड गिरने से इस में जानमाल का नुक़सान नहीं हुआ लेकिन मार्ग अवरूद्ध हो गया है। सीमा सड़क संगठन ने मशीनरी लगाकर सड़क को बहाल किया केलंग और उदयपुर में भी एक से डेढ़ फुट हिमपात हुआ है।
लाहौल की पहाड़ियां बर्फ से ढकी हुई है और ऐसे में मौसम साफ होने पर लाहौल घाटी में हिमखंड गिरने का खतरा बढ़ गया है हिमखंड अक्सर मौसम साफ़ होने पर ही गिरते है।

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